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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 639 में से

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पृष्ठ 344

३२६ चरकसंहिता [ अ० २७
मधुर, त्रिदोष नाशक, शरीर को दृढ़ करने वाले हैं। इन में श्वेत साठी श्रेष्ठ
हैं, और काली जाति के धान्य इन से हीन गुण वाले हैं, ( ४ ) वरक, उद्दा-
लक, चीन; शारद, उज्ज्वल, दर्दुर, गन्धक और कुरुविन्द ये षष्टिक धान्यों की
जातियां हैं। ये गुणों में हीनगुण वाले होते हैं । ( ५ ) व्रीहि ( शरद् ऋतु में
पकने वाले ) चावल, मधुर रस, अम्लपाकी, पित्तकारक गुरु हैं। इनमें पाटल
जाति का धान्य मल-मूत्रवर्द्धक और त्रिदोषकारक है ।
( ५ ) कोरदूष ( कोद्रव कुधान्य कोदों). श्यामाक ( सांवक ) ये धान्य
कषाय और मधुर रस, लघु, वायुकारक, कफ-पित्तनाशक, शीतवीर्य, संग्राही
और शोषक हैं। ( ६ ) हस्ति, सांवक, नीवार ( देवभात ), तोयपर्णी, गवेधुक,
प्रशान्तिका; अम्भःश्यामाक, लोहिताणु, प्रियंगु ( कांग ), मुकुन्द, झिंटी, गर्मुटी,
चारुक, वरक, शिविर, उत्कट, जूर्णाह ( जोनार ) ये सब धान्य गुणों में
सांवक के समान हैं। ( ७ ) जौ रूक्ष, शीत, गुरु, मधुर रस, वायु और मल-
कारक, शरीर को स्थिर करने वाले, कषाय रस, बल कारक और कफजन्य
विकारों को नाश करने वाले हैं। वेणुयव रूक्ष, मधुर, कषाय अनुरस, कफ-
पित्तनाशक, मेद, कृमि और विष के नाशक एवं बलकारक हैं। ( ८ ) गेहूँ-
टूटे हुए को मिलाने वाला, वातनाशक, स्वादु रस, शीत वीर्य जीवनीय, बृंहण-
कारक, वृष्य, शुक्रवर्द्धक, स्निग्ध, स्थिरताकारक गुरु है। नान्दीमुखी और
मधूली ये दोनों मधुर, स्निग्ध, शीतल हैं । यह शूक-धान्यो का पहिला वर्ग
समाप्त हुआ ॥ ८-२२ ॥
इति शूकधान्यवर्गः ।
अथ शमीधान्यवर्गः ।
कषायमधुरो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः ।
विशदः श्लेष्मपित्तघ्नो मुद्गः सूप्योत्तमो मतः ॥ २३ ॥
वृष्यः परं वातहरः स्निग्धोष्णमधुरो गुरुः ।
बल्यो बहुमलः पुंस्त्वं माषः शीघ्रं ददाति च ॥ २४ ॥
राजमाषः सरो रुच्यः कफ-शुक्राम्ल-पित्तकृत् ।
तत्स्वादुर्वातलो रूक्षः कषायो विशदो गुरुः ॥ २५ ॥
उष्णाः कषायाः पाकेऽम्लाः कफशुक्रानिलापहाः ।
कुलत्था ग्राहिणः कास-हिक्का-श्वासार्शसां हिताः ॥ २६ ॥
मधुरा मधुराः पाकेऽग्राहिणो रूक्षशीतलाः ।
मकुष्ठकाः प्रशस्यन्ते रक्त-पित्त-ज्वरादिषु ॥ २७ ॥