चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४३
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २४३
अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति को सदा रसायनसेवी ही जाने । इन सद् वृत्तों के
पालनसे रसायनका सेवन करता है, उसको रसायनके पूर्ण गुण मिलते हैं ॥३० ३५॥
यथा स्थूलमनिर्हृत्यदोषाञ्छारीरमानसान् ।
रसायनगुणैर्जन्तुर्युज्यते न कदाचन ॥ ३६ ॥
योगा ह्यायुःप्रकर्षार्था जरारोगनिबर्हणाः ।
मनःशरीरशुद्धानां सिध्यन्ति प्रयतात्मनाम् ॥ ३७ ॥
तदेतन्न भवेद्वाच्यं सर्वमेव हतात्मसु ।
अरजोभ्यो¹ द्विजातिभ्यः शुश्रूषा येषु नास्ति च ॥ ३८ ॥
ये रसायनसयोगा वृष्ययोगाश्च ये मताः ।
यच्चौषधं विकाराणा सर्वं तद्वैद्यसंश्रयम् ॥ ३६ ॥
प्राणाचार्यं बुधस्तस्माद्धीमन्तं वेदपारगम् ।
अश्विनाविव देवेन्द्रः पूजयेदतिशक्तितः ॥ ४० ॥
शारीरिक एव मानसिक दोषों को दूर किये बिना जो व्यक्ति रसायन का
सेवन करता है, वह रसायन के मोटे मोटे गुणों को छोड़कर शेष सूक्ष्म गुणों को
प्राप्त नहीं करता । आयु को लम्बा करनेवाले तथा बुढ़ापे को दूर करने वाले
रसायन के प्रयोग उन्हीं पुरुषों में सफल होते हैं, जो जितेन्द्रिय हैं, जिनके
शरीर और मन शुद्ध हैं। जिनका आत्मा सदा पापों मे लिप्त रहता हो उनको
रसायन विधि नहीं सुनानी चाहिये । जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) पीड़ा
से हीन, शारीरिक, मानसिक रोग, रज, तम आदि से रहित हों, जो श्रद्धा से
रसायन के गुणों को सुनना नहीं चाहते, उनको भी नहीं बताना चाहिये । जो
रसायन के योग हैं, और जो वृष्य प्रयोग हैं, तथा जो ज्वरादि रोगों की औषध
हैं, ये सब वैद्य के ही अधीन है। इसलिये विद्वान् का कर्तव्य है कि बुद्धिमान
वेद (आयुर्वेद) में निष्ठ, प्राणाचार्य (वैद्य) का पूर्ण शक्ति के साथ ऐसे
पूजन-सत्कार करे जिस प्रकार कि देवराज इन्द्र ने अश्वियों की
पूजा की थी ॥ ३६–४० ॥
अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतौ ।
यज्ञस्य² हि शिरश्छिन्नं पुनस्ताभ्या समाहितम् ॥ ४१ ॥
- प्रशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च ।
वज्रिणश्च भुजस्तम्भस्ताभ्यामेव चिकित्सितः ॥ ४२ ॥
१. 'अब्जेभ्यो' इति च पाठः । २. 'दक्षस्य' इति च पाठः ।
२४४ चरकसंहिता [ अ० १
चिकित्सितस्तु १शीतांशूर्गृहीतो राजयक्ष्मणा ।
सोमाभिपतितश्चन्द्रः कृतस्ताभ्यां पुनः सुखी ॥ ४३ ॥
भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः ।
वीतवर्णस्वरोपेतः कृतस्ताभ्यां पुनर्युवा ॥ ४४ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभि कर्मभिर्भिषगुत्तमौ ।
बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां महात्मनाम् ॥ ४५ ॥
ग्रहाः स्तोत्राणि मन्त्राणि तथाऽन्यानि२ हवींषि च ।
धूमाश्च पशवस्ताभ्यां प्रकल्प्यन्ते द्विजातिभिः ॥ ४६ ॥
प्रातश्च सवने सोमं शक्रोऽश्विभ्या सहाश्नुते ।
सौत्रामण्यां च भगवानश्विभ्यां सह मोदते ॥ ४७ ॥
इन्द्राग्नी चाश्विनौ चैव स्तूयन्ते प्रायशो द्विज ।
स्तूयन्ते वेदवाक्येषु न तथाऽन्या हि देवताः ॥ ४८ ॥
अमरैरजरैस्तावद्विबुधैः साधिपैर्ध्रुवैः ।
पूज्येते प्रयतरेवमश्विनौ भिषजाविति ॥ ४९ ॥
मृत्युव्याधिजरावश्यैर्दुःखप्रायैः सुखार्थिभिः ।
कि पुनर्भिषजो मर्त्यैः पूज्याः स्युर्नातिशक्तितः ॥ ५० ॥
अश्वियो के कार्य—देवों के चिकित्सक अश्वियों को यज्ञवाहक कहा जाता
है । जब तक इनको भाग नहीं मिलता तब तक कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता३ ।
प्राचीन काल मे दक्ष (यज्ञ) का शिर कट गया था, इन्होने ही फिर से उसको
जोड़ा था । पूषा के दात टूट गये थे, भग की आँखें नष्ट हो गई थीं, इन्द्र को
भुजस्तम्भ होगया था इन अश्वियों ने ही सब की चिकित्सा की थी । चन्द्रमा
को जब यक्ष्मा रोग हो गया था, तब इन्होने ही चिकित्सा की थी । चन्द्रमा का
जब सोम (वीर्य) नष्ट हो गया था, तब इन्होने ही इसको स्वस्थ किया था ।
भृगुवंश में उत्पन्न च्यवन ऋषि अत्यन्त कामी होने से शीघ्र वृद्ध हो गये थे,
उनके वर्ण, स्वर नष्ट हो गये थे, इन अश्वियों ने पुनः उनको युवा कर दिया था । इन
उपरोक्त कार्यों से तथा अन्य कार्यों के कारण चिकित्सा मे श्रेष्ठ दोनों अश्विगौ इन्द्र
आदि महात्माओं के अत्यन्त पूजापात्र हो गये थे । द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य) लोग अश्वियों के लिये ग्रह (सोम पान के पात्र), स्तोत्र, मंत्र, अन्य
१. 'चिकित्सितः शशी ताभ्या' इति च पाठः । २. 'तथा नाना' इति च
पाठः । ३. अश्वियों के यज्ञ-भाग की कथा के लिये महाभारत में च्यवन ऋषि
की कथा देखिये ।