चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७३
अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७३
न रक्ती न विषेणार्त्तो न शोचन्न च गर्भिणी ।
न श्रमे न मदे नामे न पित्ते न प्रजागरे ॥ ४० ॥
न मूर्च्छाभ्रमतृष्णासु न क्षीणे नापि च क्षते ।
न मद्यदुग्धे पीत्वा च न स्नेहं न च माक्षिकम् ॥ ४१ ॥
धूमं न भुक्त्वा दध्ना च न रूक्षः क्रुद्ध एव च ।
न तालुशोषे तिमिरे शिरस्यभिहते न च ॥ ४२ ॥
न शङ्खके न रोहिण्यां न मेहे न मदात्यये ।
एषु धूममकालेषु मोहात्पिबति यो नरः ॥ ४३ ॥
रोगास्तस्य प्रवर्धन्ते दारुणा धूमविभ्रमात् ।
इसके आगे कहेंगे कि किन २ पुरुषों के लिये धूम पान निन्दित है।
'विरिक्त' विरेचन जिसने लिया हो, वस्ति कर्म (रूक्ष या स्नेहन वस्ति जिसने ली
हो ), रक्ती ( रक्त दोष वाला ), विषार्त्त ( विष से पीड़ित ), शोचन् (शोकातुर
मनुष्य ), गर्भिणी ( गर्भवती ), श्रम ( थकान चढ़ा होने पर ), मद ( नशा
किया हुआ होने से पर ) आम ( अजीर्णावस्था में ), प्रजागर ( रात्रि में जागने
पर ), मूर्च्छा (बेहोशी ), भ्रम ( चक्कर आना ), तृष्णा ( प्यास लगी होने
पर ), क्षीण ( धातु क्षय होने पर ), क्षत ( उरः क्षत रोग में ), मद्य ( शराब
पीकर ), दुग्ध ( दूध पीकर ), स्नेह ( घी तैल आदि पीकर ), माक्षिक ( शहद
खाकर ), दही के साथ चावल आदि खाकर रूक्ष ( रूक्ष शरीर में रूखापन
होने पर स्नैहिक धूम के अतिरिक्त धूम ), क्रुद्ध ( कोप की अवस्था में ),
तालु शोष ( गला सूख जाने पर ), तिमिर ( तिमिर नामक अक्षि रोग में ),
शिर पर चोट लगने पर; शंखक ( शंखक नामक शिरो रोग में ), रोहिणी रोग
डिप्थीरिया, गलरोग में, मेह ( प्रमेह रोग में ), मदात्यय ( मद्यपान करने पर
शराब का नशा चढ़ा होने पर ) इन अवस्थाओं में धूम पान नहीं करना
चाहिये । इन कुसमयों में जो मनुष्य अज्ञान से धूम्र पान करता है, उसके
धूम पान से कुपित वातादि दोष और रोग बढ़ाते हैं । जो ऊपर गिनाये जिन २
रोगों में मनुष्य धूम पीता है, उसके वे वे रोग बढ़ जाते हैं और नीरोगी व्यक्ति
के अकाल में पीने से कठिन रोग हो जाते हैं ॥ ३६-४३ ॥
धूम किस प्रकार पीना चाहिये—
धूमयोग्यः पिबेद्दोषे शिरो-घ्राणाक्षि-संश्रये ॥ ४४ ॥
घ्राणेनाऽऽस्येन कण्ठस्थे, मुखेन घ्राणपो वमेत् ।
आस्येन धूमकवलान् पिबन् घ्राणेन नोद्वमेत् ॥ ४५ ॥
प्रतिलोमं गतो ह्याशु धूमो हिंस्याद्धि चक्षुषी ।
७४ चरकसंहिता [ अ० ५
विरक्तादि से भिन्न, बारह वर्ष से ऊपर, स्नानादि काल में धूम पीनेके योग्य
मनुष्य दोष के नासिका, आँख में आश्रित होने पर नाक से धूम पान करे और
कण्ठ ( गले या छाती में ) दोष स्थित होने पर मुख से धूम पान करना
चाहिये । जो धूम नासिका से पिया है, उसको मुख मार्ग से निकालना चाहिये ।
अर्थात् धूम नासिका से पीकर मुख से निकालना चाहिये, नासिका से नहीं ।
परन्तु मुख से धूम्रपान करते हुए नासिका से धुँआ नहीं निकालना
चाहिये, बल्कि मुख से पीकर मुख से ही बाहर करना चाहिये, क्योंकि धुँआ
विपरीत मार्ग से निकाल कर जल्दी ही आंखों को हानि पहुँचाता है ॥४४-४५॥
धूम्रपान के आसन—
ऋज्वङ्गचक्षुस्तच्चेताः सूपविष्टस्त्रिपर्ययम् ॥ ४६ ॥
पिबेच्छिद्रं पिधायैकं नासया धूममात्मवान् ।
अकुटिल, शरीर, चक्षु, हाथ, पांव, शिर, पीठ, ग्रीवा को सीधे रख कर
धूम्रपान में मनोयोग करके, अच्छी प्रकार शान्ति से बैठे हुए तीन-तीन दम
एक साथ, कुल नौ बार पीना चाहिये और पीते समय नासिका का एक छेद
बन्द कर लेना चाहिये । इसी प्रकार क्रम से दोनों नासिकाओं से पीना चाहिये ॥
चतुर्विंशतिकं नेत्रं स्वाङ्गुलीभिर्विरेचने ॥ ४७ ॥
द्वात्रिंशदङ्गुलं स्नेहे प्रयोगेऽध्यक्ष्यमिष्यते ।
ऋजुत्रिकोषाफलितं कोलास्थ्यग्रप्रमाणितम् ॥ ४८ ॥
बस्तिनेत्रसमद्रव्यं धूमनेत्रं प्रशस्यते ।
वैरेचनिक धूम में पीने वाले की अपनी अंगुलियों से २४ अंगुल नेत्र
नलिका होनी चाहिये, स्नैहिक धूम्र प्रयोग में बत्तीस अंगुल परिमित हो ।
प्रायोगिक धूम प्रयोग में ३६ छत्तीस अंगुल होनी चाहिये ।
नालिका की बनावट—पर्व गांठ गिरह सीधे तीन सीधी गिरह वाली गिरहों
पर ठीक प्रकार से मिली हुई, एवं आगे से मुख पर बेर के समान नलिका होनी
चाहिये। नलिका को बनाने के द्रव्य पदार्थ बस्ति की नलिका के समान होने चाहिये ॥
दूराद्विनिर्गतः पर्वच्छिन्नो नाडीतनूकृतः ॥ ४९ ॥
नेन्द्रियं बाधते धूमो मात्राकालनिषेवितः ।
यदा चोरश्च कण्ठश्च शिरश्च लघुतां व्रजेत् ॥ ५० ॥
कफश्च तनुतां प्राप्तः सुपीतं धूममादिशेत् ।
चौबीस या छत्तीस अंगुली लम्बी नलिका में दूर से आने के कारण तीन
गिरह गांठों के होने से तीक्ष्णता का घट जाना, बेर के समान छेद होने से