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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

[च० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८७

Page 571Permalink

[च० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८७
अग्निमान्द्य मे और अरुचि मे इसका प्रयोग करना चाहिये । यह घृत बल,
वर्ण और अग्नि को बढाता है । इस घृत को स्वतंत्र रूप से या नाना प्रकार
के खान-पानो से मिला कर देना चाहिये । इस घृत-साधन मे प्रस्थ का
परिमाण ३२ पल समझना चाहिये १ ॥ २३५-२४३ ॥
भवन्ति चात्र—व्यत्यासान्मधुराम्लानि शीतोष्णानि च योजयेत् ।
नित्यमग्निबलापेक्षी जयत्यर्शःकृतान् गदान् ॥ २४४ ॥
अग्नि, बल की अपेक्षा से अग्नि बल को बढाने के लिये परस्पर अदल-
बदल से मधुर और अम्ल तथा शीत और उष्ण क्रिया का प्रयोग करना
चाहिये । एक बार मधुर रस फिर अम्ल, एक बार शीतक्रिया फिर उष्णक्रिया
करनी चाहिये । इस प्रकार से अर्शजन्य रोग शान्त होते है ॥ २४४ ॥
त्रयो विकाराः प्रायेण ये परस्परहेतवः ।
अर्शांसि चातिसारश्च ग्रहणीदोष एव च ॥ २४५ ॥
एषामग्निबले हीने वृद्धिवृद्धे परिक्षयः ।
तस्मादग्निबलं रक्ष्यमेषु त्रिषु विशेषतः ॥ २४६ ॥
अर्श, अतीसार और ग्रहणी ये तीन राग परस्पर एक दूसरे रोग की उत्पत्ति
मे कारण है । इन तीनो रोगो मे अग्नि बल के घटने से रोग बढता है और
अग्नि-बल के बढने पर रोग घटता । इसलिये इन तीन रोगो मे खास कर अग्नि
के बल की रक्षा करनी चाहिये ॥ २४५-२४६ ॥
भृष्टैः शाकैर्यवागूभिर्यूषैर्मांसरसैः खडैः ।
क्षीरतक्रप्रयोगैश्च विचित्रैर्गुदजाञ्जयेत् ॥ २४७ ॥
भूने हुए शाको से (तैल, घी मे बने पत्तो के शाको से ), यवागुओ से,
यूष से, मास रसो से, खड से तथा नाना प्रकार से दूध या तक्र का प्रयोग
करने से अर्श-रोग की शान्ति करनी चाहिये ॥ २४७ ॥
यद्वायोरानुलोम्याय यदग्निबलवृद्धये ।
अन्नपानौषधद्रव्यं तत्सेव्यं नित्यमर्शसैः ॥ २४८ ॥
जो औषध वायु का अनुलोमन करे, जो खान-पान अग्नि को बढ़ाये, ये
सब खान-पान तथा औषध प्रतिदिन अर्श रोगियो को सेवन करनी चाहिये ॥२४८॥
यदतो विपरीतं स्यान्निदाने यत्प्रदर्शितम् ।
गुदजाद्विपरीतेन तत्सेव्यं न कदाचन २ ॥ २४६ ॥
१. इस घृत को गदनिग्रह मे 'अवाक्पुष्पादि घृत' कहा है ।
२ 'कथचन' इति वा पाठः ।