सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् २८३

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् २८३
ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदो मार्गं चतुर्थकम् ।
अन्येद्युष्कः प्रतिदिनं दिनं क्षिप्त्वा तृतीयकः ॥ ६७ ॥
दिनद्वयं यो विश्राम्य प्रत्येति स चतुर्थकः ।
अधिशेते यथा भूमि बीजं काले च रोहति ॥ ६८ ॥
अधिशेते तथा धातु दोषः काले च कुप्यति ।
स वृद्धि बलकाल च प्राप्य दोषस्तृतीयकम् ॥ ६९ ॥
चतुर्थकं च कुरुते प्रत्यनीकबलक्षयात ।
कृत्वा वेगं गतबलाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिताः ॥ ७० ॥
पुनर्विवृद्धाः काले ज्वरयन्ति नर मलाः ।
दोषों की गति—प्रति दिन, एक दिन के अन्तर से और दो दिन के अन्तर
से कही गई है । जब प्रति दिन ज्वर आता है उसे अन्येद्युष्क कहते है, एक
दिन के अन्तर से आवे तो 'तृतीयक' और दो दिन अंतर से आवे ता 'चतुर्थक'
कहते हैं । अन्येद्युष्क ज्वर प्रति दिन लौट कर आता है, तृतीयक ज्वर एक दिन
छोड़ कर आता है, चतुर्थक ज्वर दो दिन पीछे लौट कर आता है । जिस प्रकार
कि बीज भूमि में पड़ा रहता है और अपने समय पर उगता है, इसी प्रकार से
वातादि दोष रस, रक्तादि धातुओं में पड़े रहते हैं और समय पाकर प्रकुपित
होते हैं । दोष, बल और काल की सहायता पाकर विरोधी बल के क्षीण होने पर
तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ज्वर वेग को उत्पन्न करके
निर्बल हुए दोष अपने अपने स्थानों में पहुच जाते हैं । अपने अनुकूल
परिस्थिति ( काल ) में ज्वर को पुन: उत्पन्न कर देते हैं ॥ ६५-७०- ॥
कफपित्तात् त्रिकग्राही पृष्ठाद् वातकफात्मकः ॥ ७१ ॥
वातपित्ताच्छिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ।
तृतीयक ज्वर तीन प्रकार का है । जिस तृतीयक ज्वर मे प्रथम त्रिक स्थान
( कूल्हे ) में वेदना होती है, वह कफ-पित्त के कारण होता है । जिस तृतीयक
ज्वर में पीठ में वेदना प्रथम होती है वह वात-कफजन्य है । जिस तृतीयक ज्वर
मे शिर में वेदना प्रथम होती है, वह वात-पित्तजन्य है । इस प्रकार से यह
तृतीयक ज्वर तीन प्रकार है ॥ ७१- ॥
चतुर्थको दर्शयति प्रभावं विविध ज्वरः ॥ ७२ ॥
जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्व शिरस्तोऽनिलसंभवः ।
विषमज्वर एवान्यश्चतुर्थकविपर्ययः ॥ ७३ ॥
त्रिविधो धातुरेकैको द्विधातुस्थः करोत्ययम् !

२८४ चरकसंहिता [ अ० ३
चतुर्थक ज्वर दो प्रकार से अपना प्रभाव दिखाता है, अतः वह दो प्रकार
का है। जिस ज्वर में आक्रमण जंघाओं की ओर से या पाव से होता है वह
कफजन्य है और जिसमें शिर पर सबसे प्रथम आक्रमण होता है वह वायुजन्य
है। ^१चातुर्थक ज्वर का ही एक विपर्यय (भेद) विषम ज्वर है। यह तीन
धातु-वात, पित्त, कफ में से किसी एक धातु के दो धातुओं में स्थिति होने से
होता है। इस ज्वर मे एक दिन आक्रमण नहीं होता, फिर अगले दो दिन होता
है और फिर एक दिन नहीं होता ॥ ७२-७३- ॥
प्रायशः संनिपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः ॥ ७४ ॥
सन्निपाते तु यो भूयान् स दोषः परकीर्तितः ।
प्रायः करके ( कहीं कहीं अपवाद भी होता है), सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क,
तृतीयक, चतुर्थक और सनिपात (त्रिदोष) से उत्पन्न यह पाच प्रकार का ज्वर
होता है। संनिपात के समय जो भी दोष प्रबल होता है, उसी के नाम से उस
ज्वर को कहते हैं दूसरे दोषों का भी अनुबन्ध थोड़ा बहुत रहता है ॥७४-॥
ऋत्वहोरात्रदोषाणां मनसश्च बलाबलात् ॥ ७५ ॥
कालमर्थवशाच्चैव ज्वरस्तं तं प्रपद्यते ।
ऋतु, दिन, रात, दोष और मन के बल-अबल के कारण तथा अर्थवश
(प्राक्तन कर्म) के कारण उस उस समय में ज्वर होता है। [जैसे-ऋतु के
बलाबल से वर्षाकाल से वर्षाकाल में उत्पन्न वातप्रधान सतत ज्वर विरोधी शरद्
ऋतु में अन्येद्युष्क रूप में आ जाता है। अहोरात्र वसन्त काल के मध्य दिवसों
मे उत्पन्न वातिक चतुर्थक ज्वर पिछले दिनों में बलवान् होकर तृतीयक हो जाता
है। मन के बल से ज्वर अन्य रूप में आ जाता है। कहा भी है “विषाद का
करना भी रोग को बढ़ाने वाला है”।] ॥ ७५ ॥
गुरुत्वं^२ दैन्यमुद्वेगः सदनं छर्द्यरोचकौ ॥ ७६ ॥
रसस्थिते बहिस्तापः साङ्गमर्दो विजृम्भणम् ।
रक्तोत्था^३ पिडकास्तृष्णा सरक्तं ष्ठीवनं मुहुः ॥ ७७ ॥
दाहरागभ्रम^४ मदाः प्रलापो रक्तसंस्थिते ।
अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा ग्लानिः संसृष्टविट्कता^५ ॥ ७८ ॥
१. हारीत संहिता में पित्तजन्य चतुर्थक ज्वर भी माना है। २. ‘शैत्यमु’
इति च पाठः । ३ 'रक्तोष्ठः' इति च पाठः । ४ 'श्रम' इति पाठ. । ५. 'अन्त-
र्दाहः सतृण्मोहः सग्लानिः सृष्टविट्कता' इति वा पाठ. ।