चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३२५
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३२५
गन्धलाः कुरुविन्दाश्च षष्टिकाल्पान्तरा गुणैः ॥ १४ ॥
मधुरश्चाम्लपाकश्च व्रीहिः पित्तकरो गुरुः ।
बहुमूत्रपुरीषोष्मा त्रिदोषस्त्वेव पाटलः ॥ १५ ॥
सकोरदूषः श्यामाकः कषायमधुरो लघुः ।
वातलः कफपित्तघ्नः शीतः संग्राहिशोषणः ॥ १६ ॥
हस्ति-श्यामाक-नीवार-तोय-पर्णी-गवेधुकाः
प्रशान्तिकाम्भः श्यामाक-लोहिताणु-प्रियङ्गवः ॥ १७ ॥
मुकुन्दो झिण्टिगर्मुटी चारुका वरकास्तथा ।
शिबिरोत्कटतूर्णाह्वाः श्यामाकसदृशा गुणैः ॥ १८ ॥
रूक्षः शीतोऽगुरुः स्वादुर्बहुवातशकृद्यवः ।
स्थैर्यकृत्सकषायस्तु बल्यः श्लेष्मविकारनुत् ॥ १९ ॥
रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपित्तहा ।
मेदः कृमिविषघ्नश्च बल्यो वेणुयवो मतः ॥ २० ॥
सन्धानकृद्वातहरो गोधूमः स्वादुशीतलः ।
जीवनो बृंहणो वृष्यः स्निग्धः स्थैर्यकरो गुरुः ॥ २१ ॥
नन्दीमुखी मधूली च मधुरस्निग्धशीतले ।
इत्ययं शूकधान्यानां पूर्वो वर्गः समाप्यते ॥ २२ ॥
रक्तशालि, महाशालि, कलम, शकुनाहृत, तूर्णक, दीर्घशूक, गौर, पाण्डुक,
लांगुल, सुगन्धिकर (हंसराज), लोहवाल, शारिवा, प्रमोढक, पतंग और
तपनीय तथा अन्य उत्तम शालि (चावल) ठण्डे, रस और विपाक में मधुर,
किंचित् वातकारक, स्निग्ध, पुष्टिकारक, शुक्र और मूत्रवर्द्धक हैं। मल को थोड़ा
उत्पन्न करनेवाले एवं रोकने वाले हैं (मधुर विपाक होने से कब्ज करना प्रभाव से
है)। इन सब चावलो में लाल चावल श्रेष्ठ हैं, ये लाल चावल तृषानाशक
और त्रिदोषनाशक हैं। इन से उतर कर महान् शालि, फिर कलम और फिर
उत्तरोत्तर गुण न्यून होते गये हैं। यवक, १ हायन, पांसु, वाप्य, नैषध आदि
चावल (मोटे धान्य) लाल चावल आदि के विपरीत गुण करते हैं। अर्थात्
लाल चावल, तृषानाशक और त्रिदोषहारक हैं और ये इन के विरुद्ध गुण वाले
हैं। (३) षष्टिक (साठी ग्रीष्म ऋतु में पकने वाले) धान्य शीत, लघु,
१. यहां पर दिये हुए नाम नाना देशों में प्रसिद्ध हैं। इसलिये सब का
लिखना असम्भव है। 'शालि है मन्तं धान्यम्, षष्टिकादयश्च, ग्रीष्मकाः,
व्रीहयः शारदाः'--इन में यही भेद है।
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मधुर, त्रिदोष नाशक, शरीर को दृढ़ करने वाले हैं। इन में श्वेत साठी श्रेष्ठ
हैं, और काली जाति के धान्य इन से हीन गुण वाले हैं, ( ४ ) वरक, उद्दा-
लक, चीन; शारद, उज्ज्वल, दर्दुर, गन्धक और कुरुविन्द ये षष्टिक धान्यों की
जातियां हैं। ये गुणों में हीनगुण वाले होते हैं । ( ५ ) व्रीहि ( शरद् ऋतु में
पकने वाले ) चावल, मधुर रस, अम्लपाकी, पित्तकारक गुरु हैं। इनमें पाटल
जाति का धान्य मल-मूत्रवर्द्धक और त्रिदोषकारक है ।
( ५ ) कोरदूष ( कोद्रव कुधान्य कोदों). श्यामाक ( सांवक ) ये धान्य
कषाय और मधुर रस, लघु, वायुकारक, कफ-पित्तनाशक, शीतवीर्य, संग्राही
और शोषक हैं। ( ६ ) हस्ति, सांवक, नीवार ( देवभात ), तोयपर्णी, गवेधुक,
प्रशान्तिका; अम्भःश्यामाक, लोहिताणु, प्रियंगु ( कांग ), मुकुन्द, झिंटी, गर्मुटी,
चारुक, वरक, शिविर, उत्कट, जूर्णाह ( जोनार ) ये सब धान्य गुणों में
सांवक के समान हैं। ( ७ ) जौ रूक्ष, शीत, गुरु, मधुर रस, वायु और मल-
कारक, शरीर को स्थिर करने वाले, कषाय रस, बल कारक और कफजन्य
विकारों को नाश करने वाले हैं। वेणुयव रूक्ष, मधुर, कषाय अनुरस, कफ-
पित्तनाशक, मेद, कृमि और विष के नाशक एवं बलकारक हैं। ( ८ ) गेहूँ-
टूटे हुए को मिलाने वाला, वातनाशक, स्वादु रस, शीत वीर्य जीवनीय, बृंहण-
कारक, वृष्य, शुक्रवर्द्धक, स्निग्ध, स्थिरताकारक गुरु है। नान्दीमुखी और
मधूली ये दोनों मधुर, स्निग्ध, शीतल हैं । यह शूक-धान्यो का पहिला वर्ग
समाप्त हुआ ॥ ८-२२ ॥
इति शूकधान्यवर्गः ।
अथ शमीधान्यवर्गः ।
कषायमधुरो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः ।
विशदः श्लेष्मपित्तघ्नो मुद्गः सूप्योत्तमो मतः ॥ २३ ॥
वृष्यः परं वातहरः स्निग्धोष्णमधुरो गुरुः ।
बल्यो बहुमलः पुंस्त्वं माषः शीघ्रं ददाति च ॥ २४ ॥
राजमाषः सरो रुच्यः कफ-शुक्राम्ल-पित्तकृत् ।
तत्स्वादुर्वातलो रूक्षः कषायो विशदो गुरुः ॥ २५ ॥
उष्णाः कषायाः पाकेऽम्लाः कफशुक्रानिलापहाः ।
कुलत्था ग्राहिणः कास-हिक्का-श्वासार्शसां हिताः ॥ २६ ॥
मधुरा मधुराः पाकेऽग्राहिणो रूक्षशीतलाः ।
मकुष्ठकाः प्रशस्यन्ते रक्त-पित्त-ज्वरादिषु ॥ २७ ॥