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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 639 में से

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पृष्ठ 92

७४ चरकसंहिता [ अ० ५
विरक्तादि से भिन्न, बारह वर्ष से ऊपर, स्नानादि काल में धूम पीनेके योग्य
मनुष्य दोष के नासिका, आँख में आश्रित होने पर नाक से धूम पान करे और
कण्ठ ( गले या छाती में ) दोष स्थित होने पर मुख से धूम पान करना
चाहिये । जो धूम नासिका से पिया है, उसको मुख मार्ग से निकालना चाहिये ।
अर्थात् धूम नासिका से पीकर मुख से निकालना चाहिये, नासिका से नहीं ।
परन्तु मुख से धूम्रपान करते हुए नासिका से धुँआ नहीं निकालना
चाहिये, बल्कि मुख से पीकर मुख से ही बाहर करना चाहिये, क्योंकि धुँआ
विपरीत मार्ग से निकाल कर जल्दी ही आंखों को हानि पहुँचाता है ॥४४-४५॥
धूम्रपान के आसन—
ऋज्वङ्गचक्षुस्तच्चेताः सूपविष्टस्त्रिपर्ययम् ॥ ४६ ॥
पिबेच्छिद्रं पिधायैकं नासया धूममात्मवान् ।
अकुटिल, शरीर, चक्षु, हाथ, पांव, शिर, पीठ, ग्रीवा को सीधे रख कर
धूम्रपान में मनोयोग करके, अच्छी प्रकार शान्ति से बैठे हुए तीन-तीन दम
एक साथ, कुल नौ बार पीना चाहिये और पीते समय नासिका का एक छेद
बन्द कर लेना चाहिये । इसी प्रकार क्रम से दोनों नासिकाओं से पीना चाहिये ॥
चतुर्विंशतिकं नेत्रं स्वाङ्गुलीभिर्विरेचने ॥ ४७ ॥
द्वात्रिंशदङ्गुलं स्नेहे प्रयोगेऽध्यक्ष्यमिष्यते ।
ऋजुत्रिकोषाफलितं कोलास्थ्यग्रप्रमाणितम् ॥ ४८ ॥
बस्तिनेत्रसमद्रव्यं धूमनेत्रं प्रशस्यते ।
वैरेचनिक धूम में पीने वाले की अपनी अंगुलियों से २४ अंगुल नेत्र
नलिका होनी चाहिये, स्नैहिक धूम्र प्रयोग में बत्तीस अंगुल परिमित हो ।
प्रायोगिक धूम प्रयोग में ३६ छत्तीस अंगुल होनी चाहिये ।
नालिका की बनावट—पर्व गांठ गिरह सीधे तीन सीधी गिरह वाली गिरहों
पर ठीक प्रकार से मिली हुई, एवं आगे से मुख पर बेर के समान नलिका होनी
चाहिये। नलिका को बनाने के द्रव्य पदार्थ बस्ति की नलिका के समान होने चाहिये ॥
दूराद्विनिर्गतः पर्वच्छिन्नो नाडीतनूकृतः ॥ ४९ ॥
नेन्द्रियं बाधते धूमो मात्राकालनिषेवितः ।
यदा चोरश्च कण्ठश्च शिरश्च लघुतां व्रजेत् ॥ ५० ॥
कफश्च तनुतां प्राप्तः सुपीतं धूममादिशेत् ।
चौबीस या छत्तीस अंगुली लम्बी नलिका में दूर से आने के कारण तीन
गिरह गांठों के होने से तीक्ष्णता का घट जाना, बेर के समान छेद होने से