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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 616 में से

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पृष्ठ 481

अ० १२ ] ३२ चिकित्सितस्थानम् ४९७


इसके बन जाने पर इसके पीने से शोफ, कफ और वातजन्य विबन्ध ( कब्ज )
नष्ट होते हैं, तथा यह अष्टशत-अरिष्ट अग्निवर्धक है ॥३२-३३॥
पुनर्नवे द्वे च बले सपाठे दन्ती गुडूचीमथ चित्रकं च ।
निदिग्धिकां च त्रिपलानि पक्त्वा द्रोणावशेषे सलिले ततस्तम् ॥३४॥
पूत्वा रसं द्वे च गुडात्पुराणात्तुले मधुप्रस्थयुतं सुशीतम् ।
मासं निदध्याद् घृतभाजनस्थं पलो यवाना परतस्तु मासात् ॥३५॥
चूर्णीकृतैरर्धपलाशिकैस्तं पत्रत्वगेलामरिचाम्बुलोहैः ।
गन्धान्वितं क्षौद्रघृतप्रदिग्धं जीर्णे पिबेद् व्याधिबलं समीक्ष्य ॥३६॥
हृत्पाण्डुरोगं श्वयथुं प्रवृद्धं प्लीहाभ्रमारोचकमेहगुल्मान् ।
भगन्दरं षड्जठराणि कासं श्वासं ग्रहण्यामयकुष्ठकण्डूः ॥ ३७ ॥
शाखानिलं बद्धपुरीषता च हिक्कां किलासं च हलीमकं च ।
क्षिप्रं जयेद् वर्णबलायुरोजस्तेजोन्वितो मांसरसान्नभोजी ॥ ३८ ॥
इति पुनर्नवाद्यरिष्टः ।
( ११ ) पुनर्नवाद्यरिष्ट—श्वेत और लाल दोनो पुनर्नवा, बला और अति-
बला, पाठा, वासा, गिलोय, चीता, छोटी कटेरी ओर आवला, बहेड़ा, हरड़
प्रत्येक तीन पल लेकर चार द्रोण पानी मे क्वाथ करे । एक द्रोण रहने पर इसको
छान लेवे । इसमे पुराना गुड़ २०० पल, ठण्डा होने पर मधु १ प्रस्थ, नाग-
केसर, दालचीनी, इलायची, मरिच, बालक और तेजपात प्रत्येक आधा पल
मिलाकर, घी और मधु से लिप्त घड़े मे डालकर जौ के ढेर मे एक मास तक
दबा कर रख दे । एक मास के पीछे जब गन्ध रसादि उत्पन्न हो जायें तो प्रातः
काल ( प्रथम दिन के भोजन जीर्ण होने पर ) पीवे । इसकी मात्रा रोग और
बल के अनुसार लेवे । इस अरिष्ट के जीर्ण होने पर मास-रस के साथ अन्न खाने
वाले व्यक्ति के हृदय रोग, पाण्डु, शोथ, प्लीहा, ज्वर, अरोचक, प्रमेह, गुल्म,
भगन्दर, छ प्रकार के उदररोग, कास, श्वास, ग्रहणी, कुष्ठ, कण्डु, शाखा
( हाथ-पाव ) की वायु, विड्विबन्ध ( कब्ज ), हिचकी, किलास ( श्वेत कुष्ठ ),
हलीमक-रोग शीघ्र नष्ट होते हैं, रोगी का वर्ण बल, आयु और तेज
बढ़ते है ॥ ३४-३८ ॥
फलत्रिकं दीव्यकचित्रकौ च सपिप्पली लोहरजो विडङ्गम् ।
चूर्णीकृत कौडबिकं द्विरंशं क्षौद्रं पुराणस्य तुलां गुडस्य ।