चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६३
अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६३
करने का अभ्यास है वे शीतकाल ( हेमन्त शिशिर ) में दिन के समय तैल
का पान करें ॥४४-४६॥
वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः ।
संशुष्क-रेतो-रुधिरा निष्पीत-कफ-मेदसः ॥ ४७ ॥
अस्थि-सन्धि-शिरा-स्नायु-मर्म-कोष्ठ-महारुजः ।
बलवान्मारुतो येषां खानि चाऽऽवृत्य तिष्ठति ॥ ४८ ॥
महच्चाग्निबलं येषां वसा-सात्म्याश्च ये नराः ।
तेषां स्नेह्यितव्यानां वसापानं विधीयते ॥ ४९ ॥
वायु और धूप को सहन करने वाले, रूक्ष प्रकृति, भार के उठाने या मार्ग
चलने वाले, परिश्रम के कारण जो निर्बल हो गये, जिनका वीर्य या रक्त सूख
गया है; कफ क्षीण हो, मेद क्षीण हो, जिनको अस्थि; सन्धि-शिरा, स्नायु मर्म
कोष्ठ के भयानक रोग हों, जिनकी इन्द्रियों को बलवान् वायु घेरे रहता है,
जिनका अग्निबल-जाठराग्नि बलवान् हो, और जो वसा सेवन करने के
अभ्यासी हों, ऐसे पुरुष स्नेहन करने के लिये वसा (चर्बी) का पान करें ॥४७-४६।
दीप्ताग्नयः क्लेशसहा घस्मराः स्नेहसेविनः ।
वातार्ताः क्रूर-कोष्ठाश्च स्नेह्या मज्जानमाप्नुयुः ॥ ५० ॥
जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो क्लेश को सहन कर सकते हों, खूब खाने
वाले, स्नेहसेवन के अभ्यासी; वात रोगी और क्रूरकोष्ठ वाले व्यक्तियों को मज्जा
द्वारा स्नेहन करना चाहिये ॥५०॥
येभ्यो येभ्यो हितो यो यः स्नेहः स परिकीर्तितः ।
स्नेहनस्य प्रकर्षो तु सप्तरात्रं त्रिरात्रकौ ॥ ५१ ॥
जिन जिन पुरुषों के लिये जो जो स्नेह हितकारी हैं, उनके लिये उसी स्नेह
का उपदेश किया है। स्नेह की सेवन विधि दो प्रकार की है । एक सात रात
की और दूसरी तीन रात की । इनमे क्रूरकोष्ठ व्यक्तियों के लिये सात रात, और
मृदुकोष्ठ व्यक्ति के लिये तीन रात हैं* ॥५१॥
स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः ।
व्यायाम-मद्य-स्त्रीनित्याः स्नेह्याः स्युर्ये च चिन्तकाः ॥ ५२ ॥
स्नेहन के योग्य व्यक्ति—जो व्यक्ति स्वेद देने या संशोधन के योग्य हैं;
*जैसा आगे कहेंगे "त्र्यहावरं सप्तदिनं परन्दु स्निग्धो नरः स्वेदयितव्य इष्टः ।
नातः परं स्नेहनमादिशन्ति" ।
१६४ चरकसंहिता [ अ० १३
रूक्षप्रकृति, वातरोगी, नित्य व्यायामसेवी, नित्य मद्यसेवी, नित्य स्त्रीसेवी, और
जो चिन्ता (शोक) करते रहते हैं; वे व्यक्ति स्नेहन के योग्य हैं ॥ ५२ ॥
स्नेह के अयोग्य व्यक्ति—
संशोधनार्हते येषां रूक्षणं संप्रवक्ष्यते ।
न तेषां स्नेहनं शस्तमुत्सन्न-कफ-मेदसाम् ॥ ५३ ॥
अभिष्यण्यानन गुदा नित्यं मन्दाग्नयश्च ये ।
तृष्णा मूर्च्छा-परीताश्च गर्भिण्यस्तालु-शोषिणः ॥ ५४ ॥
अन्नद्विषश्छर्दयन्तो जठरामय-गरादिताः ।
दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहम्लाना मदातुराः ॥ ५५ ॥
न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तावस्तिकर्मसु ।
स्नेहपानात्प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः ॥ ५६ ॥
संशोधन किये बिना जिनका रूक्षण करना कहा जायेगा; उनको; जिनका
कफ और मेद बढ़ा हो, जिनके नाक, मुख और गुदा से स्राव होता हो, जिनको
सदा मन्दाग्नि रहती हो, प्यास और मूर्च्छा से आक्रान्त, गर्भवती, तालुकण्ठ
जिनका सूखता हो; भोजन से अरुचि करने वाले, वमन करते हुए, उदर रोगी
या विष से आक्रान्त, दुर्बल, ग्लानि करने वाले (कच्चे दिल के, घृणा करने
की प्रकृति के), स्नेह के पीने में जो प्रसन्न नहीं होते, घृणा करते हैं और मद
(नशे) से ग्रस्त व्यक्तियों को और नस्य कर्म एवं अनुवासन बस्ति जिन्होंने
ली हो उनको स्नेहन नहीं देना चाहिये । यदि इनको स्नेह पिलाया जायगा तो
भयानक रोग उत्पन्न हो जायेंगे । रूक्षण के योग्य—'अभिष्यन्दा महादोषा
मर्मस्था व्याधयश्च ये । ऊरुस्तम्भ-प्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः' ॥ ५३-५६ ॥
अस्निग्ध, स्निग्ध और अतिस्निग्ध के लक्षण—
पुरीषं ग्रथितं रूक्षं, वायुरप्रगुणो, मृदुः ।
पक्ता, खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम् ॥ ५७ ॥
जिसका मल बंधा हुआ, रूक्षता वायु अपनी प्रकृति में न हो, जाठराग्नि
मन्द हो, शरीर में कर्कशता रूखापन हो, तो समझे कि स्नेहन-क्रिया ठीक
नहीं हुई ॥ ५७ ॥
वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् ।
मार्दवं स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥ ५८ ॥
वायु की अनुकूलता, जाठराग्नि का बढ़ना (भूख का लगना), मल