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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २७५

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २७५
तस्य प्रकृतिरुद्दिष्टा दोषाः शारीरमानसाः ।
देहिनं नहि निर्दोषं ज्वरः समुपसेवते ॥ १२ ॥
क्षयस्तमो ज्वरः पाप्मा मृत्युश्चोक्ता यमात्मकाः ।
पञ्चत्वप्रत्ययान्नॄणां क्लिश्यतां स्वेन कर्मणा ॥ १३ ॥
इत्यस्य प्रकृतिः प्रोक्ता, प्रवृत्तिस्तु परिग्रहात् ।
निदाने पूर्वमुद्दिष्टा रुद्रकोपाच्च दारुणात् ॥ १४ ॥
अग्निवेश के इस प्रकार कहे वचनों को सुनकर भगवान् आत्रेय ने कहा
हे सौम्य ! ज्वर के विषय मे जो कुछ भी कहना है वह सब सुनो । ज्वर,
विकार, रोग, व्याधि, आतक इन सब विविध नाम पर्यायों से एक ही बात
कही जाती है, ये सब रोग के पर्याय हैं । शारीरिक और मानसिक दोष इस
ज्वर की प्रकृति ( समवायि-कारण ) हैं । इन शारीरिक तथा मानसिक दोषों से
रहित पुरुष को ज्वर नहीं आता । अपने अपने कर्मों के कारण क्लेश पाते हुए
मनुष्यों को पञ्चत्व ( मृत्यु ) की प्रतीति होने से क्षय, तम, ज्वर, पाप्मा, मृत्यु
ये सब रोग ( विकार ) यम रूप होते हैं। यह ज्वर की प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक
रूप है । परिग्रह ( धनादि मे ममता ) के कारण इसकी प्रवृत्ति ( उत्पत्ति )
होती है । तथा निदानस्थान में दारुण रुद्र कोप से भी ज्वर की उत्पत्ति बतलाई
है । [ पारिग्रह से ज्वर की उत्पत्ति देखो जनपदोध्वंसनीय अध्याय ( विमान०
अ० ३ ) 'भ्रश्यति तु कृतयुगे' इत्यादि ] ॥ १०-१४ ॥
द्वितीये हि युगे शर्वमक्रोधव्रतमास्थितम् ।
दिव्यं सहस्रं वर्षाणामसुरा अभिदुद्रुवुः ॥ १५ ॥
तपोविघ्नं शमीकर्तुं तपोविघ्नं महात्मनाम् ।
पश्यन् समर्थश्चोपेक्षां चक्रे दक्षः प्रजापतिः ॥ १६ ॥
पुनर्माहेश्वरं भागं ध्रुवं दक्षः प्रजापतिः ।
यज्ञेन कल्पयामास प्रोच्यमानः सुरैरपि ॥ १७ ॥
ऋचः पशुपतेर्याश्च शैव्यश्चाहुतयश्च याः ।
यज्ञसिद्धिप्रदास्ताभिर्हीनं चैव स इष्टवान् ॥ १८ ॥
अथोत्तीर्णव्रतो देवो बुद्ध्वा दक्षव्यतिक्रमम् ।
रुद्रो रौद्रं पुरस्कृत्य भावमात्मविदात्मनः ॥ १९ ॥
सृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वै दग्ध्वा तानसुरान् प्रभुः ।
बाणं क्रोधाग्निसंतप्तमसृजत्सत्रनाशनम् ॥ २० ॥
ततो यज्ञः स विध्वस्तो व्यथिताश्च दिवौकसः ।

२७६ चरकसंहिता [ अ० ३
दाहव्यथापरीताश्च भ्रान्ता भूतगणा दिशः ॥ २१ ॥
अथेश्वरं देवगणः सह सप्तर्षिभिर्विभुम् ।
तमृग्भिरस्तुवद्यावच्छैवे भावे शिवः स्थितः ॥ २२ ॥
शिवं शिवाय भूताना स्थित ज्ञात्वा कृताञ्जलिः ।
भिया भस्मप्रहरणस्त्रिशिरा नवलोचनः ॥ २३ ॥
ज्वालामालाकुलो रौद्रो ह्रस्वजङ्घोदरः क्रमात् ।
क्रोधाग्निरुक्तवान् देवमह कि करवाणि ते ॥ २४ ॥
तमुवाचेश्वरः क्रोधं ज्वरो लोके भविष्यसि ।
जन्मादौ निधने च त्वमपचारान्तरेषु च ॥ २५ ॥
दूसरे युग ( त्रेता ) में क्रोध न करने का व्रत पालन करते हुए शर्व
(महादेव) के समय हज़ारों दिव्य वर्षों तक तप में विघ्नकारी असुर लोग
महात्माओं के तप में विघ्न करने के लिये अनेक उपद्रव करने लगे । परन्तु इस
समय समर्थशील होते हुए भी दक्ष प्रजापति ने इनकी उपेक्षा की । दक्ष ने
यज्ञ की रचना की । देवताओं के कहने पर भी दक्ष प्रजापति ने महादेव के
लिये यज्ञभाग ( रुद्र-भाग ) नहीं दिया । इतना ही नहीं, अपितु यज्ञ की
सफलता को देने वाली पशुपति सम्बन्धी ऋचाओं तथा शिव-सम्बन्धी आहुतियों
को छोड़ते हुए, उनसे रहित यज्ञ किया । इसके पश्चात् जब महादेव का व्रत
पूरा हुआ, तब दक्ष प्रजापति का व्यतिक्रम (नियम भग) हुआ जान कर आत्म-
ज्ञानी शिव ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया । अपने माथे में स्थित तृतीय चक्षु
को खोल कर, असुरों को जला कर भस्म कर दिया । फिर रुद्र ने क्रोधाग्नि से
तपा बाण सत्र (यज्ञ) के नाश के लिये फेंका । इससे यज्ञ तो नष्ट हो गया परन्तु
देवता भी दुःखित हुए । समस्त प्राणी दाह और व्यथा से चिल्लाने लगे । वे
दिशाओं में भागने लगे, सब ओर तहलका मच गया । इसके पीछे सप्तर्षियों के
साथ देवताओं ने ऋचाओं द्वारा भगवान् महादेव की तब तक स्तुति की जब तक
कि वे अपने पुन. शिवरूप में नहीं आ गये । स्तुति से रुद्र प्रसन्न हो गये । वे रौद्र
रूप को त्याग शिव रूप में आ गये । जब महादेव ने प्राणियों के कल्याण की
इच्छा से शिवरूप धारण कर लिया, उस समय क्रोधाग्नि ने भयभीत होकर
कहा कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ, मुझको आदेश दीजिये । इस क्रोधाग्नि के
शस्त्र भस्म थे, तीन शिर, नौ आख, ज्वालाओं से व्याप्त, रुद्र, भयंकर, छोटी
जघाए, छोटा पेट था । महेश्वर ने क्रोध को कहा—ससार में प्राणियों के जन्म
और मृत्यु के समय, तथा अन्य अपचारों ( ज्वर-निदान के सेवन आदि ) से
तू लोक में 'ज्वर' होगा ॥ १५-२५ ॥