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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 639 में से

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पृष्ठ 406

३८८ चरकसंहिता [ अ० २९
षोडश अंगो में सन्देहरहित, तीन प्रकार की बासना, वायु के गुण-दोष में सन्दे-
हरहित; चार प्रकार के स्नेह, स्नेह की २४ प्रकार की विचारणा में चतुर; रस
भेद के ६४ प्रकार की योग्य योजना करने में, बहुत प्रकार के स्नेहन, स्वेदन,
वमन, विरेचन ओषधियो को यथायोग्य प्रयोग करने में कुशल, शिरोरोगादि
रोग, वातादि दोषों की अधिकता या कमी से उत्पन्न होने वाले रोगों को;
क्षय, पिड़का, तीन प्रकार की विद्रधि, शोथजन्य नाना प्रकार के रोगों को,
रोगों के ४८ प्रकरण, १४० प्रकार के वात, पित्त, कफ रोगों को निन्दित
अतिस्थूल अतिकृश पुरुषों की हेतु, लक्षण, चिकित्सा को; हितकर अहितकर
निद्रा को; अनिद्रा व अतिनिद्रा „के कारण और चिकित्सा को;- लंघनादि
छः प्रकार की चिकित्सा को, सन्तर्पण अपतर्पण से होने वाले रोगों को,
उनकी चिकित्सा को जानें, रक्तजन्य रोग, मद, मूर्च्छा और संन्यास के कारण,
लक्षण और चिकित्सा में कुशल, आहारांवेधि में कुशल, स्वभावतः पथ्यापथ्य
आहार व संस्कार से होने वाले परिवर्त्तन, चौरासी ( ८४ ) प्रकार के
आसव, रस व अनुरसात्मक द्रव्य गुण निश्चय, विकल्प में कुशल; अन्नपान के
बारह वर्ग, गुण, प्रभाव, अनुपान गुण, अन्नपानादि से, रसादि धातुओं की
उत्पत्ति किस प्रकार होती है, पथ्यापथ्य, आहार के हितकारी फल, वातादि दोष
के प्रकुपित होने से उत्पन्न होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा, प्राणा-
यतनों के दस स्थान, इन सब विषयों में तथा अगले 'अर्थे दशमहामूलीय'
अध्याय में जो कुछ कहेंगे, उन सब में निपुण, आयुर्वेद के उद्देश, लक्षण को
जानने वाले हों, एवं आयुर्वेद शास्त्र के ग्रहण करने, ग्रहण किये हुए को धारण
करने और अर्थ से जानने, प्रयोग, चिकित्सा-प्रयोग, अनेक प्रकार से चिकित्सा
करने, कार्य-धातुओं के समान करने, काल, क्रिया, काल, कर्त्ता, भिषक् , करण
औषध में कुशल, तथा स्मरण शक्ति, बुद्धि, शास्त्रयोजना और तर्कज्ञान में समर्थ,
अपने शील, स्वभाव रूपी गुणों से सब प्राणि मात्रों में मन, आत्मा द्वारा, माता,
पिता, भाई, बन्धु, आदि के समान मैत्री भाव रखने में कुशल होते हैं, स्नेह का
व्यवहार करते हैं, हे अग्निवेश ! इस प्रकार के जो वैद्य होते हैं, वे 'प्राणा-
भिसर' अर्थात् प्राणरक्षक तथा रोगनाशक होते हैं ॥ ५-७ ॥
अतो विपर्ययेण विपरीता रोगाणामभिसरा हन्तारः प्राणानां भिष-
क्छद्मप्रतिच्छन्नाः कण्टकभूता लोकस्य प्रतिरूपकत्यक्तधर्माणो राज्ञां
प्रमादाच्चरन्ति राष्ट्राणि । तेषामिदं विशेषविज्ञानम् । अस्यर्धं वैद्यवेषेण
श्लाघमाना विशिखान्तरमनुचरन्ति कर्मलोभात्, श्रुत्वा च कस्यचिदा-