चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २८.] सूत्रस्थानम् २८१
अ० २८.] सूत्रस्थानम् २८१
अजातानामनुत्पत्तौ जातानां विनिवृत्तये ।
रोगाणां यो विधिर्दृष्टः सुखार्थी तं समाचरेत् ॥ ३३ ॥
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
ज्ञानाज्ञानविशेषात्तु मार्गामार्गप्रवृत्तयः ॥ ३४ ॥
हितमेवानुरुध्यन्ते प्रपरीक्ष्य परीक्षकाः ।
रजोमोहावृतात्मानः प्रियमेव तु लौकिकाः ॥ ३५ ॥
श्रुतं बुद्धिः स्मृतिर्दाक्ष्यं धृतिर्हितनिषेवणम् ।
वाग्विborderशुद्धिः शमो धैर्यमाश्रयन्ति परीक्षकम् ॥ ३६ ॥
लौकिकं नाश्रयन्त्येते गुणा मोहरजःश्रितम् ।
तन्मूला बहुलाश्चैव रोगाः शारीरमानसाः ॥ ३७ ॥
संक्षेप से सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिये कि रोगों को उत्पन्न
न होने देने की जो विधि कही है, तथा उत्पन्न हुए रोगों को हटाने की जो
विधि कही है, उसका आचरण, सेवन करें । क्योंकि सब प्राणियों की सब
प्रवृत्तियां सुख प्राप्त करने की इच्छा से ही होती हैं । ज्ञान और अज्ञान के भेद
से ही मनुष्य मार्ग या अमार्ग का अनुसरण करने लगता है । परीक्षक विद्वान्
परीक्षा करके हितकारी वस्तुओं का सेवन करते हैं, रजो गुण और मोह में फंसे
साधारण-जन प्रिय पदार्थ ही चाहते हैं। श्रुत, बुद्धि, स्मृति दृढ़ता हितकारी
वस्तुओं का सेवन, वाणी की शुद्धि, शम, और धैर्य, ये गुण विवेकी पुरुष में
होते हैं । परन्तु मोह और रज से युक्त होने के कारण लौकिक, अविवेकी पुरुष-
में ये गुण नहीं होते । इसलिये इनको शारीरिक और मानसिक बहुत प्रकार के
रोग होते हैं ॥ ३३-३७ ॥
प्रज्ञापराधाद्धितानर्थान् पञ्च निषेवते ।
संधारयति वेगांश्च सेवते साहसानि च ॥ ३८ ॥
तदात्वसुखसंज्ञेषु भावेष्वज्ञोऽनुरज्यते ।
रज्यते न तु विज्ञाता विज्ञाने शमलीकृते ॥ ३९ ॥
न रागाद्नाप्यविज्ञानादाहारमुपयोजयेत् ।
परीक्ष्य हितमश्नीयाद्देहो ह्याहारसंभवः ॥ ४० ॥
आहारस्य विधावष्टौ विशेषा हेतुसंज्ञकाः ।
शुभाशुभसमुत्पत्तौ तान् परीक्ष्योपयोजयेत् ॥ ४१ ॥
परिहार्याण्यपथ्यानि सदा परिहरन्नरः ।
भवत्यनृणवां प्राज्ञः साधूनामिह पण्डितः ॥ ४२ ॥
३८४ चरकसंहिता [अ० २८
यत्तु रोगसमुत्थानमशक्यमिह केनचित् ।
परिहर्तुं, न तत्प्राप्य शोचितव्यं मनीषिणा ॥ ४३ ॥
अज्ञानी मनुष्य बुद्धि के दोष से पञ्चेन्द्रियों के अहित शब्द, स्पर्शादि विषयों
का सेवन करता है, मल मूत्रादि के वेगों को रोकता है, साहस के कामों को
करता है, प्रारम्भ में सुखदायक और परिणाम में दुःखदायक कर्मों को करता
है, इसलिये दुःख उठाता है। परन्तु ज्ञानी पुरुष ज्ञान द्वारा बुद्धि के स्वच्छ
होने से इन कामों में नहीं फंसता, अतः सुखी रहता है । राग अर्थात् आसक्ति
से (जानते हुए भी भोजन अहितकर है, फिर भी लालच से ) या अज्ञान
से भोजन को नहीं खाना चाहिये, परीक्षा करके ज्ञानपूर्वक हितकारी अन्न को
ही खाना चाहिये । क्योंकि शरीर आहार से उत्पन्न होता है। भोजन की
शुभ-अशुभ परीक्षा के लिये आठ प्रकार की परीक्षा है । ये आठ परीक्षायें
विमान स्थान अध्याय १ में प्रकृति-करण, संयोग आदि से कही हैं।
भोजन की इन आठ विशेषताओं से परीक्षा करके भोजन करना चाहिये ।
जिन अपथ्यों से मनुष्य बच सकता हो उनसे बचने का सदा यत्न करना चाहिये,
इस प्रकार करने से पुरुष अपराधरहित होता है और साधु पुरुषों में बुद्धिमान्
गिना जाता है। क्योंकि प्रारब्ध से उत्पन्न व्याधि को साधु पुरुष बुरा नहीं
मानते । जो रोग प्रारब्ध के बलवान् होने से उत्पन्न होता है वह यदि चिकित्सा
कार्य के किये असाध्य भी हो तो भी बुद्धिमान् मनुष्य को शोक, चिन्ता नहीं
करनी चाहिये ॥ ३८-४३ ॥
तत्र श्लोकाः-आहारसंभवं वस्तु रोगाश्चाऽऽहारसंभवाः ।
हिताहितविशेषाच्च विशेषः सुखदुःखयोः ॥ ४४ ॥
सहत्वे चासहत्वे च दुःखानां देहसत्त्वयोः ।
विशेषो रोगसङ्ख्याश्च धातुजा ये पृथक् पृथक् ॥ ४५ ॥
तेषां चैव प्रशमनं कोष्ठाच्छाखा उपेत्य च ।
दोषा यथा प्रकुप्यन्ति शाखाभ्यः कोष्ठमेव च ॥ ४६ ॥
प्राज्ञाज्ञयोर्विशेषश्च स्वस्थातुरहितं च यत् ।
विविधाशितपीतीये तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ४७ ॥
यह शरीर आहार से उत्पन्न होता है, रोग भी आहार से उत्पन्न होते हैं।
हित और अहित की विशेषता ही सुख दुःख में कारण है। दुःखों के सहन
करने या न सहन कर सकने में देह, सत्त्व आदि विशेषतायें धातुजन्य पृथक् २
रोग, इनकी चिकित्सा, दोष जिस प्रकार से कोष्ठ से शाखा में जाकर कुपित