चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३६
अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३६
सबसे प्रथम वर्णाधिकार कहते हैं जैसे-कृष्ण (काला) कृष्णश्याम
(काला-सावला) और श्याम-अवदात (श्याम-गौर) और अवदात (शुद्धगौर)
ये चार शरीर के प्राकृतिक वर्ण हैं। इनके सिवाय जिन वर्णों का यहा वर्णन
नहीं किया और जो इन वर्णों के अनुकूल समान रूप लक्षणो से मिलें वा
जिनका विद्वान् मनुष्य वर्णन करे उनको भी प्रकृतिवर्ण जानना चाहिये।
नीला, श्याम, ताम्बे का रग, हरा और श्वेत ये शरीर के वैकारिक (विकृति से
उत्पन्न होने वाले) वर्ण हैं। इसी प्रकार उपराक्त प्राकृतिक वर्णों से भिन्न वर्ण
जिनको प्रत्यक्ष देख कर जान लें अथवा पहिले कभी उत्पन्न न हुए, बाद में
उत्पन्न हुए हों ऐसे जो वर्ण हों उनको वैकृतिक वर्ण समझना चाहिये। इस
प्रकार से प्राकृतिक और वैकृतिक वर्ण कह दिये हैं ॥ ७ ॥
तत्र प्रकृतिवर्णमर्धशरीरे विकृतिवर्णमर्धशरीरे द्वावपि वर्णौ मर्यादा-
विभक्तौ दृष्ट्वा यदेव सव्य-दक्षिण-विभागेन यदेव पूर्व-पश्चिम-विभागेन
यदुत्तराधरविभागेन यदन्तर्बहिर्विभागेनाऽऽतुरस्य रिष्टमिति विद्यात् ॥८॥
जिस मनुष्य के आधे शरीर मे प्रकृति वर्ण और आधे शरीर में विकृति का
वर्ण हो और शरीर मे दोनो का विभाग पृथक् २ स्पष्ट दीखता हो, या वाम और
दक्षिण भाग में अथवा ऊपर नीचे के भाग में, या अन्दर बाहर के विभाग में
हो तो इनको रोगी की मृत्यु का लक्षण समझे ॥८॥
एवमेव वर्णभेदो मुखेऽप्यन्तो वर्तमानो मरणाय भवति ॥ ६ ॥
वर्णभेदेन ग्लानि-हर्ष-रौक्ष्य-स्नेहा व्याख्याताः ॥ १० ॥
इसी प्रकार मुख में दूसरा बदला हुआ वर्ण मृत्यु के लिये होता है। वर्ण
के भेद से, ग्लानि, हर्ष, रूक्षता और स्नेह का भी उपदेश समझे। [अर्थात्
शरीर के आधे भाग में रूक्षता आदि ओर आधे में स्नेह आदि का होना मृत्यु
का सूचक है।] ॥ ६-१० ॥
तथा पिप्लु-व्यङ्ग-तिलकालक-पिड़कानामानने जन्माऽऽतुरस्यैवमेवा-
प्रशस्तं विद्यात् ॥ ११ ॥
नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-हस्त-पादौष्ठादिष्वपि च वैकारिकोक्तानां
वर्णानामन्यतमस्य प्रादुर्भावो हीन-बल-वर्णेन्द्रियेषु लक्षणमायुषः क्षयस्य
भवति ॥ १२ ॥
जिस रोगी के मुख पर सहसा पिप्लु, व्यंग, तिल, कालक अथवा पिड़िका
निकल आये, इसको भी बुरा लक्षण समझे। इसी प्रकार नख, आंख, मुख, मूत्र,
पुरीष (मल), हाथ, पाव, ओंठ आदि अगों में वैकारिक रंगों में से किसी एक
१४० चरकसंहिता [ अ० १
रंग का उत्पन्न हो जाना, बल वर्ण और इन्द्रियों मे हीनता का आ जाना, ये
आयु के क्षय के लक्षण हैं ॥ ११-१२ ॥
यच्चान्यदपि किंचिद्वर्णवैकृतमभूतपूर्वं सहसोत्पद्येतानिमित्तमेव हीय-
मानस्याऽऽतुरस्य शश्वत्, तच्चारिष्टम् । इति वर्णाधिकारः ॥ १३ ॥
इनके अतिरिक्त और जो कोई वैकृतिक वर्ण, जो पहिले कभी भी नहीं था
ऐसा बिना कारण के सहसा उत्पन्न हो जाये, इसको निश्चय रूप से मृत्यु का
लक्षण समझना चाहिये ॥ १३ ॥
यह वर्णाधिकार समाप्त हुआ ।
स्वराधिकारस्तु—हंस-क्रौञ्च-नेमि दुन्दुभि-कलविङ्क-काक-कपोत-झर्झ-
रानुकाराः प्रकृतिस्वरा भवन्ति, यांश्चापरानुपपेक्षमाणोऽपि विद्यादनूक-
तोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः ॥ १४ ॥
स्वराधिकार—मनुष्यों का जो स्वर हंस, क्रौञ्च, नेमि, दुन्दुभि, कलविङ्क-
आदि के स्वर और कौवा, कबूतर इनके स्वर के समान हो, उसको प्राकृतिक
स्वर समझना चाहिये । इनके अतिरिक्त इन स्वरों के समान जो प्रकृति स्वर यहां
पर नहीं कहे गये और देखने में आवें या सादृश्य से या जिनको तत्त्वज्ञानी
लोग बतलावें उनको भी जाने ॥ १४ ॥
एडक-कल-ग्रस्ताव्यक्त-गद्गद-क्षाम दीनानुकीर्णास्त्वातुराणां स्वरा
वैकारिका भवन्ति । यांश्चापरानुपपेक्षमाणोऽपि विद्यात्प्राग्विकृतानभूत्वो-
त्पन्नान् । इति प्रकृतिविकृतिस्वरा व्याख्याताः ॥ १५ ॥
वैकृतिक स्वर—रोगी का स्वर एडक (मेडा) के समान, भे भे की सी
आवाज़ हो, अस्पष्ट, गद्गद (भरा हुआ), क्षाम (निर्बल), दीन (दुःख से
बोला जाने वाला), कल (सूक्ष्म), ग्रस्त (निगली सी आवाज, मुख से शब्द
न निकले), रोगियों के इस प्रकार के शब्द विकृति के होते हैं। इसी प्रकार जो
स्वर प्राकृतिक स्वर से विपरीत अथवा नये प्रकार के देखने में आवें जो पहिले
कभी न उत्पन्न हुए हों, उनको भी वैकृतिक स्वर समझे । इस प्रकार से प्राकृतिक
और वैकृतिक स्वरो का वर्णन कर दिया ॥ १५ ॥
तत्र प्रकृतिवैकारिकाणां स्वराणामाश्वभिनिर्वृत्तिः स्वरानेकत्वमेकस्य
चानेकत्वमप्रशस्तम् । इति स्वराधिकारः ॥ १६ ॥
जो स्वर प्रकृति और वैकृतिक स्वरो का शीघ्र उत्पन्न होना अथवा एक
स्वर का कभी एडक की भांति और कभी दीन या क्षाम हो जाना, यह अमगळ
सूचक है । यह स्वराधिकार समाप्त हुआ ॥ १६ ॥