चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८७
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८७
जिषु चेतसो नेत्रस्य मातृ-पितृ-भ्रातृ-बन्धुवद्देवं युक्ता १ भवन्त्यग्निवेश !
प्राणानामभिसरा हन्तारो रोगाणामिति ॥ ७ ॥
वैद्यों के लक्षण—हे अग्निवेश ! वैद्य दो प्रकार के होते हैं। एक, 'प्राणा-
भिसर' प्राणों को लाने वाले और रोगों का नाश करने वाले। दूसरे 'रोगाभि-
सर' रोगों को लाने वाले और प्राणों का नाश करने वाले।
इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश बोले—हम इन
दोनों प्रकार के वैद्यों को किस प्रकार से किन किन लक्षणों से जान सकते हैं।
भगवान् आत्रेय ने कहा कि जो कुलीन उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हों,
जिनकी बुद्धि व शास्त्रज्ञान निर्मल हो, जिन्होंने क्रिया-कर्म देखा हो, जो अनु-
भवी, चतुर, सदाचारी, अभ्यस्त हाथ वाले (शस्त्र चलाने में जिनको संशय
न हो, कुशल हाथवाले) जितेन्द्रिय, सर्व सामग्री से सम्पन्न, आंख, कान आदि
सब इन्द्रियों से युक्त, जो कि शरीर की नीरोगस्थिति को भली प्रकार जानते हैं,
उत्तम सूक्ष्म व परिणाम को भली प्रकार जानने वाले हों वे वैद्य प्राणरक्ष-
क एवं रोगनाशक होते हैं। इस प्रकार से वैद्य सम्पूर्ण शरीर के ज्ञान से,
वीर्य और शोणित के संयोग से शरीर किस प्रकार बनता है इसको जान,
शारीरस्थान में कहे सांख्यशास्त्र के अनुसार प्रकृति विकृति के ज्ञान को
बिना सन्देह के समझते हों, सुखसाध्य, कष्टसाध्य, याप्य वा असाध्य इन चार
प्रकार के रोगों के कारण, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना, अनुकूल, आहार-
विहार भली प्रकार जानते हों, सम्पूर्ण आयुर्वेद के सूत्र रूप जो
त्रिविध सूत्र हेतु, लिंग, लक्षण और औषध का ज्ञान है इसको; सामान्य और
विशेष रूप से इनके संक्षेप और विस्तार को तथा तीन प्रकार की औषध दैवव्य-
पाश्रय और युक्तिव्यपाश्रय, सत्वावजय समूह को जाननेवाले, १६ प्रकार की
मूलिनी ओषधियोंको, १६ प्रकार की फलवर्ग की ओषधियों को, चार प्रकार के
स्नेहों, पांच प्रकार के नमक, आठ प्रकार के मूत्र, आठ प्रकार के दूध, छः
प्रकार के क्षीरी-वृक्षों को, शिरोविरेचनादि पंचकर्मों के औषध समूहों को, अष्टा-
दश प्रकार की यवागुओं को, ३२ प्रकार के चूर्ण या प्रदेहों को, छः सौ विरेचन,
पांच सौ कषाय, मनुष्यों की प्रकृति स्वस्थ रहे इसके लिये भोजन, पान, के
नियम, स्थान, चलना, फिरना, सोना, बैठना, मात्रा, द्रव्य, अंजन, धूमपान, नस्य,
अभ्यंजन, स्नान, वेगों को न रोकना, व्यायाम, सात्म्य, इन्द्रियपरीक्षा-उपक्रम,
सद्वृत्त में कुशल, इनके नियमों को जानने वाले, चिकित्सा के चारों पाद और
१. 'बन्धुवद्देवमुक्ता' इति पाठः ॥
३८८ चरकसंहिता [ अ० २९
षोडश अंगो में सन्देहरहित, तीन प्रकार की बासना, वायु के गुण-दोष में सन्दे-
हरहित; चार प्रकार के स्नेह, स्नेह की २४ प्रकार की विचारणा में चतुर; रस
भेद के ६४ प्रकार की योग्य योजना करने में, बहुत प्रकार के स्नेहन, स्वेदन,
वमन, विरेचन ओषधियो को यथायोग्य प्रयोग करने में कुशल, शिरोरोगादि
रोग, वातादि दोषों की अधिकता या कमी से उत्पन्न होने वाले रोगों को;
क्षय, पिड़का, तीन प्रकार की विद्रधि, शोथजन्य नाना प्रकार के रोगों को,
रोगों के ४८ प्रकरण, १४० प्रकार के वात, पित्त, कफ रोगों को निन्दित
अतिस्थूल अतिकृश पुरुषों की हेतु, लक्षण, चिकित्सा को; हितकर अहितकर
निद्रा को; अनिद्रा व अतिनिद्रा „के कारण और चिकित्सा को;- लंघनादि
छः प्रकार की चिकित्सा को, सन्तर्पण अपतर्पण से होने वाले रोगों को,
उनकी चिकित्सा को जानें, रक्तजन्य रोग, मद, मूर्च्छा और संन्यास के कारण,
लक्षण और चिकित्सा में कुशल, आहारांवेधि में कुशल, स्वभावतः पथ्यापथ्य
आहार व संस्कार से होने वाले परिवर्त्तन, चौरासी ( ८४ ) प्रकार के
आसव, रस व अनुरसात्मक द्रव्य गुण निश्चय, विकल्प में कुशल; अन्नपान के
बारह वर्ग, गुण, प्रभाव, अनुपान गुण, अन्नपानादि से, रसादि धातुओं की
उत्पत्ति किस प्रकार होती है, पथ्यापथ्य, आहार के हितकारी फल, वातादि दोष
के प्रकुपित होने से उत्पन्न होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा, प्राणा-
यतनों के दस स्थान, इन सब विषयों में तथा अगले 'अर्थे दशमहामूलीय'
अध्याय में जो कुछ कहेंगे, उन सब में निपुण, आयुर्वेद के उद्देश, लक्षण को
जानने वाले हों, एवं आयुर्वेद शास्त्र के ग्रहण करने, ग्रहण किये हुए को धारण
करने और अर्थ से जानने, प्रयोग, चिकित्सा-प्रयोग, अनेक प्रकार से चिकित्सा
करने, कार्य-धातुओं के समान करने, काल, क्रिया, काल, कर्त्ता, भिषक् , करण
औषध में कुशल, तथा स्मरण शक्ति, बुद्धि, शास्त्रयोजना और तर्कज्ञान में समर्थ,
अपने शील, स्वभाव रूपी गुणों से सब प्राणि मात्रों में मन, आत्मा द्वारा, माता,
पिता, भाई, बन्धु, आदि के समान मैत्री भाव रखने में कुशल होते हैं, स्नेह का
व्यवहार करते हैं, हे अग्निवेश ! इस प्रकार के जो वैद्य होते हैं, वे 'प्राणा-
भिसर' अर्थात् प्राणरक्षक तथा रोगनाशक होते हैं ॥ ५-७ ॥
अतो विपर्ययेण विपरीता रोगाणामभिसरा हन्तारः प्राणानां भिष-
क्छद्मप्रतिच्छन्नाः कण्टकभूता लोकस्य प्रतिरूपकत्यक्तधर्माणो राज्ञां
प्रमादाच्चरन्ति राष्ट्राणि । तेषामिदं विशेषविज्ञानम् । अस्यर्धं वैद्यवेषेण
श्लाघमाना विशिखान्तरमनुचरन्ति कर्मलोभात्, श्रुत्वा च कस्यचिदा-