चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७१
अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७१
यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, यथा द्वापरस्तथा
स्थाविर्यं, यथा कलिरैवमातुर्यं, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति । एव-
मनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश ! सामा-
न्य विद्यात् ॥ ४ ॥
इस पुरुष में पृथिवी कठिन भाग है, क्लेद अर्थात् जलवाला अंश आप (जल)
है, तेज उष्णिमा है, वायु प्राण है, आकाश छिद्ररूप है, ब्रह्म आत्मा है।
जिस प्रकार लोक में ब्रह्म की विभूति है उसी प्रकार पुरुष में अन्तरात्मा की
विभूति (ऐश्वर्य) है। लोक में ब्रह्म की विभूति प्रजापति है, पुरुष में अन्त-
रात्मा की विभूति 'सत्त्व' है। लोक में जो इन्द्र है, पुरुष में वही अहंकार है।
लोक में जो आदित्य है, पुरुष में वही आदान है। लोक में जो रुद्र है पुरुष में
वही रोष (क्रोध) है। लोक का सोम पुरुष में प्रसाद है। लोक में जो वसु हैं,
वे पुरुष में सुख हैं। लोक के दो अश्विनी हैं, पुरुष में वे ही कान्तिरूप हैं।
लोक में जो मरुत हैं पुरुष में वह उत्साह है। लोक में जो विश्वेदेव हैं, पुरुष
में वे इन्द्रियां और इन्द्रियों के विषय हैं। लोक का तम पुरुष में मोह है।
लोक की ज्योति पुरुष में ज्ञान है। जिस प्रकार लोक में सर्ग अर्थात् सृष्टि का
प्रारम्भ है उसी प्रकार पुरुष में गर्भाधान क्रिया है। जिस प्रकार लोक में
सत्युग है उसी प्रकार पुरुष में बाल्य-अवस्था है। जिस प्रकार लोक में
त्रेतायुग है उसी प्रकार पुरुष में यौवन है। जिस प्रकार लोक में द्वापर है उसी
प्रकार पुरुष में बुढ़ापा है। जिस प्रकार लोक में कलियुग है उसी प्रकार पुरुष
में रोग है। जिस प्रकार लोक में युग का समाप्ति है उसी प्रकार पुरुष में मृत्यु
है। इस प्रकार से हे अग्निवेश ! लोक और पुरुष इन दोनों के उन २ विशेष
अवयवों को समानता को अनुमान के द्वारा जान लेना चाहिये जिनका यहां
वर्णन नहीं किया है ॥ ४ ॥
इत्येववादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-एवमेतत्सर्वमनप-
वादं यथोक्तं भगवता लोकपुरुषयोः सामान्यम् । किन्वस्य सामान्यो-
पदेशस्य प्रयोजनमिति ॥ ५ ॥
इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा-हे
भगवन् ! आपने जो लोक और पुरुष की समानता कही है वह बिना किसी
अपवाद के निर्विवाद ठीक है। परन्तु इस समानता के उपदेश का
प्रयोजन क्या है ? ॥ ५ ॥
भगवानुवाच-कथमग्निवेश ! सर्वलोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके
समनुपश्यतः सत्या बुद्धिः समुत्पत्स्यते इति, सर्वलोकं ह्यात्मनि पश्यतो
७२ चरकसंहिता [ अ० ५
भवत्यात्मैव सुखदुःखयो कर्ता नान्य इति, कर्मात्मकत्वाच्च हेत्वादिभि-
र्युक्तः सर्वलोकोऽहमिति विदित्वा ज्ञान पूर्वमुत्थाप्यतेऽपवर्गायेति ।
तत्र संयोगापेक्षी लोकशब्दः, षड्धातुसमुदायो हि सामान्यत-
सर्वलोकः ॥ ६ ॥
भगवान् बोले- हे अग्निवेश क्योंकि-अपने में सम्पूर्ण लोक और सम्पूर्ण
लोक में अपनी समानता देख कर 'सत्य बुद्धि' उत्पन्न होती है । सम्पूर्ण लोक
को अपने में देखने से प्रतीत होता है कि अपना आत्मा ही सुख-दुःख का
कर्त्ता है और दूसरा नहीं। कर्म के कारण यह सब कुछ होने से तथा आगे कहे
जाने वाले हेतु आदि से 'मैं सम्पूर्ण लोक हूं' ऐसा जान लेने पर ही मोक्ष के
लिये प्रथम ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यहां 'लोक' शब्द संयोग की अपेक्षा से
है। छः धातुओं का समुदाय ही सामान्यत 'सर्वलोक' है ॥ ६ ॥
तस्य हेतुरुत्पत्तिर्वृद्धिरुपप्लवो वियोगश्च । तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं,
उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनं, उपप्लवो दुःखागम । षड्धातुविभागो
वियोगः, स जीवापगमः, स प्राणनिरोधः, स भङ्गः, स लोकस्वभावः ।
तस्य मूलं सर्वोपप्लवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्तिरुपरमः । प्रवृत्तिर्दुःख
निवृत्तिः सुखमिति यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत्सत्य, तस्य हेतुः सर्वलोकसामा-
न्यज्ञान, तत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति ॥ ७ ॥
उसके उत्पत्ति, वृद्धि, उपप्लव और वियोग ये पाच हेतु हैं। इनमें से
उत्पत्ति के कारण को 'हेतु' कहते हैं। उत्पत्ति का अर्थ 'जन्म' है। वृद्धि का
अर्थ है बढ़ना। दुःख का आना 'उपप्लव' है, छ धातुओं के विभाग का नाम
'वियोग' है, यही जीव का देह से पृथक् होजाना है। इसी को प्राण का नाश
और इसी को 'भग' कहते हैं। यह लोक का स्वभाव है। सब सुख दुःखों को
प्रवृत्ति इसका मूल कारण है। सब से उपरम निवृत्ति है। प्रवृत्ति दुःख है,
निवृत्ति सुख है। जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह सत्य है । इस सत्य ज्ञान का
कारण सम्पूर्ण लोक की समानता का ज्ञान होना है। समानता के उपदेश करने
का यही प्रयोजन है ॥ ७ ॥
अथाग्निवेश उवाच-किंमूला भगवन् ! प्रवृत्तिर्निवृत्तौ वा उपाय
इति ॥ ८ ॥
अग्निवेश ने पूछा- हे भगवन् ! ससाररूप प्रवृत्ति का कारण तथा मोक्ष
रूप निवृत्ति का उपाय क्या है ? ॥ ८ ॥
भगवानुवाच - मोहेच्छा-द्वेष-कर्म-मूला प्रवृत्तिः, तज्जा ह्यहङ्कार-
सङ्ग-संशयाभिसंप्लवाभ्यवपात-विप्रत्ययाविशेषाऽनुपायास्तरुणमिव द्रुम-
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७३
मतिविपुलशाखास्तरवोऽभिभूय पुरुषमवतत्यैवोत्तिष्ठन्ते, यैरभिभूतो न
सत्तामतिवर्तते ।
भगवान् आत्रेय बोले—मोह (मिथ्याज्ञान), इच्छा, द्वेष और कर्म (धर्मा-
धर्म) इनके कारण से प्रवृत्ति होती है। जैसे—एक छोटे वृक्ष को इसी वृक्ष से
उत्पन्न बहुत बड़ी बड़ी शाखाये और अन्य अनेक वृक्ष घेर लेते है, उसी प्रकार
इन मोह आदि से उत्पन्न अहंकार (मैं हू ऐसा भाव), अच्छा बुरा सग,
सशय, अभिसप्लव (अपने को सब कुछ मानना), अभ्यवपात (बाह्य सम्बन्धों
की ममता में फसना), विप्रत्यय (विपरीत प्रतीति करना), अविशेष (धर्म
अधर्म आदि मे समान प्रतीति) और अनुपाय (स्नान, मार्जन, होम, जप,
अग्नि मे प्रवेश आदि अवास्तविक उपायो का अवलम्बन) पुरुष को घेर कर
स्वय प्रबल हो जाते हैं। इनसे दब कर पुरुष अपनी वास्तविक सत्ता वा प्रवृत्ति
के कारण को नहीं जान सकता ।
तत्रैवजाति-रूप-वित्त-वृत्त-बुद्धि-शील-विद्याभिजन-वयो-वीर्य-
प्रभाव-सपन्नोऽहमित्यहङ्कारः, यद्यन्मनोवाक्कायकर्म नापवर्गाय स सङ्गः।
कर्मफल-मोक्ष-पुरुष-प्रेत्यभावादयः सन्ति वा नेति सशयः, सर्वास्ववस्थास्व-
नन्योऽहमहं स्रष्टा स्वभावसंसिद्धोऽहमहं शरीरेन्द्रिय-बुद्धि-स्मृति-विशेष-
राशिरिति ग्रहणमभिसप्लवः, मम मातृ पितृ-भ्रातृ-दारापत्य-बन्धु-मित्र-
भृत्य-गणो गणस्य चाहमित्यभ्यवपातः, कार्याकार्य-हिताहित-शुभाशुभेषु
विपरीताभिनिवेशो विप्रत्ययः, ज्ञाज्ञयोः प्रकृतिविकारयोः प्रवृत्तिनिवृ-
त्त्योश्च सामान्यदर्शनमविशेषः, प्रोक्षणानशनाग्निहोत्र-त्रिःसवनाभ्युक्ष-
णावाहन-यजन-याजन याचना-सलिल-हुताशन-प्रवेशादयः समारम्भाः
प्रोच्यन्ते ह्यनुपायाः ।
इस अवस्था मे वह जाति, रूप, वित्त, आचार, बुद्धि, शील, विद्या, कुटुम्ब,
वय, वीर्य, प्रभाव से मैं ऐश्वर्य्यशाली हूँ ऐसा भाव होना 'अहकार' है । मन,
वाणी, शरीर के जो कार्य मोक्ष के लिये न हों वह 'सग' है । कर्मों के फल, मोक्ष,
पुरुष (आत्मा) प्रेत्यभाव अर्थात् पुनर्जन्म आदि है या नहीं इसका नाम
'सशय' है। सब अवस्थाओं में मैं ही एक मात्र हूँ, मैं ही स्रष्टा हूँ, मै स्वभाव
से सिद्ध हूँ, मै ही शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, स्मृति विशेष का समूह हूँ-ऐसा सम-
झना अभिसप्लव है । मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भाई, मेरी स्त्री, मेरे पुत्र, मेरे
बन्धु, मेरे मित्र, मेरे भृत्य आदि और मै इनका हूँ, इसी का नाम ममता 'अभ्य
वपात' है । कार्य-अकार्य, हित-अहित, शुभ-अशुभ में विपरीत (कार्य में अकार्य
और अकार्य में कार्य आदि का) ज्ञान होना 'विप्रत्यय' है । ज्ञानी-अज्ञानी
७४ चरकसंहिता [ अ० ५
प्रकृति-विकार, प्रवृत्ति-निवृत्ति इनमें समानता देखना 'अविशेष' है। प्रोक्षण,
उपवास, अग्निहोत्र, तीनवार भली प्रकार स्नान, अभ्युक्षण ( जल से मार्जन ),
आवाहन, यजन, याजन, याचना ( प्रार्थना ) जल में प्रवेश या अग्नि में प्रवेश
आदि कर्म परम मोक्ष के उपाय नहीं हैं, तो भी उनका उपाय समझना यह
'अनुपाय' है।
एवमयमधी धृति-स्मृतिरहङ्काराभिनिविष्टः सक्त ससशयोऽभिसंप्लु-
तबुद्धिरभ्यवपतितोऽन्यथादृष्टिरविशेषग्राही विमार्गगतिर्निवासवृक्षः
सत्त्व-शरीर-दोष-मूलानां मूलं सर्वदुःखानां भवति । एवमहङ्कारादिभि-
र्दोषैर्भ्राम्यमाणो नानिवर्तते प्रवृत्ति, सा च मूलमघस्य ॥ ६ ॥
इस प्रकार से यह पुरुष बुद्धि, धृति और स्मृति से रहित, अहङ्कार से अह-
ङ्कारी होकर, मोक्ष से दूर करने वाले कार्यों में फस कर, कर्मफल, मोक्ष, आत्मा
आदि मे सन्देह करता हुआ, अपने को ही कर्त्ता, धर्त्ता आदि सब कुछ समझता
हुआ, 'ये मेरे मै इनका' इस ममता के गड्ढे मे गिरा हुआ, अन्यथा-दृष्टि
अर्थात् सम्यग् दृष्टि से रहित होकर, धर्म-अधर्म, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि में
विशेष विवेक न करता हुआ, विपरीत मार्ग से चलता हुआ चित्त और शरीर
के दोषों से उत्पन्न होने वाले समस्त दुःखों का निवास वृक्ष हो जाता है। इस
प्रकार से अहङ्कार आदि आठ दोषों के कारण चक्कर खाता हुआ प्रवृत्ति
( संसार ), से निकल नही सकता और यह प्रवृत्ति ही पाप का कारण है ॥६॥
निवृत्तिरपवर्गस्तत्परं तत् प्रशान्त तदक्षरं तद् ब्रह्म स मोक्षः । तत्र
मुमुक्षूणामुदयनानि व्याख्यास्यामः—
निवृत्ति का नाम 'अपवर्ग' है। यही परम सर्वश्रेष्ठ शान्त पद है, यही
अक्षर, यही ब्रह्म और इसी को मोक्ष कहते है। इस प्रसंग में मुमुक्षु पुरुषों के
लिये उन्नति के उपायों का उपदेश करते हैं।
तत्र लोकदोषदर्शिनो मुमुक्षोरादित एवाऽऽचार्याभिगमन, तस्योपदे-
शानुष्ठान, अग्नेरेवोपचर्या, धर्मशास्त्रान्वगमन १, तदर्थावबोधः, तेना-
वष्टम्भः, तत्र यथोक्ताः क्रियाः, सतामुपासनमसतां परिवर्जन, अस-
ङ्गत्तिर्दुर्जनैन, सत्य सर्वभूतहितमपरुषमनतिकाले परीक्ष्य वचन, सर्व-
प्राणिष्वात्मनीवावेक्षा, सर्वांसामस्मरणमसंकल्पनमप्रार्थनमनभिभा-
षण च स्त्रीणा, सर्वपरिग्रहत्यागः, कौपानं प्रच्छादनार्थं धातुरागनि-
वसन, कन्थासीवनहेतोः सूचीपिप्पलकं, शौचाधानहेतोर्जलकुण्डिका,
१. 'सर्वप्रवृत्तिष्ववसङ्गा' इति च पाठः ।