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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१६
Page 333Permalink
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३१६
जिस पुरुष मे दाप बढे हुए हो और अग्नि मन्द हो, वह पुरुष यदि गुरु
भाजन का सेवन करता है, तो पुरुष सहसा मर जाता है अथवा देर तक कष्ट
पाता है। इन कारणो का देखते हुए वातिक ज्वर मे भी रोगी को प्रथम गुरु
वा स्निग्ध भाजन नही करावे । वातजन्य ज्वर मे यदि पित्त और कफ का
अनुबन्ध न हो तो पूर्वोक्त क्रम की उपेक्षा करके भी अभ्यग आदि का उपक्रम
करे, कषाय पिला कर मास रस का भोजन देवे । जीर्ण ज्वर के लिये जो भी
चिकित्सा है, वह सब वायुजन्य ज्वर मे प्रथम ही करे ॥ २७७-२८० ॥
श्लेष्मलानामावातानां ज्वरोऽनुष्णे कफाधिकः ॥ २८१ ॥
परिपाकं न सप्ताहेनापि याति मृदूष्मणाम् ।
तं क्रमेण यथोक्तेन लङ्घनाल्पाशनादिना ॥ २८२ ॥
आदशाहमुपक्रम्य कषायाद्यैरूपाचरेत् ।
कफ-प्रकृति के पुरुषो मे जब वायु न हो, उष्मा मृदु हो और कफ प्रधान
ज्वर हो, पित्त का अनुबन्ध न हो तो दोष (आम) सात दिन मे भी नही
पकते । इसके लिये पूर्व वर्णित लङ्घन और अल्पाशन विधि का दस दिन तक
प्रयोग करके पीछे से कषाय पान करावे ॥ २८१-२८२ ॥
सामा ये ये च कफजाः कफपित्तज्वराश्च ये ॥ २८३ ॥
लङ्घनं लङ्घनीयोक्तं तेषु कार्यं प्रति प्रति ।
वमनैश्च विरेकैश्च बस्तिभिश्च यथाक्रमम् ॥ २८४ ॥
जो ज्वर साम हो, जो ज्वर कफजन्य हो, कफ-पित्त ज्वर मे, लङ्घनीय
प्रत्येक पुरुष को लङ्घन करावे । आम वायु से मिला हो तो भी लङ्घन करावे ।
कफ निराम हो तो भी लङ्घन करावे । कफयुक्त पित्त की अवस्था मे ही लङ्घन
करावे । परन्तु निराम पित्त मे लङ्घन नही करावे । साम पित्त मे लङ्घन
उत्तम है ॥ २८३-२८४ ॥
ज्वरानुपचरेद्धीमान् कफपित्तानिलोद्भवान् ।
संसृष्टान् सन्निपतितान् बुद्ध्वा तरतमैः समैः ॥ २८५ ॥
ज्वरान्दोषक्रमापेक्षी यथोक्तैरौषधैर्जयेत् ।
कफ-पित्त और वायुजन्य ज्वरो मे क्रमश वमन, विरेचन और बास्तयो द्वारा
चिकित्सा करे । यदि ज्वर कफजन्य हो तो वमन, पित्तजन्य हो तो विरेचन और
वायुजन्य होता बुद्धिमान् वैद्य बस्ति का उपयोग करे ।] ससृष्ट अर्थात् द्वन्द्वज
और सन्निपातजन्य ज्वरो मे दोषो के तार-तम्य तथा समान अवस्था के क्रम की
विवेचना करके पूर्वोक्त औषधियो से चिकित्सा करे ॥ २८५ ॥