चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २३७
पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २३७
सोमो नामौषधिराजः पञ्चदशपर्णः स सोम इव हीयते वर्धते च, पद्मा
नामौषधिः पद्माकारा, पद्मरक्ता, पद्मगन्धा च, अजा नामौषधिस्तु
नीलक्षीरा, नीलपुष्पा लताप्रतानबहुला, इत्यासामष्टानामोषधीनां यां
यामेवोपलभेत तस्यास्तस्याः स्वरसस्य सौहित्यं गत्वा स्नेहभावितायामा-
र्द्रपलाश-द्रोण्यां सपिधानायां दिग्वासाः शयीत, तत्र प्रलीयते षण्मासेन
पुनः पुनः संभवति, तस्याजं पयः प्रत्यवस्थापनं, षण्मासेन देवतानुकारी
भवति वयो-वर्ण स्वराकृति-बल-प्रभाभिः, स्वयं चास्य सर्ववाचोगतानि
प्रादुर्भवन्ति, दिव्यं चास्य चक्षुः श्रोत्रं भवति, गतिर्योजनसहस्रं, दश-
वर्षसहस्राण्यायुरनुपद्रवं चेति ॥ ७ ॥
इति द्रोणीप्रावेशिकरसायनम् ।
द्रोणीप्रावेशिक रसायन—ब्रह्मसुवर्चला नाम की जो ओषधि है, उसका दूध
स्वर्ण के समान पीला, पत्ते पुष्कर (कमल) के समान होते हैं। आदित्यपर्णी
नाम की जो ओषधि सूर्यकान्ता के नाम से प्रसिद्ध है, इसका दूध (रस) पीला
होता है और इसका पुष्प सूर्य मण्डल के समान होता है। नारी नाम की
ओषधि अश्वबला के नाम से जानी जाती है इसके पत्ते बल्वज (तृण विशेष)
के समान होते हैं। काष्ठगोधा नामक ओषधि का आकार गोधा (गोह) के
समान होता है। सर्पा नाम की ओषधि सर्प के समान आकार की है। सोम
नामक ओषधि सब ओषधियों का राजा (श्रेष्ठ) है। इसके पन्द्रह पत्ते होते हैं।
यह ओषधि चन्द्रमा के साथ साथ शुक्ल पक्ष में बढ़ती है और कृष्ण पक्ष में उसी
के साथ साथ ह्रास हो जाती है। पद्मा नाम की ओषधि कमल के आकार की
रक्त कमल के समान लाल वर्ण और कमल के समान गन्ध वाली है। अजा
नाम की ओषधि को 'अजश्रृंगी' कहते है। नीला नाम की ओषधि का दूध
नीला, फूल भी नीले तथा इसका फैलाव बहुत होता है १ ।
१ सुश्रुत में इन दिव्य ओषधियों का कुछ वर्णन आया है जैसे—
कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परि सर्पति ।
सक्षीरा पद्मिनी प्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला ॥
मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सरक्ताशुककोमलैः ।
आदित्यपर्णी विज्ञेया सदादित्यानुवर्त्तिनी ॥
कान्तैर्द्वादशभिः पत्रैः मयूरागुरूहोपमैः ।
कन्दजा काञ्चनक्षीरा कन्या नाम महौषधिः ॥
काश्मीरेषु सरो दिव्य नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ।
२३८ चरकसंहिता [ अ० १
इन आठ (नवीं सोम ) ओषधियों में जो जो भी ओषधि मिल सके उसका
स्वरस पेट भर कर पीना चाहिये । फिर घी, तैल आदि स्नेह से भावित, ताजे
(गीले) ढाक की लकड़ी से बनी, ढक्कन से युक्त द्रोणी (नांद) में नंगा
होकर लेट जाना चाहिये । वहा पर वह छः मास तक अचेत रहता है। [छः
मास के पीछे अ.हार सेवन से सज्ञा-लाभ होता है ]। इस समय बकरी के दूध
से इसे स्वस्थ रखना चाहिये । [छः मास के पीछे वह वय, वर्ण, स्वर,
करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा ॥
मण्डलैः कपिलैश्चित्रैः सर्पाभा पञ्चपर्णिनी ।
पश्चारत्निप्रमाणा वा विज्ञेयाऽजगरो बुधैः ॥
दृश्यतेऽजगरी नित्य गोनसी चाम्बुदागमे ।
अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा क्षुपरूपिणी ॥
अजा महौषधिर्ज्ञेया शङ्खकुन्देन्दुपाण्डुरा ।
छत्रातिच्छत्रके विद्याद् रक्षोघ्ने कन्दसम्भवे ॥
जरामृत्यु निवारिण्यौ श्वेतकापोतसंस्थिते ।
सुश्रुत० चि० अ० ३० ।
(१) ब्रह्म सुवर्चला पीले से, स्वर्ण तुल्य रग की, जल के स्थानों के तीर
पर फैला करते हैं । वह दूध वाली पद्मिनी के समान होती है (२) आदित्य
पर्णी—मूलवाली, खूब लाल नाडियों वाले कोमल २ पाच पत्तों वाली, सदा सूर्य
के अनुसार रहती है। (३) कन्या—सुन्दर मोर के पँखों के समान १२ पत्र
होते हैं, मूल में एक छोटा सा गोल कन्द होता है दूध सोने के समान पीला होता
है । काश्मीर में क्षुद्रक मानस ( छोटा मानसरोवर ) नामक एक दिव्य बड़ा
तालाव है। वहा करेणु, कन्या, छत्रा अति छत्रा नाम की ओषधिया उत्पन्न
होती हैं। (४) अजगरी—पीले चितकबरे, गोल २ चकत्तों मे चित्रित, उसका
रूप साप के सामान होता है, उसके पाच पत्ते होते हैं, उसकी लम्बाई भी पाच
बालिश्त होती है, वर्षा काल में वह दीखती है। (५) गोनसी—इसी प्रकार
गोनसी नाम की ओषधि भी वर्षा काल में ही दीखती है। (६) अजा—अजा
ओषधि शख या कुन्द के पुष्प के समान श्वेत रंग की है, उसका छोटा सा
पौधा होता है, जड़ में बकरी के स्तन के समान कन्द होता है। (७-८)
छत्रा और अतिछत्रा ये दोनों कन्द से उत्पन्न होती हैं श्वेत कबूतर के समान
दिखाई देती हैं, वे दोनों दुष्ट आत्माओं के बुरे प्रभाव को नाश करने वाली,
बुढ़ापा और मौत को दूर करती हैं ।
पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३६
आकृति, जरु और प्रभा में देवताओं की तुलना करने लगता है ] सब विद्यायें,
भाषायें स्वयं ही उपस्थित हो जातो हैं ( वह उनको जान जाता है )। कान
और आंखें दिव्य हो जाती हैं, एक हजार योजन तक बिना थके चल सकता
है, बिना रोग आदि उपद्रवों के एक हजार वर्ष की आयु भोगता है । * [ दूध
देने के लिये ढक्कन में मुख की सीध में छेद बना कर नाली द्वारा दूध देना
चाहिये । जिससे वह लेटा लेटा दूध पी सके । श्वास के लिये अन्य छिद्र रखने
चाहियें ] ॥ ७ ॥
भवन्ति चात्र—दिव्यानामौषधीनां यः प्रभावः स भवद्विधैः ।
शक्यः सोढुमशक्यस्तु स्यात् सोढुमकृतात्मभिः ॥ ८ ॥
ओषधीनां प्रभावेण तिष्ठतां स्वे च कर्मणि ।
भवतां निखिल श्रेयः सर्वमेवोपपत्स्यते ॥ ६ ॥
वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च प्रयत्नैर्नियतात्मभिः ।
शक्या ओषधयो ह्येताः सेवितु विषयाम्भिजाः ॥ १० ॥
तासु क्षेत्रगुणैस्तेषां मध्यमेन च कर्मणा ।
मृदुवीर्यतया तासां विधिज्ञेयः स एव तु ॥ ११ ॥
पर्यैष्टुं ताः प्रयोक्तुं वा येऽसमर्थाः सुखार्थिनः ।
रसायनविधिस्तेषामयमन्यः प्रशस्यते ॥ १२ ॥
दिव्य औषधियों का जो प्रभाव है, उसको आप जैसे ही सहन कर सकते
हैं । पापी पुरुषों के लिये उनका सहन करना असम्भव है। अपने मार्ग में
( शम, तप आदि साधन करते हुए ) स्थिर रहते हुए औषधियों के प्रभाव से
आप लोगों को सम्पूर्ण श्रेय प्राप्त हो जायेगा। वानप्रस्थी, गृहस्थी तथा जो
प्रयत्नशील और संयमी पुरुष हैं, वे भी अपने योग्य पुण्य देश में उत्पन्न औष-
धियों का सेवन कर सकते है। दिव्य औषधियां अपुण्य देश में उत्पन्न होती
ही नहीं, यदि कदाचित् हो जायें तो निर्वीर्य हो जाती हैं। इन साधारण देशों
में उत्पन्न दिव्य औषधियों का वीर्य हिमालय की औषधियों से मृदु ( हीन )
रहता है। इसका कारण क्षेत्र ( जहाँ पर ये उत्पन्न होती हैं ), गुण और कर्म
( जरा, व्याधि-नाश रूप ) का मध्यम होना है। इनके प्रयोग की विधि वही
है, जो कि हिमालय में उत्पन्न औषधियों की है। सुख, आरोग्य को चाहने
वाले जो व्यक्ति इन दिव्य औषधियों को ढूंढने या प्रयोग करने की मेहनत
नहीं कर सकते उनके लिये दूसरी रसायन विधि हितकर है ॥ ८-१२ ॥
- प्रलीयते का अर्थ अदृश्य होना भी कहते हैं ।
२४० चरकसंहिता [ अ० १
बल्यानां जीवनीयानां बृहणीयाश्च या दश ।
वयसः स्थापनीनां च खदिरस्यासनस्य च ॥ १३ ॥
खर्जूराणां मधूकानां मुस्तानामुत्पलस्य च ।
मृद्वीकानां विडङ्गानां वचायाश्चित्रकस्य च ॥ १४ ॥
शतावर्याः पयस्यायाः पिप्पल्या जोङ्गकस्य च ।
ऋद्धया नागबलायाश्च हरिद्राया धवस्य च ॥ १५ ॥
त्रिफलाकण्टकार्योश्च विदार्याश्चन्दनस्य च ।
इक्षूणां शरमूलानां श्रीपर्ण्यास्तिनिशस्य च ॥ १६ ॥
रसाः पृथक् पृथग्ग्राह्याः पलाशक्षार एव च ।
एषां पलांन्मितान् भागान् पयो गव्यं चतुर्गुणम् ॥ १७ ॥
द्वे पात्रे तिलतैलस्य द्वे च गव्यस्य सर्पिषः ।
तत्साध्यं सर्वमेकत्र सुसिद्धं स्नेहमुद्धरेत् ॥ १८ ॥
तत्रामलकचूर्णानामाढकं शतभावितम् ।
स्वरसेनेव दातव्यं क्षौद्रस्याभिनवस्य च ॥ १६ ॥
शर्कराचूर्णपात्रं च प्रस्थमेकं प्रदापयेत् ।
तुगाक्षीर्याः सपिप्पल्याः स्थाप्यं संमूर्च्छितं च तत् ॥ २० ॥
सुचौक्षे मृत्तिके कुम्भे मासार्धं घृतभाविते ।
मात्रामग्निसमां तस्य तत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ॥ २१ ॥
हेमताम्रप्रवालानामयसः स्फटिकस्य च ।
मुक्तावैदूर्य्यशङ्खानां चूर्णानां रजतस्य च ॥ २२ ॥
प्रक्षिप्य षोडशो मात्रां विहायायासमैथुनम् ।
जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ॥ २३ ॥
सर्वरोगप्रशमनं वृष्यमायुष्यमुत्तमम् ।
सत्त्वस्मृतिशरीराग्निबुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ॥ २४ ॥
परमूर्जस्करं चैव वर्णस्वरकरं तथा ।
विषालक्ष्मीप्रशमनं सर्ववाचोगतप्रदम् ॥ २५ ॥
सिद्धार्थतां चाभिनवं वयश्च प्रजाप्रियत्वं च यशश्च लोके ।
प्रयोज्यमिच्छद्भिरिदं यथावद्रसायनं ब्राह्ममुदारवीर्यम् ॥ २६ ॥
इतीन्द्रोक्तरसायनमपरम् ।
इन्द्रोक्त रसायन—सूत्रस्थान में वर्णित बल्य, जीवनीय, बृंहणीय और
वयःस्थापक गण की सब दस औषधियां, खैर, असन, खजूर, महुवा, मोथा,