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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १ ] सूत्रस्थानम् ७

अ० १ ] सूत्रस्थानम् ७
अहो साध्विति घोषश्च लोकाँस्त्रीनन्वनादयत् ।
नभसि स्निग्धगम्भीरो हर्षाद् भूतैरुदीरितः ॥ ३७ ॥
शिवो वायुर्ववौ सर्वा भाभिरुन्मीलिता दिशः ।
निपेतुः सजलाश्चैव दिव्याः कुसुमवृष्टयः ॥ ३८ ॥
अथाग्निवेशप्रमुखान् विविशुर्ज्ञानदेवताः ।
बुद्धिः सिद्धिः स्मृतिर्मेधा धृतिः कीर्तिः क्षमा दया ॥ ३९ ॥
तानि चानुमतान्येषां तन्त्राणि परमर्षिभिः ।
भवाय भूतसंघानां प्रतिष्ठां भुवि लेभिरे ॥ ४० ॥
अग्निवेश की बुद्धि विशेष थी, मुनि आत्रेय के उपदेशमें कोई अन्तर नहीं
था । अग्निवेश ही सब से प्रथम आयुर्वेद-तंत्र का कर्त्ता हुआ । इसके पीछे
भेड आदि बुद्धिमान् शिष्यों ने भी अपने अपने तंत्र बना कर बहुत से ऋषियों
के साथ विराजमान आत्रेय मुनि को सुनाये । पुण्यकर्मा अग्निवेश आदि ऋषियों
द्वारा भली प्रकार से सूत्र रूप से गुंथे हुए आयुर्वेद शास्त्र को सुनकर वे बहुत
प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका प्रसन्नता से अनुमोदन भी किया कि ठीक
प्रकार से ग्रथित ( गुंथा ) हुआ है । सब प्राणियों पर दयालु उन ऋषियों की
सब ने ही प्रशंसा की । सब ने एक साथ उच्चस्वर से कहा कि आपने प्राणियों
पर बहुत उत्तम रूप से दया की है । स्वर्ग में स्थित देवों के सहित नारद
आदि देव-ऋषियों ने भी उन परम ऋषियों के पुण्य शब्द को सुना । इस को
सुनकर वे भी बहुत प्रसन्न हुए । समस्त प्राणियों ने हर्ष से अति स्नेह युक्त
एवं गम्भीर शब्द से साधुवाद दिया । इस साधुवाद की ध्वनि आकाश में फैल
कर तीनों लोकों को गुंजा दिया । सुखदायक वायु बहने लगा, सब दिशायें प्रकाश
से चमकने लगीं, जल से भी दिव्य कुसुम बरसने लगे ।
( बुद्धि ) उपलब्धि, ( सिद्धि ) साध्य-साधन, ( स्मृति ) पूर्व अनुभूत
अर्थ का स्मरण, ( मेधा ) धारण करने की शक्ति, ( धृति ) मन की संतुष्टि,
( कीर्ति ) यश, ( क्षमा ) अपकारी के प्रति अनपकार की इच्छा, ( दया )
प्राणियों के दुःख हटाने की इच्छा, ये ज्ञानमय देवता अग्निवेश आदि ऋषियों
में प्रविष्ट हुए अर्थात् ये शुभ गुण इन में आये ।
महर्षियों द्वारा अनुमोदित उक्त ऋषियों के शास्त्र लोगों के परम कल्याण
के लिये पृथिवी पर प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए ॥ ३२-४० ॥
आयुर्वेद का लक्षण—
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् ।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ॥ ४१ ॥

८ चरकसंहिता [ अ० १
हित, अहित, सुख और दुःख यह चार प्रकार की 'आयु' है। इस आयु
का हित-अहित, पथ्यापथ्य, और इस आयु का मान-परिमाण यह सब जिस
शास्त्र में कहा हो, तथा आयु का लक्षण जिसमें हो, उसे 'आयुर्वेद'१ कहते हैं।
हित आयु, अहित आयु, सुखी आयु, दुःखी आयु, चार प्रकारकी आयु है ॥४१॥
आयु का लक्षण—
शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो, धारि जीवितम् ।
नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ ४२ ॥
(शरीर) पंच महाभूतों से बना, आत्मा का अधिष्ठान, (इन्द्रिय) भौतिक
इन्द्रियां, (सत्त्व) मन, (आत्मा) द्रष्टा, भोक्ता, जीव और ईश्वर, इनके
संयोग का नाम 'आयु' है। आयु निरन्तर चलने वाला होने से 'आयु' कहाता
है [ एति गच्छतोति आयुः । ]
आयु अर्थात् जीवन के पर्यायवाची शब्द—(धारि) शरीर को धारण
करता है, (जीवित) प्राणों को धारण करता है, (नित्यग) निरन्तर चलता
है, (अनुबन्ध) प्राणों के साथ सम्बन्धित है, और 'चेतनानुवृत्ति' इन पर्यायों
से बतलाया जाता है२ ॥ ४२ ॥
तस्याऽऽयुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः ।
वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ४३ ॥
यह आयुर्वेद सब से अधिक श्रेष्ठ पुण्यजनक है [ क्योंकि अन्य ज्ञान पार-
लौकिक हित को ही बतलाते हैं ] यह आयुर्वेद इहलोक और परलोक दोनों के
हितों को कहता है, ऐसा ज्ञानियों का मत है३ ॥ ४३ ॥
सामान्य और विशेष—
सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ।
ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ॥ ४४ ॥
सामान्यमेकत्वकरं विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् ।
तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ॥ ४५ ॥
सब पदार्थों का सब कालों में 'सामान्य'—समान [ गुण आदि ] धर्म ही
वृद्धिका कारण होता है, और 'विशेष'—अर्थात् विभेद या विपरीत होना ही
ह्रास का कारण होता है। दोनों का शरीर के साथ सम्बन्ध सब पदार्थों की
१—“आयुरस्मिन्विन्दति वेत्ति वा आयुर्वेदः ।” सुश्रुत ॥
२—तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकार्थः ॥ सु० ॥
३—अत्राऽऽयत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेयः ॥ सुश्रुत० ॥