Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०७

Page 321Permalink

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०७
ज्वराः कषायैर्वमनर्लङ्घनैर्लघुभोजनैः ॥ २१६ ॥
रूक्षस्य ये न शाम्यन्ति सर्पिस्तेषां भिषग्जितम् ।
रूक्षं तेजो ज्वरकरं तेजसा रूक्षितस्य च ॥ २१७ ॥
यः स्यादनुबलो धातुः स्नेहसाव्यः स चानिलः ।
कषायाः सर्व्व उच्चैस्ते सर्पिषा सह योजिनाः ॥ २१८ ॥
प्रयोज्या ज्वरशान्त्यर्थमग्निसंधुक्षणाः शिवाः ।
रूक्ष शरीर वाले रोगी का जो ज्वर कषाय, वमन, लङ्घन, लघु भोजन से
शान्त नहीं होते, उनके लिये घृत का प्रयोग करना चाहिये । ऐसे रोगियों की
औषध घी है । ज्वर को उत्पन्न करने वाला तेज ( पित्त ) रूक्ष होता है, तेज
के कारण रोगी का शरीर भी रूक्ष हो जाता है । रूक्षता के कारण जो धातु
पीछे से बलवान् हो जाता है, वह वायु घी से ही शान्त होता है । स्नेह से ही
वायु और पित्त दोनों शान्त होते हैं । प्रथम कहे हुए कषायों का घी के साथ
प्रयोग करना चाहिये । इस प्रकार प्रयोग करने से ज्वर शान्त होता है, अग्नि
प्रवल होती है और ये कषाय हितकारी हैं ॥ २१६-२१८ ॥
पिप्पलीचन्दनं मुस्तमुशीरं कटुरोहिणी ॥ २१९ ॥
कलिङ्गकस्तामलकी सारिवाऽतिविषा स्थिरा ।
द्राक्षामलकबिल्वानि त्रायमाणा निदिग्धिका ॥ २२० ॥
सिद्धमेतैर्घृतं सद्यो जीर्णज्वरमपोहति ।
क्षयं कासं शिरःशूलं पार्श्वशूलं हलीमकम् ॥ २२१ ॥
अंसाभितापमग्निं च विषमं संनियच्छति ।
पिप्पल्यादि घृत—पिप्पली, लाल चन्दन, मोथा, खस, कुटकी, इन्द्र, जौ,
भुई आंवला, सारिवा, अतीस, शालपर्णी, द्राक्षा, आंवला, बेलगिरी, त्रायमाणा,
छोटी कटेरी इनसे सिद्ध घृत जीर्ण ज्वर को शीघ्र नष्ट करता है । क्षय, कास,
शिरोवेदना, पार्श्वशूल, हलीमक, असामिताप और विषम अग्नि को नष्ट करता
है । [ यह घृत सुश्रुत और चिकित्सा-कलिका आदि मे कुछ थोडे से परिवर्त्तन
से आया है । यहा पर घृत का पाक पिप्पल्यादि के कल्क से ही अथवा इनके
कल्क तथा क्वाथ दोनो से सिद्ध करने की परिपाटी है । कही कहीं पर इसमे दूध
का भी योग होता है ] ।
[ घृतपाक मे—प्रथम घी का सम्मूर्च्छन करना चाहिये । इसके लिये घी को
आग पर गरम करना चाहिये । जब झाग रहित हो जाये तब इसमे नीचे उतार
कर हरड, बहेडा, आवला, मोथा, हल्दी इनका कल्क, बिजौरे का रस एक

Page 322Permalink

३०८ चरकसंहिता [ अ० ३
पल, पानी ८ प्रस्थ मे घोल कर घी १ प्रस्थ मे मिलाना चाहिये फिर पकाना
चाहिये । मन्द मन्द आग पर पकाने से जब थोडा सा पानी रह जाये तब
उतार लेना चाहिये । इसमे आम दोष नष्ट हो जाता है । इसको क्वाथ मे
मिलाना चाहिये । इस घृत को पिप्पल्यादि क्वाथ ओर कल्क से दूब के साथ
सिद्ध किया जाये तो अधिक उत्तम होगा ] ॥ २१६-२२१ ॥
वासा गुडूची त्रिफला त्रायमाणा यवासकम् ॥ २२२ ॥
पक्त्वा तेन कषायेण पयसा द्विगुणेन च ।
पिप्पलीमुस्तमृद्वीकाचन्दनोत्पलनागरैः ॥ २२३ ॥
कल्कीकृतैश्च विपचेद्घृतं जीर्णज्वरापहम् ।
वासाद्य घृत—वासा, गिलोय, त्रिफला, त्रायमाण, जवासा इनके क्वाथ से
दुगने (घी से) गाय के दूध के साथ, पिप्पली, माथा, मुनक्का, लाल चन्दन,
नीला कमल और सोठ इनके कल्क से घृतपाक करना चाहिये । यह घृत जीर्ण
ज्वर को नष्ट करता है । [ गव्य घृत २ प्रस्थ, वासामूल त्वक् का कपाय ४ प्रस्थ,
दूध ४ प्रस्थ, कल्क १ शराव । अथवा कपाय आठ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ, घी २
प्रस्थ, कल्क १ शराव लेकर भी घृत सिद्ध किया जा सकता है ॥ २२२-२२३ ॥
बला श्वदंष्ट्रा बृहती कलसी धावनी स्थिराम् ॥ २२४ ॥
निम्बं पर्पटक मुस्तं त्रायमाणा दुरालभाम् ।
कृत्वा कपाय पेष्यार्थे दद्यात्तामलकी शटीम् ॥ २२५ ॥
द्राक्षा पुष्करमूलं च मेदामामलकानि च ।
घृत पयश्च तत्सिद्धं सर्पिर्ज्वरहरं परम् ॥ २२६ ॥
क्षयकासशिरःशूलापार्श्वशूलासतापनुत् ।
ज्वरिभ्यो बहुदोषेभ्य ऊर्ध्व चाधश्च बुद्धिमान् ॥ २२७ ॥
दद्यात्संशोधनं काले कल्पे यदुपदेक्ष्यते ।
बलाद्य घृत—बला (खरैटी), गोखुरू, बडी कटेरी, पृश्निपर्णी, कण्टकारी,
शालपर्णी, नीम की छाल, पित्तपापडा, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा इनका क्वाथ
८ प्रस्थ, कल्कार्थ, भूम्यामलकी, कचूर, मुनक्का, पोहकरमूल, मेदा, आवला,
मिलित १ शराव, दूध, घृत के सम-परिमाण २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ यथाविधि
लेकर पाक करना चाहिये । [कई आचार्य यहा पर घृत से द्विगुण दूध लेते है]।
यह घृत ज्वर को नष्ट करता है । क्षय, कास, शिरोवेदना, पार्श्वशूल और अस-
वेदना को नष्ट करता है । ज्वर के रोगियों मे यदि दोष की मात्रा अधिक हो तो
बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि कल्पस्थान मे वर्णित सशोधनों (वमन और
विरेचनों) को समय २ पर देवे ॥ २२४-२२७