सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६२- चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका निरूपण तथा कर्मविपाकका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६८९
(अब क्षत्रियोंके धर्म बतलाता हूँ-) क्षत्रियोंको
सदा यत्नपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन, नारायणकी
अर्चा, राज्योंका पालन, युद्धमें निर्भीकता, ब्राह्मणोंको
नित्य दान, शरणागतकी रक्षा, प्रजाओं और
दुःखियोंका पुत्रवत् पालन, शस्त्रास्त्रकी निपुणता,
रणमें पराक्रम, तपस्या और धर्मकार्य करना
चाहिये। जो सदसद्विवेकवाली बुद्धिसे युक्त तथा
नीति-शास्त्रका ज्ञाता हो, उसका सदा पालन
करना चाहिये और सत्पुरुषोंसे भरी हुई सभामें
उसे नित्य नियुक्त करना चाहिये। प्रतापी एवं
यशस्वी क्षत्रिय हाथी, घोड़े, रथ और पैदल
सैनिकोंसे युक्त चतुरङ्गिणी सेनाका नित्य यत्नपूर्वक
पालन करता है। युद्धके लिये बुलाये जानेपर वह
युद्ध-दानसे विमुख नहीं होता; क्योंकि जो क्षत्रिय
युद्धमें प्राण-विसर्जन करता है, उसे यशस्कर
स्वर्गकी प्राप्ति होती है*।
वैश्योंका धर्म व्यापार, खेती करना, ब्राह्मणों
और देवताओंका पूजन, दान, तपस्या और व्रतका
पालन है। नित्य ब्राह्मणोंकी पूजा करना शूद्रका
धर्म कहा गया है। ब्राह्मणको कष्ट देनेवाला तथा
उसके धनपर अधिकार कर लेनेवाला शूद्र
चाण्डालताको प्राप्त हो जाता है। विप्रके धनका
अपहरण करनेवाला शूद्र असंख्य जन्मोंतक गीध,
सौ जन्मोंतक सूअर और फिर सौ जन्मोंतक
हिंसक पशुओंकी योनिमें जन्म लेता है। जो शूद्र
ब्राह्मणी तथा अपनी माताके साथ व्यभिचार
करता है; वह पापी जबतक सौ ब्रह्मा नहीं बीत
जाते, तबतक कुम्भीपाकमें कष्ट भोगता है। वहाँ
वह खौलते हुए तैलमें डुबाया जाता है, रात-दिन
उसे साँप काटते रहते हैं; इस प्रकार यम-यातनासे
दुःखी होकर वह चीत्कार करता रहता है।
तत्पश्चात् वह पापी सात जन्मोंतक चाण्डाल-
योनिमें, सात जन्मोंतक सर्प-योनिमें और सात
जन्मोंतक जल-जन्तुओंकी योनिमें उत्पन्न होता
है। फिर वह असंख्य जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा
तथा सात जन्मोंतक कुलटा स्त्रियोंकी योनिका
कीट होता है। पुनः वह पापी सात जन्मोंतक
गौओंके घावका कीड़ा होता है। इस प्रकार उसे
अनेक योनिमें भ्रमण करते ही बीतता है; परंतु
मनुष्यकी योनि नहीं मिलती।
अब संन्यासियोंका जो धर्म है, वह मेरे
मुखसे श्रवण करो। मनुष्य दण्ड-ग्रहणमात्रसे
नारायणस्वरूप हो जाता है। जो संन्यासी मेरा
ध्यान करता है; वह अपने पूर्वकर्मोंको जलाकर
वर्तमान-जन्मके कर्मोंका उच्छेद कर डालता है
और अन्तमें उसे मेरे लोककी प्राप्ति होती है।
व्रजराज ! जैसे वैष्णवके चरणस्पर्शसे तीर्थ तत्काल
पवित्र हो जाते हैं; वैसे ही संन्यासीके पादस्पर्शसे
पृथ्वी तुरंत पावन हो जाती है। मनुष्य संन्यासीका
स्पर्श करनेसे पापरहित हो जाता है। संन्यासीको
भोजन कराकर अश्वमेधयज्ञका फल तथा अकस्मात्
संन्यासीको देखकर उसे नमस्कार करके राजसूय-
यज्ञका फल पाता है। संन्यासी, यति और
ब्रह्मचारी-इन सबके दर्शन-स्पर्शका फल एक-
सा होता है।
संन्यासीको चाहिये कि वह भूखसे व्याकुल
होनेपर सायंकाल गृहस्थोंके घर जाय और वहाँ
गृहस्थ उसे सदन्न अथवा कदन्न जो कुछ भी दे;
उसका परित्याग न करे। न तो मिष्टान्नकी
याचना करे, न क्रोध करे और न धन ग्रहण करे।
एक वस्त्र धारण करे, इच्छारहित हो जाय,
जाड़ा-गरमीमें एक-सा रहे और लोभ-मोहका
परित्याग कर दे। इस प्रकार वहाँ एक रात
ठहरकर प्रातःकाल दूसरे स्थानको चला जाय।
*हस्त्यरथपदातं सेनाङ्गं च चतुष्टयम्। पालयेद् यत्नतो नित्यं यशस्वी च प्रतापवान् ॥
रणे निमन्त्रितश्चैव दाने न विमुखो भवेत्। रणे यो वा त्यजेत् प्राणांस्तस्य स्वर्गो यशस्करः ॥
(८३।७१-७२)

६९०
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जो संन्यासी सवारीपर चढ़ता है, गृहस्थका धन
ग्रहण करता है और घर बनाकर स्वयं गृहस्थ
हो जाता है; वह अपने रमणीय धर्मसे पतित
हो जाता है। जो संन्यासी खेती और व्यापार
करके कुकर्म करता है, उसका आचरण भ्रष्ट
हो जाता है और वह अपने धर्मसे गिर जाता
है। यदि वह स्वधर्मी अपना शुभ अथवा अशुभ
कर्म करता है तो धर्म-बहिष्कृत अथवा उपहासका
पात्र होता है।
जो ब्राह्मणी विधवा हो जाय- उसे सदा
कामनारहित, दिनके अन्तमें एक बार भोजन
करनेवाली और सदा हविष्यान्नपरायण होना
चाहिये। उसे दिव्य माङ्गलिक वस्त्र नहीं धारण
करना चाहिये; बल्कि सुगन्धित द्रव्य, सुवासित
तेल, माला, चन्दन और चूड़ी-सिन्दूर-आभूषणका
त्याग करके मलिन वस्त्र पहनना चाहिये। नित्य
नारायणका स्मरण तथा नित्य नारायणकी सेवा
करनी चाहिये। वह अनन्यभक्तिपूर्वक नारायणके
नामोंका कीर्तन करती है और सदा धर्मानुसार
पर-पुरुषको पुत्रके समान देखती है। ब्रजेश्वर !
वह न तो मिष्टान्नका भोजन करती है और न
भोग-विलासकी वस्तुओंका संग्रह करती है। उसे
पवित्र रहकर एकादशी, कृष्ण-जन्माष्टमी,
श्रीरामनवमी, शिवरात्रि, भाद्रपदमासके कृष्णपक्षकी
चतुर्दशी, नरक-चतुर्दशी तथा चन्द्रमा और सूर्यके
ग्रहणके समय भोजन नहीं करना चाहिये। वह
भ्रष्ट पदार्थोंका परित्याग करके उसके अतिरिक्त
उत्तम पदार्थोंको खाती है। श्रुतियोंमें सुना गया है
कि विधवा स्त्री, यति, ब्रह्मचारी और संन्यासियोंके
लिये पान मदिराके समान है। इन सभी लोगोंको
रक्तवर्णका शाक, मसूर, जँभीरी नीबू, पान और
गोल लौकीका परित्याग कर देना चाहिये।
विधवा नारी पलङ्गपर सोनेसे पतिको (स्वर्गसे)
नीचे गिरा देती है और सवारीपर चढ़कर वह
स्वयं नरकगामिनी होती है। उसे बाल और शरीरका
शृङ्गार नहीं करना चाहिये। जटारूपमें परिवर्तित
हुई केश-वेणीको तीर्थमें गये बिना कटाना नहीं
चाहिये और न शरीरमें तेल लगाना चाहिये। वह
दर्पण, पर-पुरुषका मुख, यात्रा, नृत्य, महोत्सव,
नाच-गान और सुन्दर वेषधारी रूपवान् पुरुषको
नहीं देखती। उसे सामवेदमें निरूपण किये गये
सत्पुरुषोंका धर्म श्रवण करना चाहिये।
अब मैं आपसे परमोत्कृष्ट परमार्थका वर्णन
करता हूँ, सुनो। सदा अध्यापन, अध्ययन,
शिष्योंका परिपालन, गुरुजनोंकी सेवा, नित्य
देवता और ब्राह्मणका पूजन, सिद्धान्तशास्त्रमें
निपुणताका उत्पादन, अपने-आपमें संतोष, सर्वथा
शुद्ध व्याख्यान, निरन्तर ग्रन्थका अभ्यास, व्यवस्थाके
सुधारके लिये वेदसम्मत विचार, स्वयं शास्त्रानुसार
आचरण, देवकार्य और नित्यकर्मोंमें निपुणता,
वेदानुसार अभीष्ट आचार-व्यवहार, वेदोक्त पदार्थोंका
भोजन और पवित्र आचरण करना चाहिये।
ब्रजेश्वर ! अब पतिव्रताओंका जो धर्म है,
उसे श्रवण करो। पतिव्रताको चाहिये कि नित्य
पतिके प्रति उत्सुकता रखकर उनका चरणोदक
पान करे; सदा भक्तिभावपूर्वक उनकी आज्ञा
लेकर भोजन करे। प्रयत्नपूर्वक व्रत, तपस्या और
देवार्चनका परित्याग करके चरण-सेवा, स्तुति
और सब प्रकारसे पतिकी संतुष्टि करे। सतीको
पतिकी आज्ञाके बिना वैरभावसे कोई कर्म नहीं
करना चाहिये। सती अपने पतिको सदा नारायणसे
बढ़कर समझती है। ब्रजनाथ ! उत्तम व्रतपरायणा
सती पर-पुरुषके मुख, सुन्दर-वेषधारी सौन्दर्यशाली
पुरुष, यात्रा, महोत्सव, नाच, नाचनेवाले, गवैय्या
और पर-पुरुषकी क्रीड़ाकी ओर कभी दृष्टि नहीं
डालती। जो आहार पतियोंको प्रिय होता है, वही
सदा पतिव्रताओंको भी मान्य होता है। पतिव्रता
क्षणभर भी पतिसे वियुक्त नहीं होती। वह
पतिसे उत्तर-प्रत्युत्तर नहीं करती। ताड़ना मिलनेपर
भी उसका स्वभाव शुद्ध ही बना रहता है; वह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६११

क्रोधके वशीभूत नहीं होती। पतिव्रताको चाहिये कि पतिके भूखे होनेपर उसे भोजन कराये; भोजनके लिये उत्तम-उत्तम पदार्थ और पीनेके लिये शुद्ध जल दे; नींदसे माते हुए पतिको न जगावे और उसे काम करनेके लिये आज्ञा न दे। सतीको पतिके साथ पुत्रोंसे भी सौगुना अधिक प्रेम करना चाहिये; क्योंकि कुलाङ्गनाके लिये पति ही बन्धु, आश्रय, भरण-पोषण करनेवाला और देवता है। वह सुन्दरी अमृतके समान शुभकारक अपने पतिको देखकर बड़े यत्नसे भक्तिभावपूर्वक मुस्कराते हुए उसकी ओर निहारती है। सती नारी अपनी एक हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर देती है। पतिव्रताओंके पति समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; क्योंकि सतियोंके पातिव्रत्यके तेजसे उनका कर्मभोग समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वे कर्मरहित होकर अपनी पतिव्रता पत्नीके साथ श्रीहरिके भवनमें आनन्द प्राप्त करते हैं।

ब्रजेश ! पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी सतीके चरणोंमें निवास करते हैं। सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंका तेज सतियोंमें वर्तमान रहता है। तपस्वियोंकी सारी तपस्या तथा व्रतोपवाससे व्रतियोंको एवं दान देनेसे दाताओंको जो फल प्राप्त होता है; वह सारा-का-सारा सदा पतिव्रताओंमें विद्यमान रहता है। स्वयं नारायण, शम्भु, लोकोंके विधाता ब्रह्मा, सारे देवता और मुनि भी सदा पतिव्रताओंसे डरते रहते हैं। सतियोंकी चरण-धूलिके स्पर्शसे पृथ्वी तत्काल ही पावन हो जाती है। पतिव्रताको नमस्कार करके मनुष्य पापसे छूट जाता है। पतिव्रता अपने तेजसे क्षणभरमें ही त्रिलोकीको भस्मसात् कर डालनेमें समर्थ है; क्योंकि वह सदा महान् पुण्यसे सम्पन्न रहती है। सतियोंके पति और पुत्र साधु एवं निःशङ्क हो जाते हैं; क्योंकि उन्हें देवताओं तथा यमराजसे भी कुछ भय नहीं रह जाता। सौ जन्मोंतक पुण्य संग्रह करनेवाले पुण्यवानोंके घरमें पतिव्रता जन्म लेती है। पतिव्रताके पैदा होनेसे उसकी माता पावन हो जाती है तथा पिता जीवन्मुक्त हो जाते हैं।

सती स्त्री प्रातःकाल उठकर रात्रिमें पहने हुए वस्त्रको छोड़कर पतिको नमस्कार करके हर्षपूर्वक स्तवन करती है। तत्पश्चात् गृहकार्य सम्पन्न करके नहाकर धुली हुई साड़ी और कंचुकी धारण करती है। फिर श्वेत पुष्प लेकर भक्तिपूर्वक पतिका पूजन करती है। पवित्र निर्मल जलसे स्नान कराकर उसे धौत-वस्त्र देकर वह हर्षपूर्वक पतिका पादप्रक्षालन करती है। फिर आसनपर बिठाकर, ललाटमें चन्दनका तिलक लगाकर, सर्वाङ्गमें (इत्र आदिका) अनुलेप करके गलेमें माला पहनाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक अमृतोपम भोग-पदार्थोंद्वारा भक्तिभावसहित भलीभाँति पूजन और स्तवन करके हर्षके साथ पतिके चरणोंमें नमस्कार करती है। ‘ॐ नमः कान्ताय शान्ताय सर्वदेवाश्रयाय स्वाहा’—इसी मन्त्रसे पुष्प, चन्दन, पाद्य, अर्घ्य, धूप, दीप, वस्त्र, उत्तम नैवेद्य, शुद्ध सुगन्धित जल और सुवासित ताम्बूल समर्पित करके स्तोत्र-पाठ करना चाहिये। जो-जो कर्म किया जाय, सभीमें इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये।

ॐ चन्द्रशेखरस्वरूप प्रियतम पतिको नमस्कार है। आप शान्त, उदार और सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय हैं; आपको प्रणाम है। सतीके प्राणाधार एवं ब्रह्मस्वरूप आपको अभिवादन है। आप नमस्कारके योग्य, पूजनीय, हृदयके आधार, पञ्च प्राणोंके अधिदेवता, आँखकी पुतली, ज्ञानाधार और पत्नियोंके लिये परमानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। पति ही ब्रह्मा, पति ही विष्णु, पति ही महेश्वर और पति ही निर्गुणाधार ब्रह्मरूप हैं; आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। भगवन् ! मुझसे जानमें अथवा अनजानमें जो कुछ दोष घटित हुआ है; उसे क्षमा कर दीजिये। पत्नीबन्धो ! आप

६९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तो दयाके सागर हैं; अतः मुझ दासीका अपराध
स्तोत्रको सुनती है; उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो
जाते हैं। पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त हो जाता है,
निर्धनको धन मिल जाता है, रोगी रोगसे मुक्त हो
जाता है और बँधा हुआ बन्धनसे छूट जाता है।
ब्रजेश्वर ! पतिव्रता इसके द्वारा स्तवन करके
तीर्थस्नानका फल तथा सम्पूर्ण तपस्याओं और
व्रतोंका फल पाती है*। इस प्रकार स्तुति-
नमस्कार करके पतिकी आज्ञासे वह भोजन
करती है। व्रजराज ! इस प्रकार मैंने पतिव्रताके
धर्मका वर्णन कर दिया, अब गृहस्थोंका धर्म
सुनिये। (अध्याय ८३)
क्षमा कर दें। ब्रजेश्वर ! पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भमें
लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी और गङ्गाने इस महान्
पुण्यमय स्तोत्रका पाठ किया था। पूर्वकालमें
सावित्रीने भी नित्यशः इस स्तोत्रद्वारा ब्रह्माका
स्तवन किया था। कैलासपर पार्वतीने भक्तिपूर्वक
शंकरके लिये इस स्तोत्रका पाठ किया था।
प्राचीनकालमें मुनिपत्नियों तथा देवाङ्गनाओंने भी
इसके द्वारा स्तुति की थी। अतः सभी पतिव्रताओंके
लिये यह स्तोत्र शुभदायक है। जो पतिव्रता
अथवा अन्य पुरुष या नारी इस महान् पुण्यदायक
गृहस्थ, गृहस्थ-पत्नी, पुत्र और शिष्यके धर्मका वर्णन, नारियों और भक्तोंके
त्रिविध भेद, ब्रह्माण्ड-रचनाके वर्णन-प्रसङ्गमें राधाकी उत्पत्तिका कथन
श्रीभगवान् कहते हैं- नन्दजी ! गृहस्थ
पुरुष सदा ब्राह्मणों और देवताओंका पूजन करता
है तथा चारों वर्णोंके धर्मानुसार अपने वर्ण-धर्मके
पालनमें तत्पर रहता है। इसीलिये देवता आदि
सभी प्राणी गृहस्थोंकी आशा करते हैं। गृहस्थ
अतिथिका आदर-सत्कार करके सदा पवित्र बना
रहता है। (पिण्डदान आदि) कर्मके अवसरपर
पितर और अतिथि-पूजनके समय सारे देवता
उसी प्रकार गृहस्थके पास आते हैं, जैसे गौएँ
पानीसे भरे हुए हौजके पास जाती हैं। भूखा
अतिथि सायंकाल प्रयत्नपूर्वक गृहस्थके घर आता
है और वहाँ आदर-सत्कार पाकर उसे आशीर्वाद
देनेके पश्चात् उस गृहस्थके घरसे विदा होता है।
अतिथिका पूजन न करनेसे गृहस्थ पापका भागी
होता है और उसे त्रिलोकीमें उत्पन्न सारे पाप
भोगने पड़ते हैं; इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
अतिथि जिसके घरसे निराश होकर लौट जाता
है, उसके घरका उसके पितर, देवता और अग्नयाँ
भी परित्याग कर देती हैं तथा वह अतिथि
उसे अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर

  • ॐ नमः कान्ताय भर्त्रे च शिरश्चन्द्रस्वरूपिणे ।
    नमः शान्ताय दान्ताय सर्वदेवाश्रयाय च। नमो ब्रह्मस्वरूपाय सतीप्राणपराय च॥
    नमस्याय च पूज्याय हृदाधाराय ते नमः।
    पञ्चप्राणाधिदेवाय चक्षुषस्तारकाय च। ज्ञानाधाराय पत्नीनां परमानन्दरूपिणे ॥
    पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः पतिरेव महेश्वरः । पतिश्च निर्गुणाधारो ब्रह्मरूपो नमोऽस्तु ते ॥
    क्षमस्व भगवन् दोषं ज्ञानाज्ञानकृतं च यत् । पत्नीबन्धो दयासिन्धो दासीदोषं क्षमस्व मे ॥
    इदं स्तोत्रं महापुण्यं सृष्ट्यादौ पद्माया कृतम् । सरस्वत्या च धरया गङ्गया च पुरा व्रज ॥
    सावित्र्या च कृतं पूर्वं ब्रह्मणे चापि नित्यशः । पार्वत्या च कृतं भक्त्या कैलासे शङ्कराय च ॥
    मुनीनां च सुराणां च पत्नीभिश्च कृतं पुरा । पतिव्रतानां सर्वासां स्तोत्रमेतच्छुभावहम् ॥
    इदं स्तोत्रं महापुण्यं या शृणोति पतिव्रता । नरोऽन्यो वापि नारी वा लभते सर्ववाञ्छितम् ॥
    अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो लभते धनम् । रोगी च मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥
    पतिव्रता च स्तुत्वा च तीर्थस्नानफलं लभेत् । फलं च सर्वतपसां व्रतानां च ब्रजेश्वर।
    (८३।१३६-१४६)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६९३
चला जाता है। इसलिये उत्तम विचारसम्पन्न धर्मज्ञ
गृहस्थ पहले देवता आदि सबकी सेवा करके
फिर आश्रितवर्गका भरण-पोषण करनेके पश्चात्
स्वयं भोजन करता है। जिसके घरमें माता नहीं
है और पत्नी पुंश्चली है, उसे वनवासी हो जाना
चाहिये; क्योंकि उसके लिये वह गृह वनसे भी
बढ़कर दुःखदायक है। वह दुष्टा सदा पतिसे द्वेष
करती है और उसे विष-तुल्य समझती है। वह
उसे भोजन तो देती नहीं; उलटे सदा डाँट-
फटकार सुनाती रहती है।
व्रजेश! अब गृहस्थ-पत्नियोंका जो सदाचार
श्रुतिमें वर्णित है, उसे श्रवण करो। गृहिणी नारी
पतिपरायणा तथा देव-ब्राह्मणकी पूजा करनेवाली
होती है। उस शुद्धाचारिणीको चाहिये कि प्रातःकाल
उठकर देवता और पतिको नमस्कार करके
आँगनमें गोबर और जलसे लीपकर मङ्गल-कार्य
सम्पन्न करे। फिर गृह-कार्य करके स्नान करे
और घरमें आकर देवता, ब्राह्मण और पतिको
नमस्कार करके गृहदेवताकी पूजा करे। इस प्रकार
सती नारी घरके सारे कार्योंसे निवृत्त होकर
पतिको भोजन कराती है और अतिथि-सेवा
करनेके पश्चात् स्वयं सुखपूर्वक भोजन करती है।
पुत्रोंको चाहिये कि वे पिताको स्नान कराकर
उनकी पूजा करें। यों ही शिष्योंको गुरुका पूजन
करना चाहिये। पुत्र और शिष्यको सेवककी
भाँति उनके आज्ञानुसार सारा कार्य करना उचित
है। पिता और गुरुमें कभी मनुष्य-बुद्धि नहीं
करनी चाहिये। पिता, माता, गुरु, भार्या, शिष्य,
स्वयं अपना निर्वाह करनेमें असमर्थ पुत्र, अनाथ
बहिन, कन्या और गुरु-पत्नीका नित्य भरण-
पोषण करना कर्तव्य है। तात! इस प्रकार मैंने
सबके उत्तम धर्मका वर्णन कर दिया।
व्रजेश! स्त्री-जाति तो वस्तुतः शुद्ध है।
उसमें वे सारी पतिव्रताएँ और भी पावन मानी
जाती हैं। सृष्टिके आदिमें ब्रह्माने एक ही प्रकारसे
सारी जातियोंकी रचना की थी। वे सभी उत्तम
बुद्धिवाली पवित्र नारियाँ प्रकृतिके अंशसे उत्पन्न
हुई थीं। जब केदार-कन्याके * शापसे वह धर्म
नष्ट हो गया, तब ब्रह्माने कुपित होकर पुनः स्त्री-
जातिका निर्माण किया और उसे तीन भागोंमें
विभक्त कर दिया। उनमें पहली उत्तमा, दूसरी
मध्यमा और तीसरी अधमा कही जाती है।
धर्मसम्पन्ना उत्तमा स्त्री पतिकी भक्त होती है।
वह प्राणोंपर आ बीतनेपर भी अपकीर्ति पैदा
करनेवाले जार पुरुषको नहीं स्वीकार करती। जो
गुरुजनोंद्वारा यत्नपूर्वक रक्षित होनेके कारण
भयवश जार पुरुषके पास नहीं जाती और अपने
पतिको कुछ-कुछ मानती है, वह कृत्रिमा नारी
मध्यमा कही जाती है। नन्दजी ! ऐसी नारियोंका
सतीत्व जहाँ स्थानाभाव है, समय नहीं मिलता है
और प्रार्थना करनेवाला जार पुरुष नहीं है; वहीं
स्थिर रह सकता है। अत्यन्त नीच कुलमें उत्पन्न
हुई अधमा स्त्री परम दुष्टा, अधर्मपरायणा, दुष्ट
स्वभाववाली, कटुवादिनी और झगड़ालू होती
है। वह सदा उपपतिकी सेवा करती है और
अपने पतिकी नित्य भर्त्सना करती रहती है, उसे
दुःख देती है और विष-तुल्य समझती है। उसका
पति भले ही भूतलपर रूपवान्, धर्मात्मा, प्रशंसनीय
और महापुरुष हो; परंतु वह उपाय करके
उपपतिद्वारा उसे मरवा डालती है। उसकी प्रीति
बिजलीकी चमक और जलपर खिंची हुई
रेखाके समान क्षणभङ्गुर होती है। वह सदा
अधर्ममें तत्पर रहकर निश्चित रूपसे कपटपूर्ण
वचन ही बोलती है। उसका मन न तो व्रत,
तपस्या, धर्म और गृहकार्यमें ही लगता है और
न गुरु तथा देवताओंकी ओर ही झुकता है।

  • केदार-कन्याका उपाख्यान इसी खण्डमें अन्यत्र देखना चाहिये।

६९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नन्दजी ! इस प्रकार तीन भेदोंवाली स्त्रीजातिकी
कथा मैंने कह दी, अब विभिन्न प्रकारके भक्तोंका
लक्षण सुनिये।
तृणकी शय्याका प्रेमी भक्त सांसारिक सुखोंके
कारणोंका त्याग करके अपने मनको मेरे नाम
और गुणके कीर्तनमें लगाता है। वह मेरे चरणकमलका
ध्यान करता है और भक्तिभावसहित उसका
पूजन करता है। देवगण उस निष्काम भक्तकी
अहैतुकी पूजाको ग्रहण करते हैं। ऐसे भक्त
अणिमा आदि सारी अभीष्ट सिद्धियोंकी तथा
सुखके कारणभूत ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा देवत्वकी
कामना नहीं करते। उन्हें हरिकी दासताके बिना
सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य आदि
चारों मुक्तियोंकी अभिलाषा नहीं रहती और न वे
निर्वाण-मुक्ति तथा अभीप्सित अमृत-पानकी ही
स्पृहा करते हैं। उन्हें मेरी अतुलनीय निश्चल
भक्तिकी ही लालसा रहती है। ब्रजेश्वर ! उन श्रेष्ठ
सिद्धेश्वरोंमें स्त्री-पुरुषका भेद नहीं रहता और न
समस्त जीवोंमें भिन्नता रहती है। वे दिगम्बर
होकर भूख-प्यास आदि तथा निद्रा, लोभ, मोह
आदि शत्रुओंका त्याग करके रात-दिन मेरे
ध्यानमें निमग्न रहते हैं। नन्दजी ! यह मेरे सर्वश्रेष्ठ
भक्तके लक्षण हैं। अब मध्यम आदि भक्तोंका
लक्षण श्रवण करो। पूर्वजन्मोंके शुभ कर्मके
प्रभावसे पवित्र हुआ गृहस्थ कर्मोंमें आसक्त न
होकर सदा पूर्वकर्मका उच्छेदक कर्म ही करता
है; वह यत्नपूर्वक कोई दूसरा कर्म नहीं करता;
क्योंकि उसे किसी कर्मकी कामना ही नहीं
रहती। वह मन, वाणी और कर्मसे सदा ऐसा
चिन्तन करता रहता है कि जो कुछ कर्म है, वह
सब श्रीकृष्णका है, मैं कर्मका कर्ता नहीं हूँ। ऐसा
भक्त मध्यम श्रेणीका होता है। जो उससे भी
नीची कोटिका है; वह श्रुतिमें प्राकृतिक अर्थात्
अधम कहा गया है। उत्तम कोटिका भक्त
अपने हजारों पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है।
उसे स्वप्नमें भी यमराज अथवा यमदूतका दर्शन
नहीं होता। मध्यम कोटिका भक्त अपनी सौ
पीढ़ियोंका तथा प्राकृत भक्त पचीस पीढ़ियोंका
उद्धारक होता है। तात ! इस प्रकार मैंने आपके
आज्ञानुसार तीन प्रकारके भक्तोंका वर्णन कर
दिया। अब सावधानतया ब्रह्माण्डकी रचनाका
आख्यान श्रवण कीजिये।
नन्दजी ! भक्तलोग यत्न करनेपर ब्रह्माण्ड-
रचनाका प्रयोजन जान लेते हैं। मुनियों, देवताओं
और संतोंको बड़े दुःखसे कुछ-कुछ ज्ञात होता
है। पूर्णरूपसे विश्वका ज्ञान तो अनन्तस्वरूप
मुझको, ब्रह्मा और महेश्वरको है। हमारे अतिरिक्त
धर्म, सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, कपिल,
गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, वेद, वेदमाता
सावित्री, स्वयं सर्वज्ञा राधिका-ये लोग भी
विश्व-रचनाका अभिप्राय जानते हैं, इनके अतिरिक्त
और किसीको पता नहीं है। उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न
सभी विद्वान् इसके वैषम्यार्थको पूर्णरूपसे जाननेमें
असमर्थ हैं। जैसे आकाश और आत्मा नित्य हैं;
उसी प्रकार दसों दिशाएँ नित्य हैं। जैसे प्रकृति
नित्य है, वैसे ही विश्वगोलक नित्य है। जैसे
गोलोक नित्य है, उसी तरह वैकुण्ठ भी नित्य है।
एक समयकी बात है। जब मैं गोलोकमें रास-
क्रीड़ा कर रहा था, उसी समय मेरे वामाङ्गसे
एक षोडशवर्षीया नारी प्रकट हुई। वह अत्यन्त
सुन्दरी बाला रमणियोंमें सर्वश्रेष्ठ थी। उसके
शरीरका रंग श्वेत चम्पकके समान गौर था।
उसकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमाको लज्जित
कर रही थी। वह रत्नाभरणोंसे भूषित थी और
उसके अङ्गपर अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ी
शोभा पा रही थी। उसके सभी अङ्ग मनोहर और
कोमल थे तथा उसका प्रसन्नमुख मन्द-मन्द
मुस्कानसे सुशोभित था। उसके चरणोंका अधोभाग
सुन्दर महावरसे उद्भासित हो रहा था। वह सुन्दर
नेत्रोंवाली सौन्दर्यशालिनी बाला गजेन्द्रकी-सी