चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १ ] विमानस्थानम् ४७७
अ० १ ] विमानस्थानम् ४७७
शिथिल-मांस-शोणिता अपरिक्लैशसहाश्च भवन्ति। तद्यथा बाह्रीक-सौरा-
ष्ट्रिक-सैन्धव-सौवीरकाः, ते हि पयसाऽपि सदा लवणमश्नन्ति, येऽपीह
भूमेरत्यूषरा देशास्तेष्वौषधिवीरुद्वनस्पतिवानस्पत्या न जायन्तेऽल्पतेजसो
वा भवन्ति लवणोपहतत्वात्। तस्माल्लवणं नात्युपयुञ्जीत। ये ह्यतिल-
वणसात्म्याः पुरुषास्तेषामपि खालित्येन्द्रलुप्तपालित्यानि तथा वलयश्चा-
काले भवन्ति ॥ १६ ॥
लवण, उष्ण एवं तीक्ष्ण दोनों गुणों से युक्त है, न तो बहुत गुरु और न
बहुत स्निग्ध होता है। क्लिन्न करने वाला, विस्रंसन (बहाने की) शक्ति वाला,
भोजन में रुचि पैदा करने वाला, भली प्रकार उपयोग करने पर सम्पूर्णरूप
में कल्याणकारी है, ठीक प्रकार से न बरतने से दोषों को कुपित करने वाला
होता है। इस का उपयोग रुचि पैदा करने में, पाचन के लिये, क्लिन्न करने
के लिये और विस्रंसन के लिये प्रयुक्त होता है। इस का उपयोग बहुत अधिक
मात्रा में करने से शरीर में ग्लानि, शिथिलता और दुर्बलता उत्पन्न होती है।
जिस ग्राम, नगर, प्रान्त वा देश के व्यक्ति इस का निरन्तर उपयोग करते हैं,
उन को ग्लानि बहुत रहती है और उन के रुधिर, स्नायु और मांस शिथिल हो
जाते हैं। वे निर्बल होने से क्लेश सहने में असमर्थ रहते हैं। जैसे—बाह्लीक
(बल्ख), सौराष्ट्रिक (गुजराती, काठियावाड़ी), सैन्धव (सिन्धु देशी) और
सौवीर देश के लोग। ये लोग दूध के साथ भी लवण खाते हैं।
ऊषर भूमियों में ओषधि (फलवाली), लता, वनस्पति, फल-पुष्पवाले
वृक्ष उत्पन्न नहीं होते। यदि होते हैं तो वे अल्पबल होते हैं। नमक ही इन की
शक्ति को मार देता है, इसलिये नमक का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिये।
इस के अतिरिक्त जिन को लवण बहुत अनुकूल पड़ता है उन के बाल
शीघ्र गिर जाते हैं, जल्दी सफेद हो जाते हैं, इन्द्रलुप्त का रोग हो जाता है और
युवावस्था में ही चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं ॥ १६ ॥
तस्मात्तेषां तत्सात्म्यतः क्रमेणापगमनं श्रेयः; सात्म्यमपि हि क्रमे-
णोपनिर्वर्त्यमानमदोषमल्पदोषं वा भवति ॥ १७ ॥
इसलिये इन पुरुषों को 'न वेगान्धारणीय' (सूत्र ० ७) अध्याय में बतलाये
हुए क्रम से नमक के इस प्रकार सात्म्य (अनुकूलता) से पृथक् होना ही कल्या-
णकारी है, क्योंकि ऐसे सात्म्य से क्रमपूर्वक हटना दोषरहित अथवा थोड़े दोष-
: ॥ १७ ॥
४८८ चरकसंहिता [ अ० १
सात्म्य—उस को कहते हैं कि जो अपनी देह के लिये सुखकारक या
अनुकूल होता है। क्योंकि 'सात्म्य' का अर्थ 'उपशय' है ।
तत् त्रिविधं—प्रवरावरमध्यविभागेन । सप्तविधं च रसैकैकत्वेन,
सर्वरसोपयोगाच्च ॥ १८॥
तत्र सर्वरसं प्रवरं, अवरमेकरसं, मध्यमं तु प्रवरावरमध्यस्थम् ।
तत्रावरमध्याभ्यां सात्म्याभ्यां क्रमेण प्रवरमुपपादयेत्सात्म्यम् । सर्वरस-
मपि च द्रव्यं सात्म्यमुपपन्नं प्रकृत्याद्युपयोक्तृष्टमानि सर्वाण्याहारविधि-
विशेषायतनान्यभिसमीक्ष्य हितमेवानुरुच्येत ॥ १६ ॥
सात्म्य के भेद—यह सात्म्य तीन प्रकार का है । ( १ ) प्रवर
( २ ) मध्यम और ( ३ ) अवर । अथवा सात प्रकार का है । जैसे एक एक
रस से छः प्रकार का और सब रसों के उपयोग से सात प्रकार का है । इन
सातों में सब रसों का सात्म्य 'प्रवर' है । 'एक रस का सात्म्य 'अवर' निकृष्ट
है । प्रवर और अवर के मध्य में स्थित सात्म्य को 'मध्यम' कहते हैं । इन में
अवर और मध्यम सात्म्य को क्रमशः प्रवर सात्म्य में परिवर्तित करने का प्रयत्न
करना चाहिये । सब रसों का सात्म्य होने पर भी अर्थात् आहार-विधि के विशेष
उपयोग और प्रकृति आदि सब प्रकार के आठों अंगों को देखकर हितकारक
पदार्थों का सेवन करना चाहिये ॥ १८-१६ ॥
तत्र खल्विमान्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । तद्यथा प्रकृति-
करण-संयोग-राशि-देश-कालोपयोग-संस्थोपयोक्त्रष्टमानि भवन्ति ॥२०॥
आहार-विधि—ये निम्नलिखित आठ शर्ते आहार विधि में विशेष कारण
या उसके अंग होती हैं । ( १ ) प्रकृति, ( २ ) करण, ( ३ ) संयोग, ( ४ )
राशि, (५) देश, (६) काल, (७) उपयोग-संस्था और (८) उपयोक्ता ॥ २० ॥
तत्र प्रकृतिरुच्यते । स्वभावो यः स पुनराहारौषधद्रव्याणां स्वाभा-
विको गुर्वादिशुणयोगः । तद्यथा—माषमुद्गयोः, शूकरैणयोश्च ॥२१॥
उन में से प्रकृति का वर्णन करते हैं—( १ ) प्रकृति स्वभाव को कहते हैं ।
आहार-द्रव्य और औषध-द्रव्यों में जो गुरु, लघु आदि गुण स्वभाव से रहते हैं
उन का नाम प्रकृति है । जैसे माष ( उड़द ) और शूकर के मांस स्वभाव से
ही गुरु हैं और मूंग तथा हरिण के मांस स्वभाव से ही लघु होते हैं ॥ २१ ॥
करणं पुनः स्वाभाविकानां द्रव्याणामभिसंस्कारः, संस्कारो हि_
१.करीब सब रस के पदार्थ खाती है, इसलिये इस का मांस
निर्दोष माना है ।