चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०५
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०५
का स्वरस पिला देना चाहिये । आवंलों के ताजे रस में इस चूर्ण को रख देना
चाहिये । रस के शुष्क होने पर शालिपर्णी, पुनर्नवा, नागबला, ब्रह्म-सुवर्चला
( ब्राह्मी ), मण्डूकपर्णी, शतावरी, शंखपुष्पी ( शंखाहूलो ), पिप्पली, वच,
वायविडंग, कौंच, गिलोय, लाल चन्दन, अगरु, मुलहठी, महुवे के फूल, नीला
कमल, श्वेत कमल, मालती, युवती ( नवमालिका, मागरा ), यूथिका ( जूही,
श्वेतपुष्पा ), इनका चूर्ण मिलाना चाहिये । इन सब का चूर्ण स्वरस से भावित
आवले के चूर्ण से अष्टमाश होना चाहिये । फिर इस सम्पूर्ण चूर्ण में एक
हज़ार पल नागबला का स्वरस डालकर छाया मे शुष्क करना चाहिये । शुष्क
होने पर दुगना घी अथवा एक साथ मिले घी और शहद मिलाकर गुड़ के
समान बन जाने पर छोटा छोटी डलिया बाघकर घी से भावित पवित्र दृढ़ पात्र
मे रखकर उपलों की राख मे भूमि क अन्दर गाड़ देना चाहिये । अथर्ववेद
के ज्ञाता विद्वानों से रक्षाविधान कराके गत्तं में गाड़ना चाहिये । पन्द्रह दिन
तक औषध को भूमि मे गड़े रहने देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे निकाल
कर स्वर्ण, चादी, ताम्र, प्रवाल, कालायस ( फौलाद ) की भस्मों को औषध
मे अष्टमाश मिलाना चाहिये । इस रसायन को कुटी-प्रावेशिक विधि के अनुसार
आधा कर्ष ( १ तोला ) से प्रारम्भ करके धीरे धीरे आधा आधा कर्ष बढ़ाते
हुए प्रातः सेवन करना चाहिये । इसका प्रयोग करते समय अग्नि के बल का
ध्यान रखना चाहिये । जब यह औषध जीर्ण हा जाये तब घी से मिश्रित साठा
के भात को दूध के साथ खाना चाहिये । इस रसायन से उपरोक्त कहे गुण
प्राप्त होते हैं ॥ ५७ ॥
भवन्ति चात्र — इदं रसायन ब्राह्मं महर्षिगणसेवितम् ।
भवत्यरोगो दीर्घायुः प्रयुञ्जानो महाबलः ॥ ५८ ॥
कान्तः प्रजाना सिद्धार्थश्चन्द्रादित्यसमद्युतिः ।
श्रुतं धारयते सत्त्वमार्षं चास्य प्रवर्तते ॥ ५६ ॥
धरणीधरसारश्च वायुना समविक्रमः ।
स भवत्यविष चास्य गात्रे संपद्यते विषम् ॥ ६० ॥
इति ब्राह्मरसायनद्वितीययोगः ।
इस ब्राह्म रसायन को महर्षियों ने सेवन किया था । इसके सेवन से पुरुष
नीरोग, दीर्घायु, महाबलशाली जनता मे प्रिय, सुन्दर ( जिसे जनता चाहती
है ), उसकी सब इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं । वह चन्द्रमा और सूर्य के समान
कान्तियुक्त होता है, वह सुनते ही याद कर लेता है, उसका मन आर्षप्रकृति का
२०६ चरकसंहिता [ अ० १
हो जाता है, वह पर्वत के समान लम्बा-चौड़ा डीलडौल का, वायु के समान
पराक्रमी हो जाता है । विष भी इसके शरीर में पहुचकर अविष, ( विषरहित )
बन जाता है। यह ब्राह्म रसायन का द्वितीय योग है ॥ ५८-६० ॥
बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाकः काश्मरी पाटलिर्बला ।
पर्ण्यश्वतस्रः पिप्पल्यः श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥ ६१ ॥
शृङ्गी तामलकी द्राक्षा जीवन्ती पुष्करागुरुः ।
अभया चामृता ऋद्धिर्जीवकर्षभकौ शठी ॥ ६२ ॥
मुस्तं पुनर्नवा मेदा एला चन्दनमुत्पलम् ।
विदारी वृषमूलानि काकोली काकनासिका ॥ ६३ ॥
एषां पलोन्मितान्भागान्शतान्यामलकस्य च ।
पञ्च दद्यात्तदैकत्र जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ६४ ॥
ज्ञात्वा गतरसान्येतान्यौषधान्यथ तं रसम् ।
तच्चाऽऽमलकमुद्धृत्य निष्कुलं तैलसर्पिषोः ॥ ६५ ॥
पलद्वादशके भृष्ट्वा दत्त्वा चार्धतुला भिषक् ।
मत्स्यण्डिकायाः पूताया लेहवत्साधु साधयेत् ॥ ६६ ॥
षट्पलं मधुनश्चात्र सिद्धशीते समावपेत् ।
चतुष्पलं तुगाक्षीर्याः पिप्पलीद्विपलं तथा ॥ ६७ ॥
पलमेकं निदध्याच्च त्वगेलापत्रकेशरात् ।
इत्ययं च्यवनप्राशः परमुक्तं रसायनम् ॥ ६८ ॥
कासश्वासहरश्चैव विशेषेणोपदिश्यते ।
क्षीणक्षतानां वृद्धानां बालानां चाङ्गवर्धनः ॥ ६९ ॥
स्वरक्षयमुरोरोगं हृद्रोगं वातशोणितम् ।
पिपासां मूत्रशुक्रस्थानदोषंश्चाप्यपकर्षति ॥ ७० ॥
अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत योपरुन्ध्यान्न भोजनम् ।
अस्य प्रयोगाच्च्यवनः सुवृद्धोऽभूत्पुनर्युवा ॥ ७१ ॥
मेधां स्मृतिं कान्तिमनामयत्वमायुःप्रकर्षं बलमिन्द्रियाणाम् ।
स्त्रीषु प्रहर्षं परमग्निवृद्धि वर्णप्रसादं पवनानुलोम्यम् ॥ ७२ ॥
रसायनस्यास्य नरः प्रयोगाल्लभेत जीर्णोऽपि कुटीप्रवेशात् ।
जराकृतं रूपमपास्य सर्वं बिभर्ति रूपं नवयौवनस्य ॥ ७३ ॥
इति च्यवनप्राशः ।
च्यवनप्राश—बेल की छाल, अरणी की छाल, अरलु की छाल, गम्भारी की
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०७
छाल, पाढल की छाल, खरेंटी, चारों पर्णिया ( शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्ग-
पर्णी, माषपर्णी ), पिप्पली, गोखरू, दोनों छोटी बड़ी कटेरी, काकड़ासिङ्गी,
तामलकी ( भुई आंवला ), द्राक्षा, जीवन्ती, पुष्करमूल, अगरु, हरड बड़ी,
गिलोय, ऋद्धि, जीवक, ऋषभक, शठी ( कचूर ), नागरमोथा, पुनर्नवा, मेदा,
छोटी इलायची, लाल चन्दन, कमल गट्टा, विदारी, अडूसे की जड, काकोली,
काकनासा ( कौआ ठोढ़ी ), प्रत्येक एक एक पल, आवले ५०० इनको एक
द्रोण ( परिभाषा से दुगने ) जल में पकावे । पकाते समय आवलों को पाटली में
बाँध कर क्वाथ में छोड़ना चाहिये । जब ओषधियों का रस काथ मे आ जाये
और ओषधिया नीरस हो जायें तब पोटली को निकाल कर क्वाथ छान लेना
चाहिये । इन आवलों की गुठलियों को निकाल कर कपड़े में से आवलों को
हाथ से रगड़ कर छानना चाहिये । जिससे रेशे निकल जायें और नरम पिट्ठी
सी बन जाये । इस पिट्ठी को मिलित तैल एव घी के बारह पल में भून लेना
चाहिये । भूनना इतना चाहिये कि रंग लाल सा हो जाये । काथ में ५० पल
राब या दानेदार खाड मिलाकर लेह पकाना चाहिये । पकाने से पूर्व छानकर
आवले की पिट्ठी इसमें मिला दे । जब पाक तैयार हो जाय तो इसको उतार ले ।
ठण्डा होने पर छ. पल ( ४८ तोला ) मधु, वशलोचन ४ पल, पिप्पली दो पल,
दालचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेसर मिलित १ पल मिला दे । पकाते
समय निरन्तर लकड़ी के कौंचे ( पल्टा ) से चलाता जावे ।
[ च्यवनप्राश का पाठ कई पुस्तकों में है । चिकित्सा-कलिका, योग रत्ना-
कर और शार्ङ्गधर में कुछ ओषधियों का भेद है । किसी में ३५, किसी मे
३८ और किसी मे ३६ हैं । क्वाथविधि मे भी कहीं चतुर्थांश शेष रखने की
विधि लिखी है, कहीं अष्टमांश की । ओषधियों का रस क्वाथ में आना चाहिये ।
साथ ही शार्ङ्गधर मे तैल के अन्दर आवले भूनने का विधान नहीं। वहा पर
केवल घी का ही प्रयोग किया है । ]
यह च्यवनप्राश उत्तम रसायन है । खासकर कास, श्वास, को नष्ट करता है ।
क्षीणक्षत, वृद्ध एव बालकों के अगों को बढ़ाता है । स्वरक्षय, उरोरोग, हृदय-
रोग, वात-रक्त, पिपासा, मूत्रस्थान, शुक्रस्थान के रोगों ( वीर्यदोष ) को नष्ट
करता है । इस च्यवनप्राश की मात्रा इतनी लेनी चाहिये जिससे भूख नष्ट
न हो । इसके प्रयोग से वृद्ध च्यवन ऋषि भी पुनः जवान बन गये थे । इस
रसायन के प्रयोग से मेधा, स्मृति, कान्ति, नीरोगता, आयु की दीर्घता, इन्द्रियों
की सबलता, मैथुन में समर्थता, देहाग्नि की वृद्धि, वर्ण की निर्मलता, वायु की
२०८ चरकसंहिता [ अ० १
अनुलोमता प्राप्त होती है । कुटी-प्रावेशिक विधि से इस रसायन का प्रयोग करने
वाला वृद्ध पुरुष भी वार्द्धक्य के चिह्नों से रहित होकर नई जवानी के रूप को
धारण करता है, (मात्रा १ से २ तोला तक) ॥ ६१-७३ ॥
अथाऽऽमलक-हरीतकीनामामलक-बिभीतकानां हरीतकी-बिभीत-
कानामामलक-हरीतकी-बिभीतकानां वा पलाशत्वगवनद्धानां मृदावलि-
प्तानां कुकूलैके स्विन्नानाममुलकानां पल-सहस्रमुलूखले सगोथ्य दधि-
घृत-मधु-पलल तैल-शर्करा संप्रयुक्तं भक्षयेदनन्नभुग्यथोक्तेन विधिना,
तस्यान्ते यवाग्वादिभिः प्रकृत्यवस्थापनमभ्यङ्गोत्सादन सर्पिषा यवचू-
र्णैश्च, अयं च रसायन-प्रयोग-प्रकर्षो द्विस्तावदग्नि-बलमभिसमीक्ष्य प्रति-
भोजनं यूषेण पयसा वा षाष्टिकः ससर्पिष्कोऽतः परं यथासुखविहारः
कामभक्ष्यः स्यात् । अनेन प्रयोगेणर्षयः पुनर्युवत्वमवापु, बभूवुश्चानेक-
वर्षशतजीविनो निर्विकाराः पर शरीर-बुद्धीन्द्रिय-बल-समुदिताः, चेरु-
श्चात्यन्तनिष्ठया तप इति ॥ ७४ ॥ इति चतुर्थामलकरसायनम् ।
आमलक रसायन (४)-आवले और हरड, (२) आवले ओर बहेड़ा
(३) हरड और बहेड़ा, (४) वा आवला हरड और बहेड़ा इन चारों मे से
किसी एक योग का लेकर, ढाक का गोली छाल से लपेट कर, ऊपर से मिट्टी का
लेप चढ़ा कर गोहों की आग में स्विन्न करना चाहिये । स्विन्न होने पर इनकी
गुठलिया निकाल कर एक हजार पल परिमित मात्रा में ऊखल से कूट ले ।
इनमें दही, घी, शहद, पलल (तिल कल्क), तैल, शर्करा मिला कर कुटीप्रावे-
शिक विधि से सेवन करे । इस के सेवन के समय दूसरा किसी प्रकार का कोई
अन्न आहार नहीं खाना चाहिये । पश्चात् यवागू आदि पेया द्वारा प्रकृति मे
अर्थात् पूर्व भोजन पर लाना चाहिये । प्रति दिन घी का मालिश और जौ के
चूर्ण से उबटन करे* । अग्नि बल को देखते हुए इस रसायन को दो ही बार
सेवन करे । भोजन में घी युक्त साठी का यूष या दूध के साथ खाना चाहिये ।
इसके पश्चात् यथेच्छ आहार-विहार का उपभोग करना चाहिये । इस प्रयोग से
ऋषियों ने पुनः युवावस्था को प्राप्त किया था, अनेक वर्षों की आयु भोगी थी,
वे देर तक नीरोग और शरीर बुद्धि, इन्द्रिय बल से युक्त रहे, उन्होंने अत्यन्त
निष्ठा से तप किया ॥ ७४ ॥
हरीतक्यामलक-बिभीतक-पञ्च पञ्चमूल-निर्यूहेण पिप्पली-मधु-मधू-
क-काकोली-क्षीरकाकोल्यात्मगुप्ता-जीवकर्षभक-क्षीर-शुक्ला-कल्क-संप्र-
- अष्टाङ्गसंग्रह के अनुसार रसायनावधि प्रयोग के दुगन दिन घी की
मालिश और जौ का उबटन करना चाहिये ।