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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६६

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अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४६६
अपेतराक्षसीकुष्ठपूतनाकेशिचोरकैः ।
उत्सादनं मूत्रपिष्टैर्मूत्रैरेवावसेचनम् ॥ ३८ ॥
( ६ ) अपेतराक्षसी ( कृष्ण तुलसी ), कूठ पूतना ( हरड), भूतकेशी,
चोरक इनको बकरे के मूत्र मे पीस कर उबटन करे और मूत्रों से अवसेचन
( स्नान ) करावे ॥३८॥
जलौकाशकृता तद्वद् दग्धैर्वा बस्तलोमभिः ।
खरास्थिभिर्हस्तिनखैस्तथा गोपुच्छलोमभिः ॥ ३६ ॥
( ७ ) इसी प्रकार जाक की विष्ठा से अथवा बकरे के बालों को जलाकर
उनसे, या गधे की अस्थि से, अथवा हाथी के नखो के चूर्ण से, या गाय की
पूंछ के बालो को जला कर इनको बकरे के मूत्र मे पीसकर उबटन लगावे १ ॥३६॥
कपिलाना गवा मूत्रं नावनं परम हितम् ।
श्वशृगालबिडालाना सिंहादीना च शस्यते ॥ ४० ॥
नस्य—( १ ) पिंगल वर्ण की ( कपिला ) गायो का मूत्र नस्य के लिये
॰अति उत्तम है । इसी प्रकार कुत्ते, गीदड, बिल्ली, सिंह आदि का मूत्र भी
नस्य के लिये उत्तम है ॥ ४० ॥
भार्गी वचा नागदन्ती श्वेतश्वेता२ विषाणिका ।
ज्योतिष्मती नागदन्ती पादोक्ता मूत्रपेषिताः ॥ ४१ ॥
योगास्त्रयोऽतः षड बिन्दून् पञ्च वा नावयेद्भिषक् ।
( २ ) तीन योग—( १ ) भार्गी, वचा और नागदन्ती, ( २ ) श्वेतश्वेता
( श्वेत अपराजिता या दूर्विया वच ) और विषाणिका ( मेढासिंगी ), ( ३ )
ज्योतिष्मती ( मालकगनी ) और नागदन्ती ( बडी दन्ती, पर्व पुष्पिका )
इनको मूत्र के साथ पीस ले । ये तीन योग है। इनके पाच या छ बिन्दुओ से
वैद्य अपस्मार रागी की नाक मे नस्य देवे ॥ ४१ ॥
त्रिफलान्योषपीतद्रुयवक्षारफणिज्जकैः ॥ ४२ ॥
श्यामापामार्गकारञ्जफलैर्मूत्रैश्च बस्तजैः ।
साधित नावनं तैलमपस्मारविनाशनम् ॥ ४३ ॥
( ३ ) त्रिफला, सोठ, मरिच, पिप्पली, पीतद्रु ( हल्दू ), यवक्षार, फणि-
ज्जक ( तुलसी भेद ), श्यामा, ( त्रिवृत् ), अपामार्ग, करजुवा इनका कल्क
१ 'जलौका' के स्थान पर 'जतुका' पाठ हो तो मकडी का ग्रहण करना
उचित है । २ 'शतश्वेता' इति वा ।

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४७० चरकसंहिता [ अ० १०

चतुर्थांश, सरसो या तिल का तैल एक भाग, बकरे का मूत्र चार भाग लेकर
तैल सिद्ध करे । इसका नस्य लेने से अपस्मार-रोग नष्ट होता है ॥ ४२-४३ ॥
पिप्पली वृश्चिकाली च कुष्ठं च लवणानि च ।
भार्गी च चूर्णितं नस्तः कार्यं प्रधमनं परम् ॥ ४४ ॥
(४) पिप्पली, वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), कूठ ओर पांचो नमको मे से
जो मिले और भार्गी इन सब का चूर्ण करके नाक मे फूक द्वारा नस्य देना
चाहिये । यह एक उत्तम औषध है ॥ ४४ ॥
कायस्थाञ्छारदान्मुद्गान्मुस्तोशीरयवास्तथा ।
सव्योषान् बस्तमूत्रेण पिष्ट्वा वर्तीः प्रकल्पयेत् ॥ ४५ ॥
अपस्मारे तथोन्मादे सर्पदष्टे गरार्दिते ।
विषपीते जलमृते चैताः स्युरमृतोपमाः ॥ ४६ ॥
अञ्जन—(१) कायस्था (तुलसी या छोटी इलायची), शरद्-ऋतु मे
उत्पन्न मूग (हरे मूग), मोथा, उशीर (खस), जौ, त्रिकटु (सोठ, मरिच,
पिप्पली) इन सब को बकरे के मूत्र मे पीस कर नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे। अपस्मार,
उन्माद, साप का काटा, अर्दित-वात, विषपान, गर (सयोगज विष) से
पीडित और जलमृत अर्थात् जल मे डूबा पुरुष (पेट मे बहुत पानी जाने से
जो मृत के तुल्य हो)१ उसके लिये ये वर्तिया अमृत के समान जीवनप्रद
होती है ॥ ४५-४६ ॥
मुस्तं वयःस्था त्रिफला कायस्था हिङ्गु शाद्वलम् ।
व्योषं माषान् यवान्मूत्रैर्बास्तमेषभभंस्त्रिभिः ॥ ४७ ॥
पिष्ट्वा कृत्वा च ता वर्तिमपस्मारे प्रयोजयेत् ।
किलासे च तथोन्मादे ज्वरेषु विषमेषु च ॥ ४८ ॥
(२) मोथा, वयस्था (गिलोय), त्रिफला, कायस्था (हरड़), हींग,
शाद्वल (दूब, नई घास), सोठ, मरिच पीपल, उड़द और जौ इनको बकरे,
बैल और मेढ़े के मूत्र मे पीसकर (तीनो के मूत्र से) नेत्राञ्जन वर्त्ती बनावे ।
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१ जलमग्न पुरुष के लक्षण--
विष्टब्धपायुमूर्वाक्षमाध्मातोदरमेहनम् ।
विद्याज्जलमृत जन्तु शीतपादकराननम् ॥
गुदा, सिर, आखे अकड जावे, पेट और लिंग फूल जावे, पैर, हाथ और
मुख ठण्डे पड जावे उसे जलमृत पुरुष जाने ।