चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८७
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८७
गर्भ को भूख प्यास का अनुभव नही होता । वह तो माता के आश्रित
रहता है, इसी लिये पराधीन रहता है। जब तक अंगों का निर्माण नहीं होता,
वह माता के आश्रय मे ही उपस्नेहन, उपस्वेदन द्वारा जीता है इसके अनन्तर
अग प्रत्यग बन जाने पर लोम कूप के मार्गों से तथा नाभि नाड़ी के मार्ग से
उपस्नेहन लेता है । इस गर्भ की नाभि मे नाड़ी लगी होती है और यह नाड़ी
नाभि मे तथा अपरा मे लगी होता है । अपरा माता के हृदय ( गर्भाशय के
ऊर्ध्व शिखर ) मे लगी रहती है । माता का हृदय इस अपरा की बहती हुई
सिराओं द्वारा गर्भ तक पहुचता है [ माता के विचार इन सिराओ द्वारा बच्चे
मे आते है ] । माता का यह रस गर्भ में बल वर्ण को उत्पन्न करता है । वह
सब प्रकार के रसो से उत्पन्न होता है । जो गर्भवती स्त्री भोजन करती है, उसके
आहार रस के तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) गर्भिणी के शरीर की पुष्टि के लिये
( २ ) दूध के लिये और ( ३ ) गर्भ को बढाने के लिये । यह गर्भ इस आहार
के आश्रय से पराधीन होकर माता के ऊपर निर्भर रह कर गर्भाशय मे जीवन
धारण करता है । २१॥
स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूति-मारुत-योगात्परिवृत्त्याऽवाक्शिरा
निष्क्रामत्यपत्यपथेन । एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा । परं
त्वतः स्वतन्त्रवृत्तिर्भवति ॥२२॥
प्रसव काल के समीप आने पर वायु के बल से शिर घूम कर नीचे की
ओर सन्तान निकलने के मार्ग में आ जाता है और योनिमार्ग से बाहर निकल
जाता है । यह तो प्रकृति है, इससे विपरीत अवस्था का नाम विकृति है। बाहर
आने पर गर्भ स्वतन्त्र रूप से जीवन धारण करता है ॥२२॥
तस्याऽऽहारोपचारौ जातिसूत्रीयोपदिष्टावविकारकरौ चाभिवृद्धि-
करौ भवतः । ताभ्यामेव च ( सेविताभ्या ) विषमाभ्यां जातः सद्यो
हन्येत तरुरिवाचिरव्यपरोपितो वातातापाभ्यामप्रतिष्ठितमूलः ॥ २३ ॥
स्वतन्त्र वृत्ति होने पर जातिसूत्रीय ( शारीरस्थान अ० ८ ) अध्याय में कहे
हुए आहार और उपचार इसकी वृद्धि करते हैं और किसी प्रकार का रोग या
विकार उत्पन्न नही करते । उत्पन्न हुआ शिशु आहार और उपचार के विषम
होने से शीघ्र ही ऐसे मर जाता है जैसे कि तत्काल लगा हुआ वृक्ष बिना जड़
पकड़े हुए वायु और धूप से शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ २३ ॥
आप्तोपदेशादद्भुतरूपदर्शनात्समुत्थान-लिङ्ग-चिकित्सित-विशेषाच्चादो-
षप्रकोपानुरूपा देवादि-प्रकोप-निमित्ता विकाराः समुपलभ्यन्ते ॥ २४ ॥
ब्रह्मा आदि से प्रणीत कुमारतन्त्रों के आप्तोपदेश से, अमानुषीय बल, रूप
आदि आश्चर्यकारक बातों के देखने से, समुत्थान ( रोगोत्पत्ति ) के कारणों के
विशेष होने से, लक्षणों के विशेष तथा चिकित्सा में भेद होने से और दोष प्रकोप
से हुए रोगों के विपरीत वर्णवाले लक्षणो को देखने से ज्ञात होता है कि देव
आदि के प्रकोप से भी अनेक रोग गर्भ को होते हैं ॥ २४ ॥
कालाकालमृत्योस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः—यः
कश्चिन्म्रियते स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमस्तीत्येके । तच्चा
सम्यक् , न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षण-
स्वभावात् ।
काल और अकाल मृत्यओं के होने न होने के विषय में हमारा यह निश्चित
सिद्धान्त है कि ‘जो कोई मरता है, वह काल में ही मरता है। कइयों का विचार
है कि काल में कोई छेद ( अवकाश ) नहीं है जो कि इस अवकाश को प्राप्त
करके मरे।' यह मत ठीक नहीं। काल में सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं है.
क्योंकि काल के अपने लक्षण मे सच्छिद्रता या अच्छिद्रता नहीं घटती ।
तथाऽऽहुरपरे—यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः। स
सर्वभूतानां सत्यः, समक्रियत्वादिति ।
दूसरे विचारकों का कथन है कि जो जब मरता है वह उसका निश्चित काल
होता है यह कालमृत्यु है । यह सब प्राणियों के लिये ठीक है, क्योकि काल
सब प्राणियों में समान क्रियावाला है । काल से सभी मरते हैं काल को किसी में
राग या द्वेष नहीं है ।
एतदपि च अन्यथाऽर्थग्रहणं, न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः ।
काल पुनःरायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते । यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते तस्य
स नियतो मृत्युकाल इति, तस्य सर्वभावा यथास्वं नियतकाला भवि-
ष्यन्ति । तच्च नोपपद्यते—प्रत्यक्षं ह्यकालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं
विपर्यये चेष्टम् । प्रत्यक्षतश्चोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तितासु तास्व-
वस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य । तद्यथा—कालोऽयमस्य तु व्याधेराहा-
रस्र्यौषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य चाकालो वेति । लोकेऽप्येतद्भवति
काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्य
काले तपति, काले पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति । तस्मादुभयमस्ति
काले मृत्युरकाले च । नैकान्तिकं । यदि ह्यकाले मृत्युर्नस्यान्नियत-काल-
प्रमाणमायुः सर्वं स्यात् । एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्प्रत्यक्षानु-