चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 317, कुल 639 में से
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[अ० २६ ] सूत्रस्थानम् : ६६
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तो असंख्य हो जाते हैं । इसी प्रकार रसों के तर-तम ( यथा—मधुरतर,
मधुरतम आदि ) भेद से भी रस असंख्य-अगणित बन जाते हैं । इस प्रकार
रसों के असंख्य होने पर भी आचार्यों ने चिकित्सा व्यवहार के लिये रसों के
सत्तावन ( ५७ ) संयोग और मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय इन को
मिलाकर तिरसठ ( ६३ ) भेदों की कल्पना कर रक्खी है ॥ १६-२२ ॥
क्वचिदेको रसः कल्प्यः संयुक्ताश्च रसाः क्वचित् ।
दोषौषधादीन् संचिन्त्य भिषजा सिद्धिमिच्छता ॥ २३ ॥
द्रव्याणि द्विरसादीनि संयुक्तांश्च रसान् बुधः ।
रसानेकैकशो वाऽपि कल्पयन्ति गदान् प्रति ॥ २४ ॥
यः स्याद्रसविकल्पज्ञः स्याच्च दोषविकल्पवित् ।
न स मुह्येद्विकाराणां हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ २५ ॥
कहीं पर एक रस की, कहीं पर मिलित रसों की, दोष ओषधि आदि ( देश,
काल ) का विचार करके सफलता चाहने वाले वैद्य को कल्पना करनी चाहिये।
जैसे—दो रस वाले द्रव्य ( मूं ग कषाय और मधुर होते हैं ), तीन रस वाले
( मधुराम्लकषायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम्, पित्त-श्लेष्महरं भव्यम् ), चार रस
वाले (जैसे-तिल, स्निग्धोष्णमधुरस्तिक्तकषायः कटुकस्तिलः । ) पांच रस ( जैसे-
हरीतकी, शिवा पंचरसा ), छः रस ( अव्यक्त हो यथा—विष । 'विषन्त्वव्यक्तं
षड्रससंयुक्तम्' या हरिण का मांस ) । एवं दो रस वाले रसों की या मिलित
द्रव्य या रसों की कल्पना, अथवा एक एक रस की कल्पना रोगों के अनुसार
करते हैं । जो मनुष्य रस के भेदों को भली प्रकार जानता है ( वह रोगों के
कारण द्रव्य ज्ञान को भी अनिवार्य रूप से जान ही जायेगा ), एवं दोषों
( वातादि ) के लक्षणों को भी भली प्रकार से पहिचानता है, अथवा जो मनुष्य
भेषज द्रव्यों को स्वरूप से एवं इन के प्रयोग विषय को जानता है, वह रोगों के
कारण लक्षण, और शान्ति ( चिकित्सा ) में नहीं घबराता और भ्रम में नहीं
फंसता ॥ २३-२५ ॥
व्यक्तः शुष्कस्य चाऽऽदौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते ।
विपर्ययेणानुरसो रसो नास्ति हि सप्तमः ॥ २६ ॥
अनुरस—शुष्क या गीले द्रव्य में जो रस जिह्वा के स्पर्श से स्पष्ट होता है,
वह व्यक्त रस है । परन्तु जो रस इस प्रकार से ज्ञात नहीं होता अर्थात् पीछे
द्वारा जाना जाता है, वह 'अनुरस' है । अथवा जो रस गीले द्रव्य में
वह व्यक्त ( अनुरस ) और जो रस शुष्क होने पर स्पष्ट होता है वह