तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
'ॐ' यह शब्द ब्रह्म है, क्योंकि 'ॐ' यह सर्वरूप है; 'ॐ'
यह अनुकृति ( अनुकरण—सम्मतिसूचक संकेत ) है—ऐसा प्रसिद्ध
है । [ याज्ञिकलोग ] “ओ श्रावय” ऐसा कहकर श्रवण कराते हैं । ‘ॐ’
ऐसा कहकर सामगान करते हैं।' ‘ॐ शोम् ऐसा कहकर शस्त्रों (गीति-
रहित ऋचाओं) का पाठ करते हैं। अध्वर्यु प्रतिगर (प्रत्येक कर्म) के
प्रति ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता है। 'ॐ' ऐसा कहकर ब्रह्मा अनुज्ञा
देता है; 'ॐ' ऐसा कहकर वह अग्निहोत्रके लिये आज्ञा देता है ।
वेदाध्ययन करनेवाला ब्राह्मण 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ कहता
है—'मैं ब्रह्म (वेद अथवा परब्रह्म) को प्राप्त करूँ।' इससे वह ब्रह्मको
ही प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥
ॐमिति । इतिशब्दः स्वरूप- | ‘ओमिति' इसमें 'इति' शब्द
ओङ्कारस्य परिच्छेदार्थः, ओ- | ओंकारके स्वरूपका परिच्छेद
सर्वात्म्यम् मित्येतच्छब्दरूपं | (निर्देश) करनेके लिये है। अर्थात्
ब्रह्मति मनसा धारयेदुपासीत । | 'ॐ' यह शब्दरूप ब्रह्म है—ऐसा
यत ओमितीदं सर्वं हि शब्दरूप- | इसका मनसे ध्यान—उपासना करे;
मोङ्कारेण व्याप्तम् । "तद्यथा | क्योंकि 'ॐ' यही सब कुछ है,
कारण, समस्त शब्दरूप प्रपञ्च
शङ्कुना" (छा० उ० २ । २३ । | ओंकारसे व्याप्त है, जैसा कि 'जिस
प्रकार शंकुसे पत्ते व्याप्त रहते हैं'
३) इति श्रुत्यन्तरात् । अभि- | इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे सिद्ध
धानतन्त्रं ह्यभिधेयमित्यत इदं | होता है । सम्पूर्ण वाच्य वाचकके
सर्वमोङ्कार इत्युच्यते । | ही अधीन होता है, इसलिये यह
सब ओंकार ही कहा जाता है ।
ओङ्कारस्तुत्यर्थमुत्तरो ग्रन्थः । | आगेका ग्रन्थ ओंकारकी स्तुतिके
उपास्यत्वात्तस्य । | लिये है; क्योंकि वह उपासनीय
ओङ्कारमहिमा ओमित्येतदनुकृति- | है । ‘ॐ' यह अनुकृति यानी
रनुकऱणम् । करोमि यास्यामि | अनुकरण है । इसीसे किसीके
द्वारा 'मैं करता हूँ, मैं जाता
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
चेति कृतमुक्तमोमित्यनुकरोत्य- | इस प्रकार किये हुए कथनको
सुनकर दूसरा पुरुष [उसको
न्यः । अत ओङ्कारोऽनुकृतिः । स्वीकृत करते हुए] 'ॐ' ऐसा
अनुकरण करता है । इसलिये
ह स्म वा इति प्रसिद्धार्थव- ओंकार अनुकृति है । 'ह' 'स्म' और
'वै'—ये निपात प्रसिद्धिके सूचक
द्योतकाः । प्रसिद्धमोङ्कारस्यानु- हैं; क्योंकि ओंकारका अनुकृतित्व तो
प्रसिद्ध ही है ।
कृतित्वम् ।
अपि च 'ओ श्रावय' इति | इसके सिवा 'ओ श्रावय' इस
प्रकार प्रेरणापूर्वक याज्ञिकलोग
प्रैषपूर्वकमाश्रावयन्ति । तथोमिति | प्रतिश्रवण कराते हैं । तथा 'ॐ'
ऐसा कहकर सामगान करनेवाले
सामानि गायन्ति सामगाः । सामका गान करते हैं । शस्त्र
शंसन करनेवाले भी 'ॐ शोम्'
ॐशोमिति शस्त्राणि शंसन्ति शस्त्र- ऐसा कहकर शस्त्रोंका पाठ करते
हैं । तथा अध्वर्युंलोग प्रतिगरके
शंसितारोऽपि । तथोमित्यध्वर्युः प्रति 'ॐ' ऐसा उच्चारण करते
प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति हैं । 'ॐ' ऐसा कहकर ब्रह्मा
अनुज्ञा देता है अर्थात् प्रेरणापूर्वक
ब्रह्मा प्रसौत्यनुजानाति प्रैषपूर्व- आश्रवण करता है; और 'ॐ'
कहकर वह अग्निहोत्रके लिये आज्ञा
कमाश्रावयति । ओमित्यग्नि- देता है । अर्थात् यजमानके यों
कहनेपर कि 'मैं हवन करता हूँ'
होत्रमनुजानाति । जुहोमीत्युक्त वह 'ॐ' ऐसा कहकर उसे
ओमित्येवानुज्ञां प्रयच्छति । अनुज्ञा देता है ।
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६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
ओमित्येव ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन् | प्रवचन अर्थात् अध्ययन करनेवाला
प्रवचनं करिष्यन्नध्येष्यमाण | ब्राह्मण ‘ॐ’ ऐसा उच्चारण करता
ओमित्येवाह । ओमित्येव प्रति- | है; अर्थात् ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही
पद्यतेऽध्येतुमित्यर्थः । ब्रह्मवेद- | वह अध्ययन करनेके लिये प्रवृत्त होता
मुपाप्नवानीति प्राप्नुयां ग्रही- | है । ‘मैं ब्रह्म यानी वेदको प्राप्त करूँ
ष्यामीत्युपाप्नोत्येव ब्रह्म । | अर्थात् उसे ग्रहण करूँ’ ऐसा कहकर
अथवा ब्रह्म परमात्मा तमु- | वह ब्रह्मको प्राप्त कर ही लेता है ।
पाप्नवानीत्यात्मानं प्रवक्ष्यन्प्राप- | अथवा [ यों समझो कि ] ‘मैं ब्रह्म-
यिष्यन्नोमित्येवाह । स च तेनो- | परमात्माको प्राप्त करूँ’ इस प्रकार
ङ्कारेण ब्रह्म प्राप्नोत्येव । ओङ्का- | आत्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे वह
रपूर्वं प्रवृत्तानां क्रियाणां फलवत्त्वं | ‘ॐ’ ऐसा ही कहता है और
यस्मात्तस्मादोङ्कारं ब्रह्मेत्युपासी- | उस ॐकारके द्वारा वह ब्रह्मको
तेति वाक्यार्थः ॥ १ ॥ | प्राप्त कर ही लेता है । इस प्रकार
| क्योंकि ॐकारपूर्वक प्रवृत्त होनेवाली
| क्रियाएँ फलवती होती हैं इसलिये
| ‘ॐकार ब्रह्म है’ इस तरह उसकी
| उपासना करे—यह इस वाक्यका
| अर्थ है ॥ १ ॥
इति शीक्षावल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥
नवम अनुवाक
ऋतादि शुभकर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका विधान
विज्ञानादेवाप्नोति स्वाराज्य- | विज्ञानसे ही स्वाराज्य प्राप्त कर
| लेता है-ऐसा [छठे अनुवाकमें] कहे
मित्युक्तत्वाच्छ्रौतस्मार्तानां कर्म- | जानेके कारण श्रौत और स्मार्त कर्मों-
| की व्यर्थता प्राप्त होती है । वह
णामानर्थक्यं प्राप्तमित्यतस्तन्मा | प्राप्त न हो, इसलिये पुरुषार्थके प्रति
प्रापदिति कर्मणां पुरुषार्थं प्रति | कर्मोंका साधनत्व प्रदर्शित करनेके
| लिये यहाँ उनका उल्लेख किया
साधनत्वप्रदर्शनार्थमिहोपन्यासः- | जाता है—
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्याय-
प्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्याय-
प्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्याय-
प्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च
स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च ।
प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च ।
प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा
राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः स्वाध्यायप्रवचने
एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥ १ ॥
ऋत (शास्त्रादिद्वारा बुद्धिमें निश्चय किया हुआ अर्थ) तथा
स्वाध्याय (शास्त्राध्ययन) और प्रवचन (अध्यापन अथवा वेदपाथरूप
ब्रह्मयज्ञ) [ये अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं] । सत्य (सत्यभाषण)
तथा स्वाध्याय और प्रवचन [अनुष्ठान किये जाने चाहिये] । दम
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६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
( इन्द्रियदमन ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें सदा करता रहे ] ।
शम ( मनोनिग्रह ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये सर्वदा कर्तव्य हैं ] ।
अग्नि ( अग्न्याधान ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका अनुष्ठान
करे ] । अग्निहोत्र तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये नित्य कर्तव्य हैं ] ।
अतिथि ( अतिथिसत्कार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियम-
से अनुष्ठान करे ] । मानुषकर्म ( विवाहादि लौकिक व्यवहार ) तथा
स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें करता रहे ] । प्रजा ( प्रजा उत्पन्न करना )
तथा स्वाध्याय और प्रवचन [-ये सदा ही कर्तव्य हैं ] । प्रजन ( ऋतु-
कालमें भार्यागमन ) तथा [ इसके साथ ] स्वाध्याय और प्रवचन
[ करता रहे ] । प्रजाति ( पौत्रोत्पत्ति ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन
[ इनका नियतरूपसे अनुष्ठान करे ] । सत्य ही [ अनुष्ठान करने योग्य
है ] ऐसा रथीतरका पुत्र सत्यवचा मानता है । तप ही [ नित्य अनुष्ठान
करने योग्य है ] ऐसा नित्य तपोनिष्ठ पौरुशिष्ठिका मत है । स्वाध्याय
और प्रवचन ही [ कर्त्तव्य हैं ] ऐसा मुद्गलके पुत्र नाकका मत है ।
अतः वे ( स्वाध्याय और प्रवचन ) ही तप हैं, वे ही तप हैं ॥ १ ॥
| [मूल भाष्य] | [हिन्दी अनुवाद] |
|---|---|
| ऋतमिति व्याख्यातम् । स्वा-<br>ध्यायोऽध्ययनम् । प्रवचनमध्या-<br>पनं ब्रह्मयज्ञो वा । एतान्यता-<br>दीन्यनुष्ठेयानीति वाक्यशेषः ।<br>सत्यं च सत्यवचनं यथाव्या-<br>ख्यातार्थं वा । तपः कृच्छ्रादि ।<br>दमो बाह्यकरणोपशमः । शमो-<br>ऽन्तःकरणोपशमः । अग्नय आधा- | 'ऋत'—इसकी व्याख्या पहले<br>[ ऋतं वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] की<br>जा चुकी है । 'स्वाध्याय' अध्ययनको<br>कहते हैं, तथा 'प्रवचन' अध्यापन<br>या ब्रह्मयज्ञका नाम है । ये ऋत<br>आदि अनुष्ठान किये जाने योग्य<br>हैं—यह वाक्यशेष है । सत्य—सत्य-<br>वचन अथवा जैसा पहले [ सत्यं<br>वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] व्याख्या<br>की गयी है, वह; तप—कृच्छ्रादि; दम—<br>बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह; शम—चित्त-<br>**की शान्ति; |
अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
तव्याः । अग्निहोत्रं च होतव्यम् । | हैं ] । अग्नियोंका आधान करना
अतिथयश्च पूज्याः । मानुषमिति | चाहिये। अग्निहोत्र होम करने योग्य
लौकिकः संव्यवहारः, तच्च | है । अतिथियोंका पूजन करना
चाहिये । मानुष यानी लौकिक
यथाप्राप्तमनुष्ठेयम् । प्रजा चोत्पा- | व्यवहार; उसका भी यथाप्राप्त
द्या । प्रजननश्च प्रजननमृतौ | अनुष्ठान करना चाहिये । प्रजा
उत्पन्न करनी चाहिये । प्रजन-
भार्यागमनमित्यर्थः । प्रजातिः | प्रजनन-ऋतुकालमें भार्यागमन और
पौत्रोत्पत्तिः पुत्रो निवेशयितव्य | प्रजाति-पौत्रोत्पत्ति अर्थात् पुत्रको
इत्येतत् । | स्त्रीपरिग्रह कराना चाहिये ।
सर्वैरेतैः कर्मभिर्युक्तस्यापि | इन सब कर्मोंसे युक्त पुरुषको
[स्वाध्यायप्रवचन-सहयोगकारणम्] स्वाध्यायप्रवचने | भी स्वाध्याय और प्रवचनका यत्न-
यत्ततोऽनुष्ठेये इत्येव- | पूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये-इसी-
मर्धं सर्वेण सह स्वाध्यायप्रवचन- | लिये इन सबके साथ स्वाध्याय और
प्रवचनको ग्रहण किया गया है ।
ग्रहणम् । स्वाध्यायाधीनं ह्यर्थ- | स्वाध्यायके अधीन ही अर्थज्ञान है
ज्ञानम्, अर्थज्ञानायत्तं च परं | और अर्थज्ञानके अधीन ही परमश्रेय
श्रेयः; प्रवचनं च तदविस्मरणार्थं | है, तथा प्रवचन उसकी अविस्मृति
और धर्मकी वृद्धिके लिये है; इसलिये
धर्मप्रवृद्ध्यर्थं च । अतः स्वाध्या- | स्वाध्याय और प्रवचनमें आदर
यप्रवचनयोरादरः कार्यः । | ( श्रद्धा ) रखना चाहिये ।
सत्यमिति सत्यमेवानुष्ठातव्य- | सत्य अर्थात् सत्य ही अनुष्ठान
[सत्यादिप्राधान्ये मुनीनां मतभेदाः] मिति सत्यमेव | किये जाने योग्य है-ऐसा सत्यवचा
वचो यस्य सोऽयं | -सत्य ही जिसका वचन हो वह
अथवा जिसका नाम ही सत्यवचा है
सत्यवचा नाम वा तस्य । राथी- | वह राथीतर अर्थात् रथीतरके वंशमें
तरो रथीतरस्य गोत्रो राथीतरा- | उत्पन्न हुआ राथीतर आचार्य मानता
चार्यो मन्यते । तप इति तप एव | है । तप यानी तप ही कर्त्तव्य है-
६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
कर्तव्यमिति तपोन्नित्यस्तपसि । ऐसा तपोन्नित्य-नित्य तपोनिष्ठ
नित्यस्तपःपरस्तपोनित्य इति वा अथवा तपोन्नित्य नामवाला पौरुशिष्टि
नाम पौरुशिष्टिः पुरुशिष्टस्या- -पुरुशिष्टका पुत्र पौरुशिष्टि आचार्य
पत्यं पौरुशिष्टिराचार्यो मन्यते । मानता है । स्वाध्याय और प्रवचन
स्वाध्यायप्रवचने एवानुष्ठेये इति ही अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं-
नाको नामतो मुद्गलस्यापत्यं ऐसा नाक नामवाला मुद्गलका
मौद्गल्य आचार्यो मन्यते । तद्धि पुत्र मौद्गल्य आचार्य मानता है ।
तपस्तद्धि तपः । हि यस्मात्स्वा- वही तप है, वही तप है ।
ध्यायप्रवचने एव तपस्तस्मात्ते इसका तात्पर्य यह है-क्योंकि
एवानुष्ठेये इति । उक्तानामपि स्वाध्याय और प्रवचन ही तप हैं,
सत्यतपःस्वाध्यायप्रवचनानां पु- इसलिये वे ही अनुष्ठान किये जाने
नर्ग्रहणमादरार्थम् ॥ १ ॥ योग्य हैं । पहले कहे हुए भी सत्य,
तप, स्वाध्याय और प्रवचनोंका
पुनर्ग्रहण उनके आदरके लिये है ॥१॥
इति शीक्षावल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥
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| मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के
दशम अनुवाक
त्रिशङ्कुका वेदानुवचन
अहं वृक्षस्य रेरिवेति स्वाध्या- | ‘अहं वृक्षस्य रेरिवा’ आदि
| मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के
यार्थो मन्त्राम्नायः । स्वाध्यायश्च | लिये है । तथा स्वाध्याय विद्या
| ( ज्ञान ) की उत्पत्तिके लिये बतलाया
विद्योत्पत्तये । प्रकरणात् । | गया है; यह प्रकरणसे ज्ञात होता
| है; क्योंकि यह प्रकरण विद्याके
विद्यार्थं हीदं प्रकरणम् । न | लिये ही है, इसके सिवा उसका
| कोई और प्रयोजन नहीं जान पड़ता;
चान्यार्थत्वमवगम्यते । स्वाध्या- | क्योंकि स्वाध्यायके द्वारा जिसका
| चित्त शुद्ध हो गया है उसीको
येन च विशुद्धसत्त्वस्य विद्योत्प- | विद्याकी उत्पत्ति होना सम्भव है ।
त्तिरवकल्प्यते । |
अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्व-
पवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणꣳसवर्चसम् ।
सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ १ ॥
मैं [ अन्तर्यामीरूपसे उच्छेदस्वरूप संसार- ] वृक्षका प्रेरक हूँ । मेरी
कीर्ति पर्वतशिखरके समान उच्च है । ऊर्ध्वपवित्र ( परमात्मारूप कारण-
वाला ) हूँ । अन्नवान् सूर्यमें जिस प्रकार अमृत है उसी प्रकार मैं भी
शुद्ध अमृतमय हूँ । मैं प्रकाशमान [ आत्मतत्त्वरूप ] धन, सुमेधा
( सुन्दर मेधावाला ) और अमरणधर्मा तथा अक्षित ( अव्यय ) हूँ,
अथवा अमृतसे सिक्त ( भीगा हुआ ) हूँ—यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन
है ॥ १ ॥
तै० उ० ९—१०—
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६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
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अहं वृक्षस्योच्छेदात्मकस्य | मैं अन्तर्यामीरूपसे वृक्ष अर्थात्
संसारवृक्षस्य रेरिवा प्रेरयिता- | उच्छेदात्मक संसाररूप वृक्षका प्रेरक
ऽन्तर्याम्यात्मना । कीर्तिः ख्या- | हूँ । मेरी कीर्ति-प्रसिद्धि पर्वतके
तिर्गिरेः पृष्ठमिवोच्छ्रिता मम । | पृष्ठभागके समान ऊँची है । मैं ऊर्ध्व-
ऊर्ध्वपवित्र ऊर्ध्वं कारणं पवित्रं | पवित्र हूँ—पवित्र—पावन अर्थात्
पावनं ज्ञानप्रकाश्यं पवित्रं परं | ज्ञानसे प्रकाशित होने योग्य पवित्र
ब्रह्म यस्य सर्वात्मनो मम सो- | परब्रह्म जिस मुझ सर्वात्माका
ऽहमूर्ध्वपवित्रः । वाजिनीव वाज- | ऊर्ध्व यानी कारण है वह
वतीव । वाजमन्नं तद्वति सवित- | मैं ऊर्ध्वपवित्र हूँ । 'वाजिनि
रीत्यर्थः । यथा सवितर्यमृतमा- | इव'—वाजवान्के समान--वाज अर्थात्
त्मतत्त्वं विशुद्धं प्रसिद्धं श्रुति- | अन्न उससे युक्त सूर्यके समान,
स्मृतिशतेभ्य एवं स्वमृतं शोभनं | जिस प्रकार सैकड़ों श्रुति-स्मृतियों-
विशुद्धमात्मतत्त्वमस्मि भवामि । | के अनुसार सूर्यमें विशुद्ध
द्रविणं धनं सवर्चसं दीप्ति- | अमृत यानी आत्मतत्त्व प्रसिद्ध है
मत्तदेवात्मतत्त्वमस्मीत्यनुवर्तते । | उसी प्रकार मैं भी सु अमृत अर्थात्
ब्रह्मज्ञानं वात्मतत्त्वप्रकाश- | शोभन-विशुद्ध आत्मतत्त्व हूँ ।
कत्वात्सवर्चसम् । द्रविणमिव | वही मैं आत्मतत्त्व सवर्चस—
द्रविणं मोक्षसुखहेतुत्वात् । | दीप्तिशाली द्रविण यानी धन हूँ—इस
अस्मिन्पक्षे प्राप्तं मयेत्यध्याहारः | प्रकार यहाँ 'अस्मि (हूँ)' क्रिया-
कर्तव्यः । | की अनुवृत्ति की जाती है । अथवा
| आत्मतत्त्वका प्रकाशक होनेसे तेजस्वी
| ब्रह्मज्ञान, जो मोक्षसुखका हेतु होने-
| के कारण धनके समान धन है,
| [ मुझे प्राप्त हो गया है ]—इस
| पक्षमें [ 'अस्मि' क्रियाकी अनुवृत्ति
| न करके ] 'मया प्राप्तम्' ( वह
| मुझे प्राप्त हो गया है ) इसका
| अध्याहार करना चाहिये ।
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
| [शाङ्करभाष्यम्] | [भाष्यार्थ] |
|---|---|
| सुमेधाः शोभना मेधा सर्व-<br>ज्ञलक्षणा यस्य मम सोऽहं<br>सुमेधाः । संसारस्थित्युत्पत्त्युप-<br>संहारकौशल्योगात्सुमेधस्त्वम् ।<br>अत एवामृतोऽमरणधर्माक्षितो-<br>ऽक्षीणोऽव्ययः, अक्षतो वा; अमृतेन<br>वोक्षितः सिक्तः । “अमृतोक्षितो-<br>ऽहम्” इत्यादि ब्राह्मणम् ।<br><br>इत्येवं त्रिशङ्कोऋर्षेर्ब्रह्मभूतस्य<br>ब्रह्मविदो वेदानुवचनम्; वेदो<br>वेदनमात्मैकत्वविज्ञानं तस्य<br>प्राप्तिमनु वचनं वेदानुवचनम् ।<br>आत्मनः कृतकृत्यताख्यापनार्थं<br>वामदेववत्त्रिशङ्कुनार्षेण दर्शनेन<br>दृष्टो मन्त्राम्नाय आत्मविद्या-<br>प्रकाशक इत्यर्थः ।<br><br>अस्य च जपो विद्योत्पत्त्य-<br>र्थोऽवगम्यते । ऋतं चेत्यादि- | सुमेधा—जिस मेरी मेधा शोभन अर्थात् सर्वज्ञत्वलक्षणवाली है वह मैं सुमेधा हूँ । संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और संहार—इसका कौशल होनेके कारण मेरा सुमेधस्त्व है । इसीसे मैं अमृत—अमरणधर्मा और अक्षित—अक्षीण यानी अव्यय अथवा अक्षय हूँ । अथवा, [ तृतीयातत्पुरुष समास माननेपर ] अमृतेन उक्षितः अमृतसे सिक्त हूँ । “ मैं अमृतसे उक्षित हूँ” ऐसा ब्राह्मणवाक्य भी है ।<br><br>इस प्रकार यह ब्रह्मभूत ब्रह्मवेत्ता त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है । वेद वेदन अर्थात् आत्मैकत्वविज्ञानको कहते हैं उसकी प्राप्तिके अनु—पीछेका वचन ‘वेदानुवचन’ कहलाता है । तात्पर्य यह है कि अपनी कृतकृत्यता प्रकट करनेके लिये वामदेवके समान * त्रिशङ्कु ऋषिद्वारा आर्षदृष्टिसे देखा हुआ यह मन्त्राम्नाय आत्मविद्याका प्रकाश करनेवाला है ।<br><br>इसका जप विद्याकी उत्पत्तिके लिये माना जाता है । इस ‘ऋतं |
* देखिये ऐतरेयोपनिषद् २ । १ । ५
६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
कर्मोपन्यासादनन्तरं च वेदानु- | च' इत्यादि अनुवाकमें धर्मका
वचनपाठादेतदवगम्यत एवं | उपन्यास ( उल्लेख ) करनेके
| अनन्तर वेदानुवचनका पाठ करनेसे
श्रौतस्मार्तेषु नित्येषु कर्मसु | यह जाना जाता है कि इस प्रकार
युक्तस्य निष्कामस्य परं ब्रह्म | श्रौत और स्मार्त नित्यकर्मोंमें लगे
विविदिषोराणानि दर्शनानि प्रा- | हुए परब्रह्मके निष्काम जिज्ञासुके प्रति
| आत्मा आदिसे सम्बन्धित आर्षदर्शनों-
दुर्भवन्त्यात्मादिविषयाणीति॥१॥ | का प्रादुर्भाव हुआ करता है ॥ १ ॥
इति शीक्षावल्ल्यां दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥
एकादश अनुवाक
वेदाध्ययनके अनन्तर शिष्यको आचार्यका उपदेश
वेदमनूच्येत्येवमादिकर्तव्य- | ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानसे पूर्व श्रौत
प्राग्ब्रह्मविज्ञानात् कर्मविधिः | तोपदेशारम्भः प्रा- | और स्मार्तकर्मोंका नियमसे अनुष्ठान
| ग्ब्रह्मविज्ञानान्निय- | करना चाहिये— इसीलिये ‘वेदम-
मेन कर्तव्यानि श्रौतस्मार्त- | नूच्य’ इत्यादि श्रुतिसे उनकी
| कर्तव्यताके उपदेशका आरम्भ किया
कर्माणीत्येवमर्थः। अनुशासनश्रुतेः | जाता है; क्योंकि [ ‘अनुशास्ति’
पुरुषसंस्कारार्थत्वात् । संस्कृतस्य | ऐसी ] जो अनुशासन-श्रुति है वह
| पुरुषके संस्कारके लिये है; क्योंकि जो
हि विशुद्धसत्त्वस्यात्मज्ञानमञ्ज- | पुरुष संस्कारयुक्त और विशुद्धचित्त
सैवोत्पद्यते । “तपसा कल्मषं | होता है उसे अनायास ही आत्मज्ञान
हन्ति विद्ययामृतमश्नुते” ( मनु० | प्राप्त हो जाता है । इस सम्बन्धमें
| “तपसे पापका नाश करता है और
१२ ! १०४ ) इति स्मृतिः । | ज्ञानसे अमरत्व लाभ करता है” ऐसी
वक्ष्यति च-“तपसा ब्रह्म विजि- | स्मृति है । आगे ऐसा कहेंगे भी कि
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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९
ज्ञासस्व" (तै० उ० ३ । २ । ५) | “तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर”
इति । अतो विद्योत्पत्त्यर्थमनुष्ठे- | अतः ज्ञानकी उत्पत्तिके लिये कर्म
यानि कर्माणि । अनुशास्तीत्यनु- | करने चाहिये । ‘अनुशास्ति’ इसमें
शासनशब्दादनुशासनातिक्रमे हि | ‘अनुशासन’–ऐसा शब्द होनेके
दोषोत्पत्तिः । | कारण उस अनुशासनका अति-
| क्रमण करनेपर दोषकी उत्पत्ति
| होगी ।
प्रागुपन्यासाच्च कर्मणाम् । | कर्मोंका उपन्यास पहले किया
केवलब्रह्मविद्यारम्भाच्च पूर्वं | जानेके कारण भी [ यह निश्चय
कर्माण्युपन्यस्तानि । उदितायां | होता है कि ये कर्म विद्याकी उत्पत्ति-
च ब्रह्मविद्यायाम् “अभयं प्रतिष्ठां | के लिये हैं ] । कर्मोंका उपन्यास
विन्दते” (तै० उ० २ । ७ । १) | केवल ब्रह्मविद्याका निरूपण
“न बिभेति कुतश्चन” (तै० उ० | आरम्भ करनेसे पूर्व ही किया
२।९।१) “किमहं साधु नाक- | गया है । ब्रह्मविद्याका उदय
रवम्” (तै० उ० २ । ९ । १) | होनेपर तो “अभय प्रतिष्ठाको प्राप्त
इत्येवमादिना कर्मनैष्किञ्चन्यं | कर लेता है” “किसीसे भी भय
दर्शयिष्यति; इत्यतोऽवगम्यते | नहीं मानता” “मैंने कौन-सा शुभ
पूर्वोपचितदुरितक्षयद्वारेण | कर्म नहीं किया” इत्यादि वाक्योंद्वारा
विद्योत्पत्त्यर्थानि कर्माणीति । | कर्मोंकी निष्किञ्चनता ही दिखलायेंगे ।
मन्त्रवर्णाच्च—“अविद्यया मृत्युं | इससे विदित होता है कि कर्म पूर्व-
तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते” | सञ्चित पापोंके क्षयके द्वारा ज्ञानकी
(ई० उ० ११) इति । ऋता- | प्राप्तिके ही लिये हैं । “अविद्या
| ( कर्म ) से मृत्यु ( अधर्म ) को
| पार करके विद्या ( उपासना ) से
| अमरत्व लाभ करता है” इस मन्त्र-
| वर्णसे भी यही बात प्रमाणित होती
| है । अतः पहले ( नवम अनुवाकमें )
७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
दीनां पूर्वत्रोपदेश आनर्थक्य- | जो ऋतादिका उपदेश किया है वह
परिहारार्थः । इह तु ज्ञानोत्पत्त्य- | उनके आनर्थक्यकी निवृत्तिके लिये
है । तथा यहाँ ज्ञानकी उत्पत्तिके
र्थत्वात्कर्तव्यतानियमार्थः । | हेतु होनेसे उनकी कर्तव्यताका
नियम करनेके लिये है ।
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद ।
धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धन-
माहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम् ।
धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न
प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ॥१॥
देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो
भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव ।
यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि ।
यान्यस्माकँसुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ॥ २ ॥
नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः ।
तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् ।
अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया
देयम् । संविदा देयम् । अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा
वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ॥ ३ ॥
ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः ।
अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा
तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः
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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः ।
यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः ।
एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एव-
मुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥
वेदाध्ययन करानेके अनन्तर आचार्य शिष्यको उपदेश देता है—
सत्य बोल । धर्मका आचरण कर । स्वाध्यायसे प्रमाद न कर । आचार्यके
लिये अभीष्ट धन लाकर [ उसकी आज्ञासे स्त्रीपरिग्रह कर और ] सन्तान-
परम्पराका छेदन न कर । सत्यसे प्रमाद नहीं करना चाहिये । धर्मसे
प्रमाद नहीं करना चाहिये । कुशल ( आत्मरक्षामें उपयोगी ) कर्मसे
प्रमाद नहीं करना चाहिये । ऐश्वर्य देनेवाले माङ्गलिक कर्मोंसे प्रमाद
नहीं करना चाहिये । स्वाध्याय और प्रवचनसे प्रमाद नहीं करना
चाहिये ॥ १ ॥ देवकार्य और पितृकार्योंसे प्रमाद नहीं करना चाहिये ।
तू मातृदेव ( माता ही जिसका देव है ऐसा ) हो, पितृदेव हो, आचार्य-
देव हो और अतिथिदेव हो । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हींका सेवन करना
चाहिये—दूसरोंका नहीं । हमारे ( हम गुरुजनोंके ) जो शुभ आचरण
हैं तुझे उन्हींकी उपासना करनी चाहिये ॥ २ ॥ दूसरे प्रकारके कर्मोंकी
नहीं । जो कोई [ आचार्यादि धर्मोंसे युक्त होनेके कारण ] हमारी अपेक्षा भी
श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं उनका आसनादिके द्वारा तुझे आश्वासन ( श्रमापहरण )
करना चाहिये । श्रद्धापूर्वक देना चाहिये । अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये ।
अपने ऐश्वर्यके अनुसार देना चाहिये । लज्जापूर्वक देना चाहिये । भय मानते
हुए देना चाहिये । संवित्—मैत्री आदि कार्यके निमित्तसे देना चाहिये ।
यदि तुझे कर्म या आचारके विषयमें कोई सन्देह उपस्थित हो ॥ ३ ॥
तो वहाँ जो विचारशील, कर्ममें नियुक्त, आयुक्त ( स्वेच्छासे कर्मपरायण ),
अरूक्ष ( सरलमति ) एवं धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, उस प्रसङ्गमें वे जैसा
व्यवहार करें वैसा ही तू भी कर । इसी प्रकार जिनपर संशययुक्त दोष
आरोपित किये गये हों उनके विषयमें, वहाँ जो विचारशील, कर्ममें
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७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
नियुक्त अथवा आयुक्त (दूसरोंसे प्रेरित न होकर स्वतः कर्ममें परायण ),
सरलहृदय और धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, वे जैसा व्यवहार करें तू भी वैसा
ही कर । यह आदेश—विधि है, यह उपदेश है, यह वेदका रहस्य है और
[ ईश्वरकी ] आज्ञा है । इसी प्रकार तुझे उपासना करनी चाहिये—ऐसा
ही आचरण करना चाहिये ॥ ४ ॥
वेदमन्नूच्याध्याप्याचार्योऽन्ते- | वेदका अध्ययन करानेके
अधीतवेदस्य वासिनं शिष्यमनु- | अनन्तर आचार्य अन्तेवासी—शिष्य-
कर्तव्यनिरूपणम् शास्ति ग्रन्थग्रहणा- | को उपदेश करता है; अर्थात् ग्रन्थ-
ग्रहणके पश्चात् अनुशासन करता
दनु पश्चाच्छास्ति तदर्थं ग्राहयती- | है—उसका अर्थ ग्रहण कराता है ।
इससे ज्ञात होता है कि वेदाध्ययन
त्यर्थः। अतोऽवगम्यतेऽधीतवेदस्य | कर चुकनेपर भी ब्रह्मचारीको बिना
धर्मजिज्ञासा किये गुरुकुलसे समा-
धर्मजिज्ञासामकृत्वा गुरुकुलान्न | वर्तन ( अपने घरकी ओर प्रत्या-
गमन ) नहीं करना चाहिये ।
समावर्तितव्यमिति । "बुद्ध्वा | “कर्मोंका यथावत् ज्ञान प्राप्त करके
उनके अनुष्ठानका आरम्भ करे” इस
कर्माणि चारभेत्” इति स्मृतेश्च । | स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है ।
किस प्रकार उपदेश करता है ? सो
कथमनुशास्तीत्याह— | बतलाते हैं—
सत्यं वद यथाप्रमाणावगतं | सत्य बोल अर्थात् जो कहने-
योग्य बात प्रमाणसे जैसी जानी
गयी हो उसे उसी प्रकार कह ।
वक्तव्यं तद्वद । तद्वद्धर्मं चर । | इसी प्रकार धर्मका आचरण कर ।
'धर्म' यह अनुष्ठान करनेयोग्य
धर्म इत्यनुष्ठेयानां सामान्यवचनं | कर्मोंका सामान्यरूपसे वाचक है;
क्योंकि सत्यादि विशेष धर्मोंका तो
सत्यादिविशेषनिर्देशात् । स्वा- | निर्देश कर ही दिया है । स्वाध्याय
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अनु० ११] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
[वाम स्तम्भः / Left Column - शाङ्करभाष्यम्]
ध्यायादध्ययनान्मा प्रमादः प्रमादं
मा कार्षीः । आचार्यायाचार्यर्थं
प्रियमिष्टं धनमाहृत्यानीय दत्त्वा
विद्यानिष्क्रयार्थम्, आचार्येण
चानुज्ञातोऽनुरूपान्दारानृत्य
प्रजातन्तुं प्रजासन्तानं मा व्यव-
च्छेत्सीः । प्रजासन्ततेर्विच्छित्तिर्न
कर्तव्या । अनुत्पद्यमानेऽपि पुत्रे
पुत्रकाम्यादिकर्मणा तदुत्पत्तौ
यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ।
प्रजाप्रजनप्रजातित्रयनिर्देश-
सामर्थ्यात् । अन्यथा प्रजनश्चे-
त्येतदेकमेवावक्ष्यत् ।
सत्यान्न प्रमदितव्यं प्रमादो
न कर्तव्यः । सत्याच्च प्रमदनम-
नृतप्रसङ्गः, प्रमादशब्दसामर्थ्यात्।
विस्मृत्याप्यनृतं न वक्तव्य-
मित्यर्थः । अन्यथासत्यवदन-
प्रतिषेध एव स्यात् । धर्मान्न
[दक्षिण स्तम्भः / Right Column - भाष्यार्थः]
अर्थात् अध्ययनसे प्रमाद न कर ।
आचार्यके लिये प्रिय—उनका अभीष्ट
धन लाकर और विद्यादानसे उऋण
होनेके लिये उन्हें देकर आचार्यके
आज्ञा देनेपर अपने अनुरूप स्त्रीसे
विवाह करके प्रजातन्तु—सन्तति-
क्रमका छेदन न कर । अर्थात्
प्रजासन्ततिका विच्छेद नहीं करना
चाहिये । तात्पर्य यह है कि यदि
पुत्र उत्पन्न न हो तो भी पुत्र-काम्या
(पुत्रेष्टि) आदि कर्मोंद्वारा उसकी
उत्पत्तिके लिये यत्न करना ही
चाहिये । [नवम अनुवाकमें ] प्रजा,
प्रजन और प्रजाति—तीनोंहीका
निर्देश किया गया है; उसकी
सामर्थ्यसे यही बात सिद्ध होती है;
अन्यथा वहाँ केवल 'प्रजन' इस
एक ही साधनका निर्देश किया
जाता ।
सत्यसे प्रमाद नहीं करना
चाहिये । सत्यसे प्रमादका अभिप्राय
है असत्यका प्रसंग, यह प्रमादशब्द-
के सामर्थ्यसे बोधित होता है। तात्पर्य
यह है कि कभी भूलकर भी असत्य-
भाषण नहीं करना चाहिये; यदि
ऐसा तात्पर्य न होता तो, यहाँ
केवल असत्यभाषणका निषेध ही
किया जाता । धर्मसे प्रमाद नहीं
७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
प्रमादितव्यम् । धर्मशब्दस्यानुष्ठे- | करना चाहिये । 'धर्म' शब्द अनुष्ठेय
यविषयत्वादननुष्ठानं प्रमादः स | कर्मविशेषका वाचक होनेसे उसका
न कर्तव्यः । अनुष्ठातव्य एव | अनुष्ठान न करना ही प्रमाद है;
धर्म इति यावत् । एवं कुशला- | सो नहीं करना चाहिये । अर्थात्
दात्मरक्षार्थात्कर्मणो न प्रमदि- | धर्मका अनुष्ठान करना ही चाहिये ।
तव्यम् । भूतिर्विभूतिस्तस्यै भूत्यै | इसी प्रकार कुशल—आत्मरक्षामें
भूत्यर्थान्मङ्गलयुक्तात्कर्मणो न | उपयोगी कर्मोंसे प्रमाद न करे । 'भूति'
प्रमादितव्यम् । स्वाध्यायप्रवच- | वैभवको कहते हैं, उस वैभवके लिये
नाभ्यां न प्रमादितव्यम् । स्वाध्या- | होनेवाले मङ्गलयुक्त कर्मोंसे प्रमाद
योऽध्ययनं प्रवचनमध्यापनं | न करे । स्वाध्याय और प्रवचनसे
ताभ्यां न प्रमादितव्यम् । ते हि | प्रमाद न करे । स्वाध्याय अध्ययन है
नियमेन कर्तव्ये इत्यर्थः ॥ १ ॥ | और प्रवचन अध्यापन, उन दोनोंसे
तथा देवपितृकार्याभ्यां न | प्रमाद न करे अर्थात् उनका नियम-
प्रमादितव्यम् । दैवपित्र्ये कर्मणी | से आचरण करता रहे ॥ १ ॥ इसी
कर्तव्ये । | प्रकार देवकार्य और पितृकार्योंसे भी
| प्रमाद न करे, अर्थात् देवता और
| पितृसम्बन्धी कर्म अवश्य करने
| चाहिये ।
मातृदेवो माता देवो यस्य स | मातृदेव—माता है देव जिसका
त्वं मातृदेवो भव स्याः । एवं | वह तू मातृदेव हो । इसी प्रकार
पितृदेव आचार्यदेवो भव । | पितृदेव हो, आचार्यदेव हो, [ अतिथि-
देवतावदुपास्या एत इत्यर्थः । | देव हो ] [ इनका अर्थ समझना
यान्यपि चान्यान्यनवद्यान्यनि- | चाहिये ] । तात्पर्य यह है कि ये
न्दितानि शिष्टाचारलक्षणानि | सब देवताके समान उपासना
कर्माणि तानि सेवितव्यानि | करनेयोग्य हैं । इसके सिवा और
कर्तव्यानि त्वया । नो न कर्त- | भी जो अनवद्य—अनिन्द्य यानी
| शिष्टाचाररूप कर्म हैं तेरे लिये वे ही
| सेवनीय यानी कर्त्तव्य हैं । अन्य
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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
व्यानीतराणि सावद्यानि शिष्ट- | निन्दायुक्त कर्म-भले ही वे शिष्ट
कृतान्यपि । यान्यस्माकमाचा- | पुरुषोंके किये हुए हों-तुझे नहीं
र्याणां सुचरितानि शोभनचरि- | करने चाहिये । हम आचार्यलोगोंके
तान्याम्नायाद्यविरुद्धानि तान्येव | भी जो सुचरित-शुभ चरित अर्थात्
त्वयोपास्यान्यहृष्टार्थान्यनुष्ठेया- | शास्त्रसे अविरुद्ध कर्म हैं उन्हींकी
नि, नियमेन कर्तव्यानीति या- | तुझे उपासना करनी चाहिये; अदृष्ट
वत् ॥ २ ॥ नो इतराणि विपरी- | फलके लिये उन्हींका अनुष्ठान करना
तान्याचार्यकृतान्यपि । | चाहिये अर्थात् तेरे लिये वे ही
| नियमसे कर्त्तव्य हैं ॥ २ ॥-दूसरे
ये के च विशेषिता आचार्य- | नहीं, अर्थात् उनसे विपरीत कर्म
त्वादिधर्मैरस्मदस्मत्तः श्रेयांसः | आचार्यके किये हुए भी कर्त्तव्य
प्रशस्यतरास्ते च ब्राह्मणा न | नहीं हैं ।
क्षत्रियादयस्तेषामासनेनासनदा- | जो कोई भी आचार्यत्व आदि धर्मोंके
नादिना त्वया प्रश्वसितव्यम् । | कारण विशिष्ट हैं, अर्थात् हमसे श्रेष्ठ-
प्रश्वसनं प्रश्वासः श्रमापनयः । | बड़े हैं तथा वे ब्राह्मण भी हैं-क्षत्रिय
तेषां श्रमस्त्वयापनेतव्य इत्यर्थः । | आदि नहीं हैं, उनका आसनादिके
तेषां चासने गोष्ठीनिमित्ते समु- | द्वारा अर्थात् उन्हें आसनादि देकर
दिते तेषु न प्रश्वसितव्यं प्रश्वा- | तुझे प्रश्वास-प्रश्वासका अर्थ है
सोऽपि न कर्तव्यः केवलं तदुक्त- | आश्वासन यानी श्रमापहरण करना
सारग्राहिणा भवितव्यम् । | चाहिये । तात्पर्य यह है कि तुझे
| उनका श्रम निवृत्त करना चाहिये ।
| तथा किसी गोष्ठी ( सभा ) के लिये
| उन्हें उच्चासन प्राप्त होनेपर तुझे
| प्रश्वास-दीर्घनिःश्वास भी नहीं
| छोड़ना चाहिये; तुझे केवल उनके
| कथनका सार ग्रहण करनेवाला
| होना चाहिये ।
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७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
किं च यत्किंचिद्देयं तच्छ्रद्ध- | इसके सिवा, तुझे जो कुछ दान
यैव दातव्यम् । अश्रद्धया अदेयं न | करना हो वह श्रद्धासे ही देना
| चाहिये, अश्रद्धासे नहीं । श्री
दातव्यम् । श्रिया विभूत्या देयं | अर्थात् विभूतिके अनुसार देना
| चाहिये, ह्री-लज्जापूर्वक देना
दातव्यम् । हिया लज्जया च | चाहिये, भी-भय मानते हुए
देयम् । भिया भीत्या च देयम् । | देना चाहिये तथा संविद् यानी
संविदा च मैत्र्यादिकार्येण | मैत्री आदि कार्यके निमित्तसे देना
| चाहिये ।
देयम् ।
अथैवं वर्तमानस्य यदि कदा- | फिर इस प्रकार बर्तते हुए तुझे
चित्ते तव श्रौते स्मार्ते वा कर्मणि | यदि किसी समय किसी श्रौत या
| स्मार्त कर्म अथवा आचरणरूप
वृत्ते वाचारलक्षणे विचिकित्सा | वृत्त ( व्यवहार ) में संशय उपस्थित
संशयः स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र तस्मिन् | हो ॥ ३ ॥ तो वहाँ उस देश
देशे काले वा ब्राह्मणास्तत्र कर्मा- | या कालमें जो ब्राह्मण नियुक्त
| हों—इस प्रकार 'तत्र' इस पदका
दौ युक्ता इति व्यवहितेन संबन्धः | 'युक्ता' इस व्यवधानयुक्त पदसे
कर्तव्यः । संमर्शिनो विचार- | सम्बन्ध करना चाहिये—[और जो ]
| संमर्शी-विचारक्षम, युक्त-कर्म
क्षमाः । युक्ता अभियुक्ताः कर्मणि | अथवा आचरणमें पूर्णतया तत्पर,
वृत्ते वा । आयुक्ता अपरप्रयुक्ताः । | आयुक्त-किसी दूसरेसे प्रयुक्त न
| होनेवाले [ अर्थात् स्वेच्छासे प्रवृत्त ],
अल्रूक्षा अरूक्षा अक्रूरमतयः । | अलूक्ष-अरूक्ष अर्थात् अक्रूरमति
धर्मकामा अदृष्टार्थिनोऽकामहता | ( सरलचित्त ) और धर्मकामी-
| अदृष्टफलकी इच्छावाले अर्थात्
इत्येतत्, स्युर्भवेयुः । ते यथा येन | कामनावश विवेकशून्य न हों, वे
प्रकारेण ब्राह्मणास्तत्र तस्मिन्क- | ब्राह्मण उस कर्म या आचरणमें जिस
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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
[संस्कृत-मूल/भाष्य]
र्मणि वृत्ते वा वर्तेरंस्तथा त्वमपि
वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु,
अभ्याख्याता अभ्युक्ता दोषेण
संदिह्यमानेन संयोजिताः केन-
चित्तेषु च यथोक्तं सर्वमुपन-
येद्ये तत्रेत्यादि ।
एष आदेशो विधिः । एष
उपदेशः पुत्रादिभ्यः पित्रादी-
नाम् । एषा वेदोपनिषद्वेदरहस्यं
वेदार्थ इत्येतत् । एतदेवानुशा-
सनमीश्वरवचनम् । आदेश-
वाक्यस्य विधेरुक्तत्वात्सर्वेषां वा
प्रमाणभूतानामनुशासनमेतत् ।
यस्मादेवं तस्मादेवं यथोक्तं सर्व-
मुपासितव्यं कर्तव्यम् । एवमु
चैतदुपास्यमुपास्यमेव चैतन्नानुपा-
स्यमित्यादरार्थं पुनर्वचनम् ॥४॥
[हिन्दी-अनुवाद]
प्रकार बर्ताव करें उसी प्रकार तुझे
भी बर्ताव करना चाहिये । इसी
प्रकार अभ्याख्यातोंके प्रति-
अभ्याख्यात-अभ्युक्त अर्थात् जिन-
पर कोई संशययुक्त दोष आरोपित
किया गया हो उनके प्रति जैसा
पहले 'ये तत्र' इत्यादिसे कहा गया
है उसी सब व्यवहारका प्रयोग
करना चाहिये ।
यह आदेश अर्थात् विधि है,
यह पुत्रादिको पिता आदिका उपदेश
है, यह वेदोपनिषद्-वेदका रहस्य
यानी वेदार्थ है । यही अनुशासन
यानी ईश्वरका वाक्य है । अथवा
आदेशवाक्य विधि है-ऐसा पहले
कहा जा चुका है इसलिये यह
सभी प्रमाणभूत [ उपदेशकों ] का
अनुशासन है । क्योंकि ऐसा
है इसलिये पहले जो कुछ
कहा गया है वह सब इसी
प्रकार उपासनीय-करने योग्य हैं ।
इस प्रकार ही इसकी उपासना
करनी चाहिये-यह उपासनीय ही
है, अनुपास्य नहीं है-इस प्रकार
यह पुनरुक्ति उपासनाके आदरके
लिये है ॥ ४ ॥