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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९

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अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५९
(१२) पित्तजन्य उन्माद मे तिक्त वस्तुओ से तथा जीवनीय-गण
की ओषधियो से सिद्ध घृत का पान, तथा मिश्रक स्नेह (यमक) का प्रयोग
करे । इसी प्रकार से शीतल, मधुर, लघु खान-पान देने चाहिये ॥८२-८३॥
शङ्खे केशान्तसन्धौ वा मोक्षयेऽज्ञो भिषक् सिराम् ।
उन्मादे विषमे चैव ज्वरेऽपस्मार एव च ॥ ८४ ॥
(१३) शस्त्र कर्म को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि उन्माद, अपस्मार
आर विषम-ज्वर म, शख प्रदेश, कान, ललाट क मध्य मे ओर केशो के अन्तिम
भाग के सन्धि स्थान मे स्थित सिरा का वेधन करे १ ॥ ८४ ॥
घृतमासविदृप्तं वा निवाते स्थापयेत्सुखम् ।
त्यक्त्वा मतिस्मृतिभ्रंशं संज्ञां लब्ध्वा प्रमुच्यते ॥ ८५ ॥
(१४) अथवा रोगी को कल्याणक घृत आदि ओर मास से तृप्त कराके
सामने की वायु से रहित घर म आराम के साथ रखे । इस प्रकार करने से
बुद्धि और स्मृति के भ्रश को छोड़ कर रोगी सज्ञा (चेतना) को प्राप्त कर
लेता है और उन्माद रोग से मुक्त हा जाता है ॥ ८५ ॥
आश्वासयेत्सुहृद्द्वा तं वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ।
ब्रूयादिष्टविनाशं वा दर्शयेदद्भुतानि वा ॥ ८६ ॥
(१५) मित्र लोग धर्म, अर्थयुक्त वचनो से आश्वासन देवे, इष्ट वस्तु के
नाश को कहे, आश्चर्यकारक वस्तुओ को दिखावे ॥ ८६ ॥
बद्धं सर्षपतैलाक्तं न्यसेद्रोत्तानमातपे ।
कपिकच्छ्वाऽथवा तप्तलोहतैलजलैः स्पृशेत् ॥ ॥ ८७ ॥
कशाभिस्ताडयित्वा वा सुबद्धं विजने गृहे ।
रुन्ध्याच्चेतो हि विभ्रान्तं व्रजत्यस्य यथा शमम् ॥ ८८ ॥
(१६) शरीर पर सरसो का तैल लगाकर, हाथ, पाव बाध कर पीठ के
भार धूप मे लेटावे । कौच या गरम लोहे, गरम तैल या गरम जल से स्पर्श
करे । कशा (कोडो) से पीटे, बाधे, एकान्त घर मे बन्द रखे । इस प्रकार
करने से रोगी का विक्षिप्त चित्त शान्त हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥
सर्पेणोद्धृतदंष्ट्रेण दान्तैः सिंहैर्गजैश्च तम् ।
त्रासयेच्छस्त्रहस्तैर्वा तस्करैः शत्रुभिस्तथा ॥ ८९ ॥
अथवा राजपुरुषा बहिर्नीत्वा सुसंयतम् ।
त्रासयेयुर्वधेनैनं तर्जयन्तो नृपाज्ञया ॥ ९० ॥
१ सुश्रुते—शखकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपागललाटेषु चोन्मादे ।

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४६० चरकसंहिता [ अ० ९
देहदुःखभयेभ्यो हि परं प्राणभयं महत्।
तेन याति शमं तस्य सर्वतो विप्लुतं मनः॥ ९१॥
(१७) विष का दाढ निकाले हुए सर्प से, दान्त (पले हुए, नम्र) सिंह
और हाथी अथवा हाथ मे शस्त्र लिये हुए चोरो या शत्रुओ से उसको डरावे।
अथवा राजकर्मचारी इसको बाहर लेजा कर, इसके हाथ पाव बाध कर मारने
का भय दिखाये और कहे राजा ने तुम्हारे वध की आज्ञा दी है। क्योकि
कषादि के ताडन रूपी शरीर-क्लेश से प्राणो का भय कही अधिक होता है, इस
कारण से विक्षिप्त मन शान्त हो जाता है॥ ८६-९१॥
इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते।
तस्य तत्सदृशप्राप्तिशान्त्याश्वासः शम नयेत् ॥ ९२ ॥
काम-शोक-भय-क्रोध-हर्षेर्ष्या-लोभ-सम्भवान्।
परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत्॥ ९३॥
इष्ट वस्तु के नाश होने से जिसका मन विक्षिप्त हुआ हो, उस रोगी को उस
वस्तु के समान वस्तु की प्राप्ति से, सान्त्वना तथा आश्वासन द्वारा शान्त करे।
काम, शोक, मद, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ के कारण त जिसका मन विक्षिप्त
हुआ हो तो परस्पर विरुद्ध द्वन्द्वो से वह शान्त हो जाता है। कामजन्य उन्माद
क्रोध से, क्रोधजन्य काम से, भयजन्य और शोकजन्य क्रोध ओर काम से,
शान्त हो जाते है ॥ ९२ ६३॥
बुद्ध्वा देशं वयःसात्म्य दोषं कालं बलाबले।
चिकित्सितमिदं कुर्यादुन्मादं भूतदोषजे ॥ ९४॥
देवर्षिपितृगन्धर्व्वैरुन्मत्तस्य तु बुद्धिमान्।
वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि क्रूरकर्म च॥ ९५॥
सर्पिष्पानादि तस्येह मृदुभैषज्यमाचरेत्।
पूजा बल्युपहाराश्च मन्त्राञ्जनविधींस्तथा ॥ ९६॥
शान्तिकर्मेष्टिहोमाश्च जपस्वस्त्ययनानि च।
वेदोक्तान् नियमांश्चापि प्रायश्चित्तानि चाऽऽचरेत् ॥ ९७॥
दोषजन्य (निज) और आगन्तुज उन्माद मे देश, वय, सात्म्य, दोष,
काल, बल और अबल की परीक्षा करके उपरोक्त चिकित्सा करे। बुद्धिमान् वैद्य
को चाहिये कि देवग्रह, ऋषिग्रह, पितृग्रह, गन्धर्वग्रह इनसे आक्रान्त उन्माद
रोगी मे तीक्ष्ण अञ्जन आदि तथा क्रूर कर्मों का प्रयोग न करे। इनकेलिये
घृत आदि कोमल ओषधि का प्रयोग करे १।
१ सुश्रुत मे भी कहा है—न च रूक्ष प्रयुञ्जीत प्रयोग देवताग्रहे।
ऋ ते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूल न चाचरेत् ॥