चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
कषायवर्ग है ।
अदरक ), अम्लवेतस, मरिच ( काली मिरच ), अजमोदा ( अजवायन ),
भल्लातकास्थि ( भिलावे के बीज ), हिंगु-निर्यास ( हींग ), ये दस ‘दीपनीय’
अर्थात् भूख लगाने वाले अग्नि संदीपक हैं ॥ यह छः का बना हुआ
कषायवर्ग है ।
ऐन्द्रयृषभ्यतिरसर्ष्यप्रोक्ता-पयस्याश्वगन्धा-स्थिरा-रोहिणी-बलाति-
बला इति दशेमानि बल्यानि भवन्ति ॥ (७)॥
ऐन्द्री, ऋषभी ( कौंच ), अतिरसा ( शतावरी ), ऋष्यप्रोक्ता ( माषपर्णी ),
पयस्या ( विदारी ), अश्वगन्धा ( असगन्ध ), स्थिरा ( शालपर्णी ), रोहिणी
(कटुकी), बला ( खरैंटी ), अतिबला ( पीतबला ), ये दस 'बल्य' अर्थात् बल
कारक हैं ॥
चन्दन-तुङ्ग-पद्मकोशीर-मधुक-मञ्जिष्ठा-सारिवा-पयस्या-सिता-
लता इति दशेमानि वर्ण्यानि भवन्ति ॥ (८) ॥
चन्दन ( लाल चन्दन ), तुंग ( लाल नाग केशर ), पद्मक ( पद्माख ),
उशीर ( खस ), मधुक ( मुलहठी ), मञ्जिष्ठा ( मजीठ ), सारिवा (अनन्तमूल),
पयस्या (विदारी कन्द), सिता (सफेद दूब), और लता १ (लाल दूब या प्रियंगु),
ये दस ‘वर्ण्य’ अर्थात् वर्णकारक, वर्ण बढ़ाने वाले हैं ॥
सारिवेक्षुमूल-मधुक-पिप्पली-द्राक्षा-विदारी-कैडर्य-हंसपदी-बृहती-
कण्टकारिका इति दशेमानि कण्ठ्यानि भवन्ति ॥ ( ९ ) ॥
सारिवा ( अनन्तमूल ), इक्षुमूल ( ईख की जड़ ), मधुक ( मुलहठी ),
पिप्पली, द्राक्षा ( किशमश ), विदारी कन्द, कैडर्य ( नीम ), हंसपदी ( मण्डू-
कर्णी या ब्राह्मी ), बृहती ( बड़ी कटेरी ), कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ), ये
दस औषधियां 'कण्ठ्य' स्वर के लिये हितकारी हैं ॥
आम्राम्रातक-निकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल-बदर-दाडिम-
मातुलुङ्गानीति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति ॥ (१०) ॥
इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [२] ॥
आम्र ( आम ), आम्रातक ( अम्बाड़ा ), निकुच ( बडु बड़इल ), करमर्द
( करञ्ज ), वृक्षाम्ल ( इमली ); अम्लवेतस, कुवल ( बड़ा बेर ), बदर ( झाड़ी
का बेर ), दाडिम ( अनार ), मातुलुंग ( बिजौरा ), ये दस ‘हृद्य’ अर्थात्
हृदय के लिये हितकारी हैं ॥ यह चार से बना हुआ कषायवर्ग है ।
१. जल्पकल्पतरु में 'लता' का अर्थ मंजीठ किया है, परन्तु मंजीठ का
कथन भी इसमें है, अतः दूब अर्थ ही उचित है ।
५२ चरकसंहिता [ अ० ४
नागर-चित्रक-चव्य-विडङ्ग-मूर्वा-गुडूची-वचा-मुस्त-पिप्पली-पटोला-
नीति दशेमानि तृप्तिघ्नानि भवन्ति ॥ ( ११ ) ॥
नागर (सोंठ), चित्रक (चीतामूल), चव्य (चविका), विडंग
(वायविडंग), मूर्वा (मोरवेल), गुडूची (गिलोय), वचा (वच), मुस्त
(नागर मोथा), पिप्पली, पटोल (परवल) ये दस 'तृप्तिघ्न' अर्थात् श्लेष्मा
जनित तृप्ति को नाश करने वाली हैं ॥
कुटज-बिल्व-चित्रक-नागरातिविषाभया-धन्वयासक-दारुहरिद्रा-वचा-
चव्यानीति दशेमान्यर्शोघ्नानि भवन्ति ॥ ( १२ ) ॥
कुटज (कुड़ा), बिल्व (बेलगिरी), चित्रक (चीतामूल), नागर (सोंठ),
अतिविषा (अतीस), अभया (बड़ी हरड़), धन्वयासक (धमासा), दारु-
हरिद्रा (दारुहल्दी), वच और चव्य (चविका) ये दस औषधियां 'अर्शोघ्न'
अर्थात् बवासीर रोग के नाशक हैं ॥
खदिराभयामलक-हरिद्रारुष्कर-सप्तपर्णारग्वध-करवीर-विडङ्ग-जा-
तिप्रवाला इति दशेमानि कुष्ठघ्नानि भवन्ति ॥ ( १३ ) ॥
खदिर (खैर), अभया (जंगी हरड़), आमलक (आंवला), हरिद्रा-
(हल्दी), अरुष्कर (भिलावा), सप्तपर्ण (सातवन), आरग्वध (अमलतास),
करवीर (कनेर), विडंग (वायविडंग), और जातिप्रवाल (चमेली के
नवीन कोमल पत्ते) ये दस कुष्ठघ्न अर्थात् कोढ़ रोग के नाशक हैं ॥
चन्दन-नलद-कृतमाल-नक्तमाल-निम्ब-कुटज-सर्षप-मधुक-दारुहरि-
द्रा-मुस्तानीति दशेमानि कण्डूघ्नानि भवन्ति ॥ ( १४ ) ॥
चन्दन (लाल चन्दन), नलद (जटामांसी), कृतमाल (अमलतास) नक्त-
माल (करंज), निम्ब (नीम के पत्ते), कुटज (कूड़े की छाल), सर्षप (सरसों),
मधुक (मुलैहटी), दारु हरिद्रा (दारु हल्दी), और मुस्त (नागर मोथा),
ये दस औषधियां 'कण्डूघ्न' अर्थात् खाज नाशक हैं ॥
अक्षीव-मरिच-गण्डीर-केबुक-विडङ्ग-निर्गुण्डी-किणिही-श्वदंष्ट्रा-वृष-
पर्णिकाखुपर्णिका इति दशेमानि क्रिमिघ्नानि भवन्ति ॥ ( १५ ) ॥
अक्षीव (सहजन), काली मरिच, गण्डीर (जिमीकन्द), केबुक, विडंग
(वायविडंग), निर्गुण्डी (सम्भालु), किणिही (अपामार्ग), श्वदंष्ट्रा (गोखरू),
वृषपर्णी, आखुपर्णिका (मूसाकानी), ये दस कृमिघ्न अर्थात् कृमिनाशक हैं ॥