चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 401, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २८.] सूत्रस्थानम् २८१
अजातानामनुत्पत्तौ जातानां विनिवृत्तये ।
रोगाणां यो विधिर्दृष्टः सुखार्थी तं समाचरेत् ॥ ३३ ॥
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
ज्ञानाज्ञानविशेषात्तु मार्गामार्गप्रवृत्तयः ॥ ३४ ॥
हितमेवानुरुध्यन्ते प्रपरीक्ष्य परीक्षकाः ।
रजोमोहावृतात्मानः प्रियमेव तु लौकिकाः ॥ ३५ ॥
श्रुतं बुद्धिः स्मृतिर्दाक्ष्यं धृतिर्हितनिषेवणम् ।
वाग्विborderशुद्धिः शमो धैर्यमाश्रयन्ति परीक्षकम् ॥ ३६ ॥
लौकिकं नाश्रयन्त्येते गुणा मोहरजःश्रितम् ।
तन्मूला बहुलाश्चैव रोगाः शारीरमानसाः ॥ ३७ ॥
संक्षेप से सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिये कि रोगों को उत्पन्न
न होने देने की जो विधि कही है, तथा उत्पन्न हुए रोगों को हटाने की जो
विधि कही है, उसका आचरण, सेवन करें । क्योंकि सब प्राणियों की सब
प्रवृत्तियां सुख प्राप्त करने की इच्छा से ही होती हैं । ज्ञान और अज्ञान के भेद
से ही मनुष्य मार्ग या अमार्ग का अनुसरण करने लगता है । परीक्षक विद्वान्
परीक्षा करके हितकारी वस्तुओं का सेवन करते हैं, रजो गुण और मोह में फंसे
साधारण-जन प्रिय पदार्थ ही चाहते हैं। श्रुत, बुद्धि, स्मृति दृढ़ता हितकारी
वस्तुओं का सेवन, वाणी की शुद्धि, शम, और धैर्य, ये गुण विवेकी पुरुष में
होते हैं । परन्तु मोह और रज से युक्त होने के कारण लौकिक, अविवेकी पुरुष-
में ये गुण नहीं होते । इसलिये इनको शारीरिक और मानसिक बहुत प्रकार के
रोग होते हैं ॥ ३३-३७ ॥
प्रज्ञापराधाद्धितानर्थान् पञ्च निषेवते ।
संधारयति वेगांश्च सेवते साहसानि च ॥ ३८ ॥
तदात्वसुखसंज्ञेषु भावेष्वज्ञोऽनुरज्यते ।
रज्यते न तु विज्ञाता विज्ञाने शमलीकृते ॥ ३९ ॥
न रागाद्नाप्यविज्ञानादाहारमुपयोजयेत् ।
परीक्ष्य हितमश्नीयाद्देहो ह्याहारसंभवः ॥ ४० ॥
आहारस्य विधावष्टौ विशेषा हेतुसंज्ञकाः ।
शुभाशुभसमुत्पत्तौ तान् परीक्ष्योपयोजयेत् ॥ ४१ ॥
परिहार्याण्यपथ्यानि सदा परिहरन्नरः ।
भवत्यनृणवां प्राज्ञः साधूनामिह पण्डितः ॥ ४२ ॥