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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ६ ] ११ इन्द्रियस्थानम् १६१

अ० ६ ] ११ इन्द्रियस्थानम् १६१
( ५ ) जिस रोगा को दिन के पूर्वभाग मे ज्वर आता है, तथा भयंकर
सूखी खासी हो [ वा जिसको दिन के उत्तर भाग में ज्वर आवे और बलगमदार
खासी का भयंकर वेग हो ] और शरीर में बल और मास क्षीण हो गये हो, ऐसा
रोगी प्रेत के समान मरा हुआ ही है ॥ १० ॥
यस्य मूत्रं पुरीषं च ग्रथितं संप्रवर्तते ।
निरूष्मणो जठरिणः श्वसनो न स जीवति ॥ ११ ॥
( ६ ) जिस उदर-रोगी का मल और मूत्र घना ( गाठ सा ), तथा ठण्डा
होता है ? वह रोगी सास लेता हुआ भी नहीं जीना ॥ ११ ॥
श्वयथुर्यस्य कुक्षिस्या हस्तपादं विसर्पति ।
ज्ञातिसंघ स सक्लेशय तेन रोगेण हन्यते ॥ १२ ॥
श्वयथुर्यस्य पादस्थस्तथा स्रस्ते च पिण्डिके ।
सीदतश्चाप्युभे शङ्खे तं भिषक्परिवर्जयेत् ॥ १३ ॥
शूनहस्तं शूनपादं शूनगुह्योदरं नरम् ।
हीनवर्णबलाहारमौषधैर्नोपपादयेत् ॥ १४ ॥
( ७ ) जिस पुरुष की कोख (उदर) में शोथ उत्पन्न होकर हाथ, पाव की
आर फलने लगता है, वह भाई बन्धुओं को बहुत कष्ट देकर मरता है, वह स्वयं
भा बहुत दुःख भोगता है और अन्त मे मरता है।
( ८ ) जिस रोगी के पाओं में शोथ उत्पन्न हो, पिण्डलियां ढीली पड़ जायें
तथा दोनों शंख प्रदेश दब जाये, वैद्य ऐसे रोगी की चिकित्सा नहीं करे ।
( ९ ) जिस रोगी के हाथ, पाव, गुह्य प्रदेश ( लिङ्ग ) तथा पेट सूज जायें
और वर्ण, बल और आहार क्षीण हो जाये, वैद्य ऐसे रोगी को औषध न
देवे ॥ १२-१४॥
उरोयुक्तो बहुश्लेष्मा नीलः पीतः सलोहितः ।
सततं ष्ठीवते यस्य दूरात्तं परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
हृष्टरोमा सान्द्रमूत्रः शूनः कासज्वरार्दितः ।
क्षीणमांसो नरो दूराद्भव्यो वैद्येन जानता ॥ १६ ॥
त्रय. प्रकुपिता यस्य दोषाः कष्टामिलक्षिताः ।
कृशस्य बलहीनस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ १७ ॥
ज्वरातिसारौ शोफान्ते श्वयथुर्वा तयोः क्षये ।
दुर्बलस्य विशेषेण नरस्यान्ताय जायते ॥ १८ ॥

१६२ चरकसंहिता [ अ० ६

(१०) जिसकी छाती में सचित हुआ बहुत कफ नीले पीले रक्त के साथ
निरन्तर निकलता रहता है, ऐसे रोगी को दूर से ही छोड़ दे।
(११) जिसका मूत्र गाढा हो, शरीर पर रोमाच हो अगों पर सूजन आ
जाये खासी और ज्वर से पीड़ित शरीर का मास क्षीण हो गया हो, ऐसे रोगी
को वैद्य जान बूझ कर दूर से ही छोड दे।
(१२) जिस कृश, बलहीन पुरुष के तीनों दोष कुपित होकर भिन्न २
पीड़ा के कारण हो उस पुरुष की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। [ कही 'कोष्ठा
भिलक्षिताः' पाठ है, वहा अर्थ है—तीनो दोष कोठे में देखे जायें ]।
(१३) जिस निर्बल मनुष्य को सूजन के पीछे ज्वर और अतिसार हों,
अथवा ज्वर और अतिसार के पीछे जिसको सूजन हो जाय, वह उसकी मृत्यु
का कारण होता है ॥ १५-१८ ॥
पाण्डुरश्च कृशोऽत्यर्थं तृष्णयाऽभिपरीप्लुतः ।
डम्बरी कुपितोच्छ्वासः प्रत्याख्येयो विजानता ॥ १९ ॥
(१४) पाण्डु रोगी, अति कृश, अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो, डम्बरी
अर्थात् जिसकी आखें स्थिरता से घूर कर देखें और जिसका श्वास कुपित हो,
ऐसा रोगी भी जवाब देने योग्य है, चिकित्सा के लिये अयोग्य है ॥ १९ ॥
हनुमन्याग्रहस्तृष्णा बलह्रासोऽतिमात्रया ।
प्राणाश्चोरसि वर्तन्ते यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २० ॥
ताम्यत्यायच्छते शर्म न किञ्चिदपि विन्दति ।
क्षीणमांसबलाहारो मुमूर्षुरचिरान्नरः ॥ २१ ॥
(१५) जिस रोगी को हनुग्रह (जबाड़ी का बन्द होना), मन्याग्रह
(गर्दन की मन्या नामक शिराओं का अकड़ना), तृष्णा और शक्ति का अति
ह्रास हो, तथा जिसकी छाती में सास रुक रहे हों, ऐसे रोगी को छोड़ देना चाहिये।
(१६) जिस रोगी में बेहोशी रहती हो, जिसको किसी भी प्रकार चैन न
पडती हो, जिस रोगी के मास, बल और आहार क्षीण हो गये हों वह रोगी
जल्दी ही मर जाता है ॥ २०-२१ ॥
विरुद्धयोनयो यस्य विरुद्धोपक्रमा भृशम् ।
वर्धन्ते दारुणा रोगाः शीघ्रं शीघ्रं स हन्यते ॥ २२ ॥
बलं विज्ञानमारोग्य ग्रहणी मांसशोणितम् ।
एतानि यस्य क्षीयन्ते क्षिप्रं क्षिप्रं स हन्यते ॥ २३ ॥