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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ८] शारीरस्थानम् १०६

अ० ८] शारीरस्थानम् १०६
संतान को उत्पन्न करती है। जिस जिस रोग के जो जो कारण कहे हैं, उन २
कारणों को सेवन करने वाली माता उसी उसी रोग से ग्रस्त संतान को उत्पन्न
करती है गर्भ का नाश करने वाले पिता के शुक्र दोषों की व्याख्या माता के किये
अपचारों से कर दी है ॥ १६ ॥
तस्मादहितानाहारविहारान् प्रजासंपदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेण वर्ज-
येत्। साध्वाचारा चाऽऽत्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहारविहाराभ्याम् ॥२०॥
इसलिये जो स्त्री यह चाहे कि उसकी संतान गुणवती हो वह अहितकारी
आहार-विहार का विशेष रूप से त्याग कर दे। वह साधु आचार से रह कर
हितकारी आहार-विहार का सेवन करे ॥ २० ॥
व्याधींश्चास्या मृदु-मधुर-शिशिर-सुख सुकुमार-प्रायैरौषधाहारोपचारै-
रुपचरेत् । न चास्या वमन-विरेचन-शिरोविरेचनानि प्रयोजयेत्, न रक्त-
मवसेचयेत्, सर्वकालं च नास्थापनमनुवासनं वा कुर्यादन्यत्रात्ययिका-
द्वयाधेः। अष्टमं मासमुपादाय वमनादिसाध्येषु पुनर्विकारेष्वात्ययिकेषु
मृदुभिर्वमनादिभिस्तदर्थकारिभिर्वोपचारः स्यात्, पूर्णमिव तैलपात्रम-
सङ्क्षोभयताऽन्तर्वत्नी भवत्युपचर्या ॥ २१ ॥
गर्भिणी के रोगों की चिकित्सा मृदु, मधुर, शीतल, सुख और सुकुमारप्राय
औषधियों और ऐसे ही आहार विहारों से करनी चाहिये। गर्भिणी को वमन,
विरेचन अथवा शिरोविरेचन नही देने चाहिये। रक्तमोक्षण भी नहीं करना
चाहिये। कोई खास रोग को छोड़ कर हर समय आस्थापन या अनुवासन क्रिया
भी नहीं बरतनी चाहिये । आठवा मास लग जाने पर यदि कोई ऐसा रोग आ
पड़े जिसमें कि वमन आदि क्रिया आवश्यक ही हो, तब कोमल रूप में वमन आदि
क्रियाओं को करावे, अथवा ऐसी ही क्रिया करने वाले अन्य उपाय करने चाहियें ।
गर्भ को तैल से भरे पात्र के समान जान कर क्षोभ आदि उत्पन्न न करते हुए
गर्भिणी का उपचार करना चाहिये ॥ २१ ॥
सा चेदपचाराद् द्वयोस्त्रिषु वा मासेषु पुष्पं पश्येन्नास्या गर्भः स्था-
स्यतीति विद्यात् । अजातसारा हि तस्मिन् काले भवन्ति गर्भाः ॥२२॥
यदि अपचार के कारण दूसरे या तीसरे मास में गर्भिणी को रजोदर्शन हो
जाय तो समझना चाहिये कि इसको गर्भ नहीं रहेगा, क्योंकि इस समय तक गर्भ
मे सार उत्पन्न नही होता ॥ २२ ॥
सा चेच्चतुष्प्रभृतिषु मासेषु क्रोध-शोकासूयेर्ष्या-भय-त्रास-व्यवाय-व्या-
याम-सङ्क्षोभ-संधारण-विषमासन-शयन-स्थान-क्षुत्पिपासाद्यतियोगात्क-
दाहाराद्वा पुष्प पश्येत्तस्या गर्भ-स्थापन-विधिमुपदेक्ष्यामः।

११० चरकसंहिता [ अ० ८
यदि गर्भिणी को चौथे आदि मासों मे क्रोध, शोक, ईर्ष्या, भय, त्रास, मैथुन,
व्यायाम, विक्षोभ, वेगों के रोकने, विषम आसन, विषम शयन, विषम स्थान,
भूख, प्यास के अति वेग से अथवा कुत्सित आहार के कारण पुष्प दर्शन होने
लगे उसके लिये गर्भ स्थापन विधि का उपदेश करते हैं ॥
पुष्पदर्शनादेवैना ब्रूयात् शयनं तावन्मृदु-सुख-शिशिरास्तरणं संस्ती-
र्णमीषदवनतशिरस्कं प्रतिपद्यस्वेति, ततो यष्टी-मधुक-सर्पिर्भ्यां परम-
शिशिर वारिणि संस्थिताभ्यां पिचुनासाव्योपस्थसमीपे स्थापयेत्तस्या ।
तथा शतधौत-सहस्रधौताभ्यां सर्पिर्भ्यामधो नाभेः सर्वतः प्रदिह्यात् ।
गव्येन चैनां पयसा सुशीतेन मधुकाम्बुना वा न्यग्रोधादिकषायेण
वा परिषेचयेदधो नाभेः । उदके वा सुशीतमवगाहयेत्, क्षीरिणां
कषायद्रुमाणां च स्वरसपरिपोतानि चेलानि ग्राहयेत् । न्यग्रोधादिसिद्ध-
योर्वा क्षीरसर्पिषोः पिचुं ग्राहयेत्, अतश्चैवाक्षमात्रं प्राशयेत् । प्राशयेद्वा
केवलं च क्षीरसर्पिः । पद्मोत्पल-कुमुद-किञ्जल्काश्चास्य समधुशर्करान्
लेहार्थं दद्यान् । शृङ्गाटक-पुष्करबीज-कशेरुकांश्च भक्षणार्थं, गन्ध-प्रियङ्गु
सितोत्पल-शालकोडुम्बर-शलाडु-न्यग्रोध शुङ्गानि वा पाययेदेनामाजेन
पयसा। पयसा चैनां बलातिबला-शालि-षष्टिकेशुमूल-काकोली-श्रुतेन
समधुशर्करं रक्तशालीनामादनं मृदु-सुरभि-शीतं भोजयेत् । लाव-कपि-
ञ्जल-कुरङ्ग-शम्बर-शश-हरिणैण कालपुच्छक-रसेन वा घृत-सलिल-सिद्धेन
सुख-शिशिरोपवात-देशस्था भोजयेत्, तथा क्रोध-शोकायासं-व्यवाय-व्या-
यामतश्चाभिरक्षेत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोऽनुकूलाभिरुपासीत,
तथाऽस्या गर्भस्तिष्ठति ॥ २३ ॥
पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर वैद्य इस गर्भिणी को आदेश देवे—
बिस्तर कोमल, सुखकारक, शीतल गद्देदार बनावे । इसका शिरोभाग पायते
से जरा नीचे रखे । फिर मुलहठी और घी को मिला कर बहुत ठण्डे पानी में
रख कर ठण्डा होने पर इससे फाया भिगो कर योनि में रखे । शतधौत या
सहस्रधौत ( पानी मे सौ बार या हजार बार धोये ) घी को नाभि के नीचे के
प्रदेश में चारों ओर लगा देना चाहिये । नाभि के निचले भाग पर गाय के
दूध से अथवा मुलहठी के ठण्डे क्वाथ से या वट आदि के शीतल कषाय से
परिसेचन करना चाहिये । अथवा खूब शीतल जल मे बिठावे। दूध वाले (बड़-
पीपल, गूलर आदि ) वृक्षों के या कषाय वृक्ष ( जामुन, पिलखन आदि ) के
स्वरस मे भीगे हुए कपड़ों को रखवावे । बड़, पीपल, गूलर आदि के कोमल
शुंगों ( फुनगियों ) से सिद्ध घी और दूध के फाया को रखवावे । इसी सिद्ध घी