चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० ३ ] इन्द्रियस्थानम् १४७
अ० ३ ] इन्द्रियस्थानम् १४७
तस्य चेत्परिमृश्यमानानि पृथक्त्वेन गुल्फ-जानु-वङ्क्षण गुद-वृषण-
मेढ्र-नाभ्यंस-स्तन-मणिक-पर्शूका-हनु-नासिका-कर्णाक्षि-भ्रू-शङ्खादीनि
स्रस्तानि व्यस्तानि च्युतानि वा स्थानेभ्यः स्युः, परासुरय पुरुषो न
चिरात्कालं मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ७॥
भिन्न २ अवयवों के स्पर्श करने पर यदि गुल्फ (टखने), जानु, वङ्क्षण,
गुदा, वृषण, शिश्न, नाभि, अंस, स्तन, हाथ (कलाई), पसुलिया, हनुसन्धि
(जबाड़ा), नासिका, कान, आख, भौंह, शंख आदि सन्धिया व्यस्त अवस्था
मे या इधर उधर अपने स्थानों से खिसकी हों तो समझ लेना चाहिये कि
पुरुष शीघ्र ही मर जायेगा ॥ ७॥
तथाऽस्योच्छ्वास-मन्या-दन्त-पक्ष्म-चक्षुः-केश-लोमोदर-नखाङ्गुलि-
गणं च लक्षयेत् । तस्य चेदुच्छ्वासोऽतिदीर्घोऽतिह्रस्वो वा स्यात् परा-
सुरिति विद्यात् । तस्य चेन्मन्ये परिमृश्यमाने न स्पन्देयातां परासुरिति
विद्यात् । तस्य चेद्दन्ताः परिकीर्णाः श्वेता जातशर्कराः स्युः, परासुरिति
विद्यात् । तस्य चेत्पक्ष्मणि जटाबद्धानि स्युः, परासुरिति विद्यात् ।
इसी प्रकार रोगी पुरुष के उच्छ्वास, मन्या (गले के पार्श्व में जाने वाली
दो धमनया), दात, पक्ष्म (पलक), आख, केश, लोम, पेट, नख और अंगुली
की भी परीक्षा करनी चाहिये । जिस रोगी को श्वास, प्रश्वास, बहुत लम्बा या
छोटा हो जावे, उसे मरा हुआ जाने । जिस रोगी के मन्या धमनियों में धड़कन
प्रतीत न हो, उसे प्राणशून्य जाने । जिसके दात मैल से भरे, श्वेत अथवा शर्क-
राय़ुक्त हो जाये, उसे प्राणरहित जाने । रोगी पुरुष की पलकों के बाल आपस
मे चिपटे (गुझले हुए) हुए हों, उसे भी प्राणरहित जाने ॥
तस्य चेच्चक्षुषी प्रकृतिहीने विकृतियुक्तेऽत्युत्पिण्डितेऽतिप्रविष्टेऽति-
जिह्मेऽतिविषमेऽतिप्रस्रुतेऽतिविमुक्तबन्धने सततोन्मिषिते, सततनिमे-
षिते, निमेषोन्मेषातिप्रवृत्ते, विभ्रान्तदृष्टिके, विपरीतदृष्टिके, व्यस्तदृ-
ष्टिके, नकुलान्धे, कपोतान्धेऽलातवर्णे, कृष्ण-नील-पीत-श्याव-ताम्र-हरि-
त-हारिद्र-शुक्ल-वैकारिकाणा वर्णानामन्यतमेनातिसंप्लुते वा स्यातां,
परासुरिति विद्यात् ।
रोगी की आखे प्रकृतिहीन और विकृति से युक्त अर्थात् बाहर को बहुत
निकली, चक्षु गोलकों में अन्दर धसी, बहुत कुटिल, बहुत विषम अथवा एक
आख खुली और एक बन्द, आख की मासपेशियां बहुत ढीली हो, बहुत शिथिल,
निरन्तर खुली या बन्द रहे, अथवा जल्दी जल्दी खुलें और बन्द हो, अप्रयुक्त
१४८ चरकसंहिता [ अ० ३
दृष्टि, अशुद्ध देखने वाली (विपरीत देखने वाली), हीनदृष्टि (जो दूर से न
देख सके), नकुलान्ध कपोतान्ध अलातवर्ण, अगारे के समान आख लाल ही
दीखे वा काला, पीला, नीला, श्याम, ताम्बे के समान, हरा, श्वेत इन वैकारिक
वर्णों में से किसी एक वर्ण से आक्रान्त हो तो रोगी को मरा हुआ जानना चाहिये।
अथास्य केशलोमान्यायच्छेत्—तस्य चेत्केशलोमान्यायस्यमानानि
प्रलच्चेरन्न च वेद्येयुः परासुरिति विद्यात् ।
शिर के बाल या शरीर के बाल खींचने पर उखड़ आयें और रोगी को
इनके उखड़ने का पता न लगे (दर्द न हो) तो उसको मरा हुआ जानना चाहिये।
तस्य चेदुदरे सिराः प्रदृश्येरन् श्याव-ताम्र-नील-हारिद्र-शुक्ला वा
स्युः परासुरिति विद्यात् ।
यदि रोगी के पेट की शिरायें दीखने लगे अथवा इनका रंग काला, ताम्बे
का रंग, हल्दी के समान पीला या श्वेत हो जाये तो उसे मरा हुआ ही जाने ।
तस्य चेन्नखा वीतमांसशोणिताः पक्वजाम्बववर्णाः स्युः, परासु-
रिति विद्यात् ।
जिस रोगी के नखों का मास और रक्त क्षीण हो जाये, पकी हुई जामुन के
समान नख काले नीले हो जायें तो उसे मरा हुआ समझें ।
अथास्याङ्गुलीरायच्छेत्तस्य चेदङ्गुलय आयम्यमाना न चेत्स्फुटेयुः,
परासुरिति विद्यात् ॥ ८ ॥
रोगी पुरुष की अंगुलियो को पकड़कर खींचे और यदि उसकी अगुलियों में
चटकने की आवाज़ न आये, तो उसे गतायु (मृत) ही समझे ॥ ८ ॥
भवति चात्र—एतान् स्पृश्यान् बहून् भावान् यः स्पृशन्नावबुध्यते ।
आतुरे न स संमोहमायुर्ज्ञानस्य गच्छति ॥ ६ ॥
वर्णन किये हुए स्पृश्य अंगों को स्पर्श करके सम्पूर्ण लक्षणों को जो वैद्य
भली प्रकार से जान लेता है, वह रुग्ण पुरुष के आयुर्ज्ञान मे कभी धोखा
नही खाता ॥ ६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते इन्द्रियस्थाने
परिमर्द्दनीयेन्द्रिय नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
१५० चरकसंहिता [ अ० ४ ]
योऽग्निं प्रकृतिवर्णस्थं नीलं पश्यति निष्प्रभम् ।
कृष्णं वा यदि वा शुक्लमग्नौ वसति १ सप्तमीम् ॥ ११ ॥
मरीचीनसतो मेघान्मेघान्वाप्यसतोऽम्बरे ।
विद्युतो वा विना मेघात् पश्यन्मरणमृच्छति ॥ १२ ॥
मृण्मयीमिव यः पात्रीं कृष्णाम्बरसमावृताम् ।
आदित्यमीक्षते शुद्धं चन्द्रं वा न स जीवति ॥ १३ ॥
अपर्वणि यदा पश्येत्सूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहम् ।
अव्याधितो व्याधितो वा तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ १४ ॥
नक्तं सूर्यमहश्चन्द्रमग्नौ धूममुत्थितम् ।
अग्निं वा निष्प्रभं रात्रौ दृष्ट्वा मरणमृच्छति ॥ १५ ॥
प्रभावतः प्रभाहीनान्निष्प्रभान् वा प्रभावतः ।
खरा विलिङ्गान् पश्यन्ति भावान् प्राणाञ्जिहासवः ॥ १६ ॥
व्याकृतानि विवर्णानि विसरूपोपगतानि च ।
विनिमित्तानि पश्यन्ति रूपाण्यायुःक्षये नराः ॥ १७ ॥
यश्च पश्यत्यदृश्यान् वै दृश्यान् यश्च न पश्यति ।
तावुभौ पश्यतः क्षिप्रं यमालयमसंशयम् ॥ १८ ॥
अब इन्हीं का आगे विस्तार से वर्णन करते हैं—
(१) जो रोगी आकाश को ठोस (कठिन) रूप में देखता है, अथवा
पृथिवी को आकाश की भांति शून्यरूप मे देखता है, दोनों प्रकार का विपरीत
दर्शन करता हुआ पुरुष मृत्युको प्राप्त होता है ।
(२) जिस रोगी को आकाश में बहने वाली (अदृश्य) वायु दिखाई देने
लगे और जलती हुई आग दिखाई न देवे उस रोगी का आयु समाप्त हुआ जाने ।
(३) शुद्ध निर्मल जालरहित जल मे जाल(-तन्तु) देखे और स्थिर पानी
को चलता (बहता) देखे वह भी शीघ्र ही प्राणत्याग करेगा ।
(४) जो रोगी मनुष्य जागता हुआ प्रेत, राक्षस अथवा अन्य किसी प्रकार
का आश्चर्यकारक पदार्थ देखता है वह रोगी जीने में समर्थ नहीं है ।
(५) जो रोगी प्रकृति में स्थित (लाल, कपिल वर्ण की) अग्नि को नीली
और कान्ति से रहित, काली या श्वेत वर्ण की देखता है, वह सातवीं रात्रि में
स्वयं अग्नि (चिता) मे वास करता है ।
(६) जो रोगी आकाश में सूर्य की किरणों के न होने पर भी किरणों को,
१. 'निशा व्रजति, इति च पाठ', वह सातवीं रात चढ बसता है ।
अ० ४ ] इन्द्रियस्थानम् १५१
मेघों के न होते हुए मेघों को आकाश मे देखे, अथवा बिना बादलों के बिजली
को देखे, उसे मरणोन्मुख समझना चाहिये ।
( ७ ) जो रोगी मेघ आदि से न छिपे, शुद्ध सूर्य या चन्द्रमा को काले वस्त्रों
से टपे कटोरे वा मिट्टी के बर्त्तन के रूप मे देखता है, वह नहीं जीता ।
( ८ ) जो मनुष्य ग्रहण-योग के बिना सूर्य या चन्द्रमा में ग्रहण देखता है,
उस स्वस्थ या रोगी पुरुष की आयु समाप्त समझनी चाहिये ।
( ६ ) जिस रोगी को रात्रि में सूर्य, दिन में चन्द्रमा और बिना आग के
धुंवा तथा रात्रि मे प्रभा के बिना आग दीखे [ दिन मे आग का निष्प्रभ
दीखना अरिष्ट नहीं ] उस रोगी को गतायु ( मृत ) समझना चाहिये ।
( १० ) जिन पुरुषों ने अञ्जन आदि नहीं लगाया उनमें अञ्जन आदि देखे
( बिना कान्ति के पुरुषों में कान्ति का दीखना ), तथा प्रभावान् पुरुषों को
निष्प्रभ देखना, इस प्रकार स्वाभाविक लक्षणों से रहित पुरुषों को प्राणों को
छोड़ने वाला पुरुष ही देखता है ।
( ११ ) आयु के क्षय होने पर रोगी मनुष्य पदार्थों के विकृत रूप, विपरीत
रंग, अशुद्ध सख्या से युक्त, बिना कारण के आकृति मे परिवर्त्तन देखता है।
( १२ ) जो मनुष्य अदृश्य रूपों को देखता है और आख से दीखने वाले
पदार्थों को नहीं देखता, वे दोनों निश्चय से शीघ्र ही यमलोक मे जाते हैं ॥६-१८॥
अशब्दस्य च यः श्रोता शब्दान् यश्च न बुध्यते ।
द्वावप्येतौ यथा प्रेतौ तथा ज्ञेयो विजानता ॥ १६ ॥
संवृत्त्याङ्गुलिभिः कर्णौ ज्वालाशब्दं य आतुरः ।
न शृणोति गतासुं तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ २० ॥
( १३ ) जो मनुष्य बिना शब्द के शब्द सुने और शब्द को नहीं सुनता,
इन दोनों मनुष्यों को प्रेत के समान गिनने चाहिये (मरे हुए समझने चाहिये) ।
( १४ ) अगुलियों से कानों को बन्द करने पर जिस रोगी को कानों में
‘ज्वाला-शब्द’ ‘घनघन’ आवाज सुनाई न देवे उसे मरा हुआ समझना चाहिये,
उसकी चिकित्सा न करे ॥ १६-२० ॥
विपर्ययेण यो विद्याद् गन्धाना साध्वसाधुताम् ।
न वा तान् सर्वशो विद्यात्तं विद्याद् विगतायुषम् ॥ २१ ॥
( १५ ) जो मनुष्य शुभ गन्ध को अशुभ और अशुभ गन्ध को शुभ इस
प्रकार विरुद्ध रूप से तथा जो मनुष्य सर्वथा गन्ध को नहीं पहिचानता, इन दोनों
को मरणासन्न समझना चाहिये ॥ २१ ॥
१५२ चरकसंहिता [ अ० ४
यो रसान्न विजानाति न वा जानाति तत्त्वतः ।
मुखपाकादृते पक्कं तमाहुः कुशला नरम् ॥ २२ ॥
( १६ ) जो मनुष्य 'मुख-पाक' के बिना ही रसों को नहीं जानता अथवा
रसों को उनके स्वकीय रूप (जैसे हैं वैसे रूप ) में नहीं पहिचानता, वह
शीघ्र मर जाता है, कुशल पुरुष उसकी आयु को पूर्ण हुई कहते हैं ॥ २२ ॥
उष्णान्वाशीतान् खरान् श्लक्ष्णान्मृदूनपि च दारुणान् ।
स्पृश्यान् स्पृष्ट्वा ततोऽन्यत्वं मुमूर्षुस्तेषु मन्यते ॥ २३ ॥
( १७) जो मनुष्य उष्ण, शीत, खर, श्लक्ष्ण, चिकने, कोमल या कठोर
पदार्थों को स्पर्श करके विपरीत रूप में ( यथा उष्ण को शीत और शीत को
उष्ण ) जानता है वह मरणासन्न है ऐसा समझना चाहिये ॥ २३ ॥
अन्तरेण तपस्तीव्रं योगं वा विधिपूर्वकम् ।
इन्द्रियैरधिकं पश्यन् पञ्चत्वमधिगच्छति ॥ २४ ॥
इन्द्रियाणामृते दृष्टेरिन्द्रियार्थान्न पश्यति ।
विपर्ययेण यो विद्यात्तं विद्याद्विगतायुषम् ॥ २५ ॥
स्वस्थाः प्रज्ञाविपर्यस्तैरिन्द्रियार्थेषु वैकृतम् ।
पश्यन्ति ये सुबहुशस्तेषां मरणमादिशेत् ॥ २६ ॥
( १८ ) जो मनुष्य तीव्र तप के बिना अथवा विधिपूर्वक योगसमाधि से
ज्ञान प्राप्त किये बिना, साधारण मनुष्यों से अधिक इन्द्रिय ज्ञान देखता है,
वह मरणासन्न है । [ समाधि-ज्ञान तथा तीव्र तप ही अतीन्द्रिय ज्ञान करा
सकते हैं ] ।
( १९) जो मनुष्य इन्द्रियों की शक्ति से अप्राप्य पदार्थों को इन्द्रियों
द्वारा देखने या प्राप्त करने लगता है वह जीवित नहीं रहता है ।
( २० ) नीरोग, स्वस्थ पुरुष जो कि बुद्धिदोष के कारण प्रायः करके
( एक बार नहीं ) इन्द्रियों के विषयों को विपरीत रूप में अथवा असद् रूप में
देखते हैं वे शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ २४-२६ ॥
तत्र श्लोकाः - एतदिन्द्रियविज्ञानं यः पश्यति यथातथम् ।
मरणं जीवितं चैव स भिषग्ज्ञातुमर्हति ॥ २७ ॥
जो पुरुष इस इन्द्रिय विज्ञान को भली प्रकार से देखता है, वह वैद्य मृत्यु
और जीवन दोनों को भली प्रकार से जान सकता है ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने
इन्द्रियानीकमिन्द्रियं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥