चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
रोगो में शस्त्रचिकित्सा । उपसहार ।
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[बायाँ स्तम्भ]
रोगो में शस्त्रचिकित्सा । उपसहार ।
चतुर्दशोऽध्यायः (पृ० ५४६-५८८)
अर्शश्चिकित्सितम्— प्रश्न और उप-
देश । अर्श रूप । अर्शभेद । अर्श संज्ञा
विवेक । सहज र्श । लक्षण उत्पत्ति ।
कारण । वातादिजन्य अशो की विशे-
षता । वातजन्य अर्श के कारण । पित्त-
जन्य अर्श के कारण-कफ प्रधान अर्श
के लक्षण । कारण । पूर्वरूप । असा-
ध्यता । चिकित्सा । अर्श पर शस्त्र के
अयुक्त प्रयोग से हानियो की सम्भावना,
शुष्क अर्शो की चिकित्सा । आठ प्रलेप,
दूषित रक्त पर जलोका प्रयोग । पाचन
योग । दश योग । तक्रारिष्ट । तक्र का
सर्वोपरि प्रयोग । मास रस का प्रयोग ।
तक्रों और यूषों का प्रयोग । अनेक
योग । तीन घृत-चव्यघृत । नागराद्य-
घृत । पिप्पलाद्य घृत । मास रस ।
शाक । अनुवासन । अनेक योग-अभया-
रिष्ट । दन्त्यरिष्ट । फलारिष्ट । शर्करा-
सव । कनकारिष्ट । शुष्क अर्शों की
सिद्ध फल-चिकित्सा । स्रावी अर्शों की
सिद्ध-चिकित्सा । रक्तपित्तोल्बण स्रावी
चिकित्सा-अन्ययोग कुटजादि रस क्रिया,
अनेक योग और पथ्य अर्श के मस्सों का
प्रतिसारण । पिच्छाबस्ति । ह्रीवेरादि
घृत । सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृत । उपसंहार ।
पञ्चदशोऽध्यायः (पृ० ५८६-६३२)
ग्रहणीचिकित्सितम्—जाठर अग्नि
वा देहाग्नि की प्रधानता । देहाग्नि द्वारा
आहार पाचन की चूल्हे पर रखी भात
की हडिया से तुलना । आहार से रस
का बनना । उससे इन्द्रियो का तर्पण ।
[दायाँ स्तम्भ]
भौम आदि पाच प्रकार की उष्माए,
उन द्वारा पाच प्रकार के गुणों का पाक,
सात अग्नियो द्वारा सात देह धातुओ के
दो प्रकार के पाक, किट्ट और प्रसाद ।
प्रसादज धातु, रस द्वारा धातुओ के
पोषण मे ४ प्रकार के न्यायो का वर्णन ।
उपधातुओ की उत्पत्ति । किट्ट का रूप ।
आहार रसो को धातुओ मे बदलने का
काल क्रम । धातु-परिवर्तन के सम्बन्ध
से चक्रपाणि का मत-अचि सन्तान और
शब्दसन्तान का दृष्टान्त । आहर रस से
रक्तादि बनने के सम्बन्ध मे अग्निवेश
का प्रश्न । आत्रेय का उत्तर । रस को
फैलाने मे विक्षेपक व्यान का कार्य,
निरन्तर गतिशील रस के स्रोतों में रुक
जाने से व्याधियों की उत्पत्ति । तीन
प्रकार की अग्नियों मे जाठराग्नि की
मुख्यता । अजीर्ण के सामान्य कारण ।
सामान्य लक्षण । घोर अन्नविष की
उत्पत्ति, उसके द्वारा अनेक रोगो की
उत्पत्ति । विषमाग्नि के द्वारा धातु-वैष-
म्य और देह-शोष । समाग्निसे धातु-
सरता दुर्बलाग्नि द्वारा अन्न का विदग्ध
होना, उसका गुदद्वार से विरेचन, ग्रहणी
रोग का स्वरूप, ग्रहणी के लक्षण, ग्रहणी
के पूर्वरूप, ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति।
ग्रहणी रोग के ४ प्रकार । वातजन्य
ग्रहणी लक्षण । पैत्तिक ग्रहणी-लक्षण ।
कफजन्य ग्रहणी-लक्षण। ग्रहणी दोष।
सन्निपातजन्य ग्रहणी । ग्रहणी चिकित्सा ।
आम दोष में चिकित्सा-दशमूलाद्य घृत ।
त्र्यूषणाद्य घृत । पञ्चमूलाद्य चूर्ण । अन्य
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योग-साम और निराम मल की परीक्षा- | भासव । मूलासव । पिण्डासव । मध्व-
अपवाद । चित्रकाद्य गुडिका-छ योग । | रिष्ट । क्षार घृत । पिप्पल्यादि योग ।
वमन, अर्श, ग्रन्थि-शूल मे सिद्ध योग । | तीन क्षार । क्षार गुडिका । वत्सकादि
आमयुक्त । शूल मे सिद्धयोग । अग्नि- | योग । अग्निवर्धक त्रिफलादि क्षार योग।
वर्धक पिप्पल्याद्य-चूर्ण । मरिचाद्य चूर्ण। | त्रिदोषजन्य ग्रहणी मे पञ्च कर्म । कफ
अन्य योग । पञ्च प्रकार यवागू । भोज- | की प्रबलावस्था मे वमनादि विधि ।
नादि व्यवस्था । तक्र प्रयोग । तक्रारिष्ट, | मन्दाग्निवाले को दीपनीय ओषधि
चन्दनाद्य घृत । तिक्त घृतो का प्रयोग । | साधित घृत पान । नाना प्रकार की
नागराद्य चूर्ण । भूनिम्बादि चूर्ण । | महा अग्नियो पर अनेक उपचार । अग्नि-
किराताद्य चूर्ण । कफजन्य ग्रहणी मे | मान्द्य का कारण । भस्मक चिकित्सा ।
वमन-पलाशादि योग । अग्निवृद्ध्यर्थ | सम्प्राप्ति । उसके १८ उपचार । पथ्य ।
योग । मध्वासव । मधूकासव । दुराल- | देश-काल विचार से भोजन विधि ।
| उपसंहार ।