चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३३
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३३
को सजावे । इस घर मे भली प्रकार से रक्षा का प्रबन्ध करे । बलि, मगल, होम,
प्रायश्चित्त आदि क्रिया करे । पवित्र, वृद्ध, वैद्य, स्नेही मित्रों से भरा रहे ।
यह कुमारागार विधि है ॥ ६० ॥
शयनासनास्तरण-प्रावरणानि कुमारस्य मृदु लघु शुचि-सुगन्धीनि
स्युः । स्वेदमलजन्तुमन्ति मूत्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः ॥६१॥
असति संभवेऽन्येषा तान्येव च सुप्रक्षालितोपधूपितानि सुशुद्ध-
शुष्काण्युपयोगं गच्छेयुः॥ ६२ ॥
कुमार के बिस्तर, आसन, विछौने आदि कोमल, हल्के, पवित्र और सुग-
न्धियुक्त हों, वे पसीने, जू आदि वाले तथा मूत्र मल वाले न हों। यदि अन्य
दूसरे वस्त्र न हों तो इन्हीं वस्त्रो को भली प्रकार धोकर सुगन्धा कर (धुवा देकर )
साफ और शुष्क करके काम में लाया जावे ॥ ६२ ॥
धूपनानि पुनर्वाससां शयनास्तरणप्रावरणानां च यव-सर्षपातसी-
हिङ्गु गुग्गुलु-वचा चोरक-वयःस्था-गोलोमी-जटिला पलङ्कषाशोक-रोहि-
णीसर्पनिर्मोकाणि घृतसक्तानि स्युः॥ ६३ ॥
वस्त्रों के रोगनाशक धूम—बिस्तर, आसन, बिछौने चादर आदि कपड़े
को धुवा देने के लिये जौ, सरसों अलसी, हींग, गुग्गुल, वच, चोरक, ब्राह्मी,
श्वेत दूब, जटामासी, गुग्गुलु, अशोक, कुटकी और साप की केंचली इनको घी
में मिला कर इनसे धुवा देना चाहिये ॥ ६३ ॥
मणयश्च धारणीयाः कुमारस्य खड्ग-रुरु-गवय-वृषभाणा जीवतामेव
दक्षिणेभ्यो विषाणेभ्यस्त्वग्राणि गृहीतानि स्युः । मत्राद्याश्चौषधयो जीव-
कर्षभकौ यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः प्रशंसेयुरथर्ववेदविदः॥ ६४॥
बालक के आभूषण—शिशु को नाना प्रकार की मणिया, जीवित गैडा
रुरु (मृग ), गवय (नीलगाय ) और साड के दक्षिण सीग के अगले भागों
को लेकर धारण कराने चाहिये । मंत्र आदि, जीवक, ऋषभक आदि ओषधियों
को तथा अन्य जिन २ वस्तुओ को अथर्व वेद के जानने वाले विद्वान् ब्राह्मण
बतावे वे २ पदार्थ धारण करावे ॥ ६४ ॥
क्रीडनकानि खल्वस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाण्यगुरूष्यतीक्ष्णा-
ग्राण्यनास्यप्रवेशीन्यप्राणहराण्यवित्रासनानि च स्युः ॥ ६५ ॥
बच्चे के खिलौने—कुमार के खिलौने विचित्र रूप के, शब्द करने वाले,
सुन्दर, हलके, जिनके अग्रभाग तीखे न हो, जो बच्चे के मुख में न जा सकें,
१३४ चरकसंहिता [ अ० ८
बच्चों का प्राणहरण करने वाले न हों तथा बच्चों को भय देने वाले न हों
ऐसे होने चाहिये ॥ ६५ ॥
न ह्यस्य वित्रासनं साधु तस्मात्तस्मिन् रुदत्यभुञ्जाने वाऽन्यत्र वाऽ-
विधेयतां गच्छति राक्षस-पिशाच-पूतनाद्याना नामानि चाऽऽह्वयता
कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥ ६६ ॥
शिशु को भय देना—शिशु को डराना, भय दिखाना अच्छा नहीं, रोते हुए
भोजन न करने पर अथवा अन्य इसी प्रकार की अवस्था में जब बालक काबू
में न आवे तो शिशु को डराने के लिये राक्षस, पिशाच, पूतना आदि का नाम
नहीं लेना चाहिये ॥ ६६ ॥
यदि त्वातुर्यं किंचित्कुमारमागच्छेत्तत्प्रकृति-निमित्त-पूर्वरूप-लिङ्गो-
पशय-विशेषैस्तत्त्वतोऽनुबुध्य सर्वविशेषानातुरौषध-देश-क-लाश्रयानवे-
क्षमाणश्चिकित्सितुमारभेतेनं मधुर-मृदु-लघु-सुरभि-शीत-शङ्करं कर्म
प्रवर्तयन्, एवं सात्म्या हि कुमारा भवन्ति, तथा ते शर्म लभन्तेऽचि-
राय । अरोगेष्वरोगवृत्तमातिष्ठेत् ॥ ६७ ॥
यदि कभी शिशु रोगी हो जाये तो वात आदि प्रकृति, कारण, पूर्वरूप,
लक्षण, उपशय आदि से रोग का वास्तविक रूप जान कर रोगी सम्बन्धी सब
बातों की देश, काल और शरीर का देखकर चिकित्सा आरम्भ करे। चिकित्सा
मे मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीतल, कल्याणकारी कर्म (औषध) करना
चाहिये। कुमार भी इसी सात्म्य के (मधुर, मृदु, शीतल, लघु) होते हैं, ऐसी
ही औषध उनको लाभदायक है। इस प्रकार से बालक शीघ्र ही सुखी,
नीरोग हो जाते हैं। स्वस्थ अवस्था में स्वस्थ वृत्त का पालन करना चाहिये ॥६७॥
देश-कालात्म-गुण-विपर्ययेण वर्तमानः क्रमेणासात्म्यानि परिवर्त्यो-
पयुञ्जानः सर्वाण्यहितानि वर्जयेत् । तथा बलवर्णशरीरायुषां संपद-
मवाप्नोतीति ॥ ६८ ॥
देश, काल और आत्मा इनके गुणों के विपरीत अवस्था मे कुमार को
असात्म्य देश, काल से क्रमश सात्म्य देश, काल, आत्म-गुणों पर बदलना
चाहिये। सब प्रकार के अहित वस्तुओं का त्याग करना चाहिये। इस प्रकार
से उत्तम बल, वर्ण शरीर और उत्तम आयु प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥
एवमेनं कुमारमायौवनप्राप्तेर्धर्मार्थकौशलागमनाच्चानुपालयेत् ।