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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६६

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६६
करने चाहिये । मनुष्य मन वचन और शरीर से पापरहित होकर ही 'पुण्य'
शब्द का भागी होता है । उसमें 'पुण्य' शब्द तभी सार्थक होता है और तभी
वह धर्म, अर्थ और काम इनको प्राप्त करता है, और सुख का भी भोग
कर सकता है ॥ २६-३० ॥
व्यायाम—
शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी ।
देह-व्यायाम-संख्याता मात्रया तां समाचरेत् ॥ ३१ ॥
लाघवं कर्म-सामर्थ्यं स्थैर्यं क्लेश सहिष्णुता ।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ॥ ३२ ॥
जो शारीरिक चेष्टायें शरीर की स्थिरता, दृढ़ता के लिये शरीर के बल को
बढ़ाने की इच्छा से की जाती हैं, उनको 'व्यायाम' कहते हैं । इस व्यायाम को
'मात्रा' में सेवन करना चाहिये । व्यायाम के गुण—
व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, काम करने की शक्ति, शरीर एवं
यौवन का टिकाऊपन, दुःख को सहन करने की शक्ति, वात आदि दोषों का
शमन, जठराग्नि की प्रदीप्ति होती है ।॥३१-३२॥
अधिक व्यायाम से हानियां—
श्रमः क्लमः क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं प्रतामकः ।
अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते ॥ ३३ ॥
शरीर का थकान, मन और इन्द्रियों का थकान धातुओं का क्षय, रक्तपित्त
रोग, प्रतमक संज्ञक श्वास, खांसी, ज्वर और वमन .अधिक व्यायाम से
उत्पन्न होते हैं ॥ ३३ ॥
व्यायाम-हास्य-भाष्याध्व-ग्राम्यधर्म-प्रजागरान् ।
नोचितानपि सेवेत बुद्धिमानतिमात्रया ॥ ३४ ॥
एतानेवविधांश्चान्यान् योऽतिमात्रं निषेवते ।
गजः सिंहमिवाऽऽकर्षन् सहसा स विनश्यति ॥ ३५ ॥
उचितादहिताद्धीमान् क्रमशो विरमेन्नरः ।
शरीर का परिश्रम, हँसना, ऊँचा या अधिक बोलना, ( मार्ग चलना सफर
करना ), ग्राम्यधर्म, ( मैथुन ), प्रजागर ( रात को जागना ), इन उचित
कार्यों को भी बुद्धिमान् मनुष्य अधिक मात्रा में सेवन न करे ।
इन ऊपर लिखे हुए या अन्य इसी प्रकार के कार्यों को जो मनुष्य अधिक
सेवन करता है, जिस प्रकार कि हाथी सिंह, को खींचता हुआ
मरता है, उसी प्रकार वह मनुष्य भी नष्ट हो जाता है । इसलिये बुद्धि-

मान् मनुष्य को चाहिये कि छोड़ने योग्य उन दुःखदायी कर्मों से क्रमशः
हट जावे ॥ ३४-३५ ॥
हितं क्रमेण सेवेत, क्रमश्चात्रोपदिश्यते ॥ ३६ ॥
प्रक्षेपचापचये नाभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत् ।
एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं व्यन्तरं त्र्यन्तरं तथा ॥ ३७ ॥
क्रमेणापचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः ।
सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च ॥ ३८ ॥
हितकारी कार्यों का (क्रमशः) सेवन करना चाहिये । यहां अब क्रम का
उपदेश करते हैं। छोड़ने लायक ( सञ्चय करन योग्य ) कार्य को चौथाई भाग
करके क्रम से सेवन करना चाहिये । फिर दो और फिर तीन भाग छोड़ कर
ग्रहण करना चाहिये । अर्थात् छोड़ने योग्य एवं ग्रहण करने योग्य कार्य
दोनों के चार चार भाग करने चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म का एक भाग
छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म का एक भाग उसके स्थान पर ग्रहण
करना चाहिये । फिर दो भाग छोड़ कर दो भाग ग्रहण करने चाहिये
और फिर तीन भाग छोड़ कर तीन भाग ग्रहण करने चाहिये और पुनः सारा
छोड़कर सारा ग्रहण कर लेना चाहिये । ग्रहण करते समय एक दो तीन
चार दिन का अन्तर क्रम से देना चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म को चतुर्थांश
छोड़ कर ग्रहण करने योग्य कर्म का चतुर्थांश ग्रहण करे । इस विधान को एक
दिन बरते । तीसरे दिन छोड़ने योग्य कर्म के दो भाग छोड़ कर ग्रहण करने
योग्य कर्म के दो भाग ग्रहण करे-इस प्रकार दो दिन करे । फिर तीन भाग
छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म के तीन भाग ग्रहण करे-इस प्रकार तीन दिन
करे और फिर सारा कर्म छोड़कर सम्पूर्ण का ग्रहण कर लेवे । ऊपर बताये हुए
क्रम पूर्वक छोड़े हुए दोष फिर पैदा नहीं होते और क्रम से ग्रहण किये हुए गुण
नष्ट नहीं होते, चिरकाल तक स्थिर रहते हैं । हितकारी पदार्थ भी सहसा उपयोग
करने से अग्निनाश, अरुचि आदि करते हैं, इसलिये इनको भी क्रम से ही
ग्रहण करना चाहिये । इन सब कार्यों में मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान अपेक्षित
है, क्योंकि कुछ कार्य ऐसे हैं जो कि एक के लिये अहितकारी हों, परन्तु दूसरे
के लिये हितकारी ॥ ३६-३८ ॥
सम-पित्तानिल-कफाः केचिद् गर्भादि-मानवाः ।
दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ॥ ३९ ॥
तेषामनातुराः पूर्वे, वातलाद्याः सदाऽऽतुराः ।
दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिरुच्यते ॥ ४० ॥