चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
[अ० २६ ] सूत्रस्थानम् : ६६
[Header]
[अ० २६ ] सूत्रस्थानम् : ६६
[Body]
तो असंख्य हो जाते हैं । इसी प्रकार रसों के तर-तम ( यथा—मधुरतर,
मधुरतम आदि ) भेद से भी रस असंख्य-अगणित बन जाते हैं । इस प्रकार
रसों के असंख्य होने पर भी आचार्यों ने चिकित्सा व्यवहार के लिये रसों के
सत्तावन ( ५७ ) संयोग और मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय इन को
मिलाकर तिरसठ ( ६३ ) भेदों की कल्पना कर रक्खी है ॥ १६-२२ ॥
क्वचिदेको रसः कल्प्यः संयुक्ताश्च रसाः क्वचित् ।
दोषौषधादीन् संचिन्त्य भिषजा सिद्धिमिच्छता ॥ २३ ॥
द्रव्याणि द्विरसादीनि संयुक्तांश्च रसान् बुधः ।
रसानेकैकशो वाऽपि कल्पयन्ति गदान् प्रति ॥ २४ ॥
यः स्याद्रसविकल्पज्ञः स्याच्च दोषविकल्पवित् ।
न स मुह्येद्विकाराणां हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ २५ ॥
कहीं पर एक रस की, कहीं पर मिलित रसों की, दोष ओषधि आदि ( देश,
काल ) का विचार करके सफलता चाहने वाले वैद्य को कल्पना करनी चाहिये।
जैसे—दो रस वाले द्रव्य ( मूं ग कषाय और मधुर होते हैं ), तीन रस वाले
( मधुराम्लकषायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम्, पित्त-श्लेष्महरं भव्यम् ), चार रस
वाले (जैसे-तिल, स्निग्धोष्णमधुरस्तिक्तकषायः कटुकस्तिलः । ) पांच रस ( जैसे-
हरीतकी, शिवा पंचरसा ), छः रस ( अव्यक्त हो यथा—विष । 'विषन्त्वव्यक्तं
षड्रससंयुक्तम्' या हरिण का मांस ) । एवं दो रस वाले रसों की या मिलित
द्रव्य या रसों की कल्पना, अथवा एक एक रस की कल्पना रोगों के अनुसार
करते हैं । जो मनुष्य रस के भेदों को भली प्रकार जानता है ( वह रोगों के
कारण द्रव्य ज्ञान को भी अनिवार्य रूप से जान ही जायेगा ), एवं दोषों
( वातादि ) के लक्षणों को भी भली प्रकार से पहिचानता है, अथवा जो मनुष्य
भेषज द्रव्यों को स्वरूप से एवं इन के प्रयोग विषय को जानता है, वह रोगों के
कारण लक्षण, और शान्ति ( चिकित्सा ) में नहीं घबराता और भ्रम में नहीं
फंसता ॥ २३-२५ ॥
व्यक्तः शुष्कस्य चाऽऽदौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते ।
विपर्ययेणानुरसो रसो नास्ति हि सप्तमः ॥ २६ ॥
अनुरस—शुष्क या गीले द्रव्य में जो रस जिह्वा के स्पर्श से स्पष्ट होता है,
वह व्यक्त रस है । परन्तु जो रस इस प्रकार से ज्ञात नहीं होता अर्थात् पीछे
द्वारा जाना जाता है, वह 'अनुरस' है । अथवा जो रस गीले द्रव्य में
वह व्यक्त ( अनुरस ) और जो रस शुष्क होने पर स्पष्ट होता है वह
३०० चरकसंहिता [ अ० २६
'रस' है । यथा—पिप्पली आर्द्रावस्था में मधुर, और शुष्क अवस्था में 'कटु'
रस है । इसलिये कटु व्यक्त रस, और मधुर अव्यक्त अनुरस है । अथवा
पीछे से जो रस अनुभव होता है, वह 'अनुरस' है । यथा—कांजी, तक्र आदि
पदार्थों के पीने पर प्रथम जिस रस का अनुभव हो वह रस और जो पीछे स्पष्ट
हो वह 'अनुरस' है । सातवां रस कोई पृथक् नहीं है ॥ २६ ॥
परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च ।
विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥ २७ ॥
संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणा ज्ञेयाः परादयः ।
सिद्धयुपायाश्चिकित्सायां लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्महे ॥२८॥
दस गुण—पर, अपर, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम,
संस्कार और अभ्यास ये दस गुण हैं । चिकित्सा में सफलता इन दस गुणों में
आश्रित है । इनके लक्षण कहते हैं ॥ २७-२८ ॥
देश-काल-वयो-मान-पाक-वीर्य-रसादिषु ।
परापरत्वे, युक्तिस्तु योजना या च युज्यते ॥ २६ ॥
संख्या स्याद् गणितं, योगः सहसंयोग उच्यते ।
द्रव्याणां द्वन्द्वसर्वैककर्मजोऽनित्य एव च ॥ ३० ॥
विभागस्तु विभक्तिः स्याद्वियोगो भागशो ग्रहः ।
पृथक्त्वं स्यादसंयोगो वैलक्षण्यमनेकता ॥ ३१ ॥
परिमाणं पुनर्मानं, संस्कारः करणं मतम् ।
भावाभ्यसनमभ्यासः शीलनं सततक्रिया ॥ ३२ ॥
इति स्वलक्षणैरुक्ता गुणाः सर्वे परादयः ।
चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥ ३३ ॥
गुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्रसगुणान भिषक् ।
विद्याद् द्रव्यगुणान् कर्तुरभिप्रायाः पृथग्विधाः ॥ ३४ ॥
अतश्च प्रकृतं बुद्ध्वा देशकालान्तराणि च ।
तत्र कर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत् ॥ ३५ ॥
देश-मरुदेश पर और आनूप अपर । काल-विसर्ग पर, आदान अपर ।
वय-तरुण पर, बाल, वृद्ध अपर । मान-शरीर का कहा हुआ पर, इस के अन्य
अपर । पाक, वीर्य और रस ये जिस योग के प्रति हों उसके लिये पर दूसरों के प्रति
अपर पर-अपर यह देश, काल, वय, मान, वीर्य, रस आदि के अपेक्षा से हैं। जैसे
मरुदेश-बंगाल की अपेक्षा पर है, और बंगाल-मरुदेशों वालो की अपेक्षा मे पर