चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३५
अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३५
आप्ताः शिष्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् ।
सत्यं, वक्ष्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ॥ २० ॥
जो पुरुष तप और ज्ञान के बल से रजोगुण और तमोगुण से मुक्त हो
चुके हैं, केवल सत्त्व गुण ही जिन में रह गया है, उनका ज्ञान भूत, भविष्य
और वर्त्तमान तीनों कालों में विशुद्ध और कभी भी बाधित नहीं होता । ऐसे
पुरुष 'आप्त', 'शिष्ट' और 'विबुद्ध' होते हैं, इन के वाक्य बिना सन्देह के होते
हैं । ये पुरुष सदा सत्य ही कहेंगे, जो पुरुष रजस् और तमस् से रहित हैं वे
असत्य कैसे बोल सकते हैं ? ॥ १६-२० ॥
प्रत्यक्ष का लक्षण—
आत्मेन्द्रिय-मनोऽर्थानां संनिकर्षात्प्रवर्त्तते ।
व्यक्ता तदात्वे या बुद्धिः प्रत्यक्षं सा निरुच्यते ॥ २१ ॥
आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थ ( पदार्थ ) इन चारों का एक साथ संयोग
होने से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उस को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं ॥ २१ ॥
अनुमान—
प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते ।
वह्निर्निगूढो धूमेन मैथुनं गर्भदर्शनात् ॥ २२ ॥
एवं व्यवस्यन्त्यतीतं, बीजात्फलमनागतम् ।
दृष्ट्वा बीजात्फलं जातमिहैव सदृशं बुधाः ॥ २३ ॥
प्रथम प्रत्यक्ष प्रमाण से देखकर तीन प्रकार से कार्य-लिंगानुमान, कारण-
लिंगानुमान और कार्य-कारण लिंगानुमान होता है, भूत, भविष्यत्, और
वर्त्तमान इन तीनों समय में परोक्ष का अनुमान किया जाता है । जैसे कि
छिपी अग्नि को धुंआ देखकर जानते हैं और गर्भ को देखकर मैथुन कर्म का
ज्ञान कर लेते हैं । इसी प्रकार से अतीत काल का ज्ञान अनुमान से कर लेते
हैं और जिस प्रकार बीज को देखकर अनागत फल का अनुमान हो जाता है,
जैसा बीज होता है, वैसा ही फल लगता है । इसी प्रकार भविष्य काल का भी
अनुमान से ज्ञान करते हैं ॥ २२-२३ ॥
युक्ति—
जल-कर्षण-बीजर्त्तु-संयोगात्सस्य-संभवः ।
युक्तिः षड्धातु-संयोगाद् गर्भाणां संभवस्तथा ॥ २४ ॥
मथ्य-मन्थन-मन्थान-संयोगादग्निसंभवः ।
युक्तियुक्ता चतुष्पाद-संपद्व्याधि-निबर्हणी ॥ २५ ॥
१३६ चरकसंहिता [ अ० ११
पानी, कर्षण ( हल चलाया हुआ खेत ), बीज और ऋतु इन चारों के
संयोग से अन्न उत्पन्न होता है। उत्तम क्षेत्र में समय पर उत्तम बीज पानी से
सींचकर बोने से अनाज होता है। इसलिये पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और
आकाश एवं चेतना इन छः के संयोग से गर्भ का होना सम्भव है; यह
युक्ति है। इसी प्रकार 'मन्थ्य' अरणी का अधः काष्ठ (नीचे की लकड़ी), मन्थन
( मथने का डण्डा ) और ( मन्थान ) मथनी चलाने वाला कर्ता, इन तीनों
के संयोग से अग्नि उत्पन्न होना सम्भव है। इसी प्रकार चतुष्पाद ( चिकित्सा
के चारों अङ्ग की ) युक्ति से युक्त सम्पत् रोग को नाश करने वाली है। यदि
चिकित्सा के चारों अंग ठीक तरह से प्रयुक्त किये जायें, तो रोग मिटना
सम्भव है ॥ २४-२५ ॥
बुद्धिः पश्यति या भावान् बहु-कारण-योगजान् ।
युक्तिस्त्रिकाला सा ज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यया ॥ २६ ॥
एषा परीक्षा नास्त्यन्या यया सर्वं परीक्ष्यते ।
परीक्ष्यं सदसच्चैव तया चास्ति पुनर्भवः ॥ २७ ॥
जो बुद्धि बहुत प्रकार के कारणों से उत्पन्न पदार्थों को ज्ञान के लिए
देखती है उस बुद्धि को 'युक्ति' कहते हैं। यह दृष्टि तीनों कालों के विषय को
देखती है, इस युक्ति से त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ
सिद्ध होते हैं। यह चार प्रकार की ( आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान और युक्ति )
परीक्षा है, इसमे भिन्न और परीक्षा नहीं है। इस चार प्रकार की परीक्षा से
सब कुछ सत्, असत्, भाव, अभाव जो कुछ ज्ञेय है, वह सब जाना जाता है।
सत् असत् की परीक्षा करके ही जाना गया है कि पुनर्भव होता है ॥ २६-२७ ॥
तत्राऽऽप्तागमस्तावद्वेदः, यश्चान्योऽपि कश्चिद्वेदादर्थादविपरीततः परी-
क्षकैः प्रणीतः शिष्टानुमतो लोकानुग्रह-प्रवृत्तः शास्त्र-वादः स चाऽऽप्तागमः ।
आप्तागमादुपलभ्यते-दान-तपो-यज्ञ-सत्याहिंसा-ब्रह्मचर्याण्यभ्युदय-निः-
श्रेयस-कराणीति । न चानिवृत्त-सत्त्व-दोषाणामदोषैर पुनर्भवो धर्मद्वारेषू-
पदिश्यते । धर्मद्वारावहितैश्च व्यपगत-भय-राग-द्वेष-लोभ-मोह-मानैर्ब्रह्म-
परैराप्तैः कर्मविद्भिरनुपहत-सत्त्व-बुद्धि-प्रचारैः पूर्वैः पूर्वतरैर्महर्षिभिर्दिव्य-
चक्षुभिर्दृष्टोपदिष्टः पुनर्भव इति व्यवस्येदेवम् ॥ २८ ॥
आप्त पुरुषों का आगम वेद ( ऋग्, यजुः, साम और अथर्व ) हैं।
वेदों के सिवाय और भी कोई अन्य जो कि वेद के अर्थ के अनुकूल, परीक्ष-
से बनाया हुआ शिष्ट पुरुषों से अनुमत, जनसमाज के कल्याण के लिये प्रवृ-