तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
११६ | तैत्तिरीयोपनिषद् | [ वल्ली २
| ११६ | तैत्तिरीयोपनिषद् | [ वल्ली २ |
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गतेन सर्वात्मना नित्यब्रह्मात्म- | प्रकारसे सर्वज्ञ सर्वगत सर्वात्मक
स्वरूपेण धर्मादिनिमित्तानपेक्षां- | एवं नित्यब्रह्मात्मस्वरूपसे, धर्मादि
श्चक्षुरादिकरणनिरपेक्षांश्च सर्वा- | निमित्तकी अपेक्षासे रहित तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भी निरपेक्ष सम्पूर्ण भोगोंको एक साथ ही प्राप्त कर लेता है—यह इसका तात्पर्य है । विपश्चित्—मेधावी अर्थात् सर्वज्ञ ब्रह्मरूपसे । ब्रह्मका जो सर्वज्ञत्व है वही उसकी विपश्चित्ता (विद्वत्ता) है। उस सर्वज्ञस्वरूप ब्रह्मरूपसे ही वह उन्हें भोगता है । मूलमें ‘इति’ शब्द मन्त्रकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है।
न्कामान्सहैवाश्नुत इत्यर्थः । |
विपश्चिता मेधाविना सर्वज्ञेन । |
तद्धि वैपश्चित्यं यत्सर्वज्ञत्वं तेन |
सर्वज्ञस्वरूपेण ब्रह्मणाश्नुत इति । |
इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । |
सर्व एव वल्ल्यर्थो ब्रह्मविदा- | ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इस ब्राह्मण-
प्नोति परमिति ब्राह्मणवाक्येन | वाक्यद्वारा इस सम्पूर्ण वल्लीका अर्थ सूत्ररूपसे कह दिया है । उस सूत्रभूत अर्थकी ही मन्त्रद्वारा संक्षेप-
सूत्रितः । स च सूत्रितोऽर्थः |
संक्षेपतो मन्त्रेण व्याख्यातः । | से व्याख्या कर दी गयी है । अब
पुनस्तस्यैव विस्तरेणार्थनिर्णयः | फिर उसीका अर्थ विस्तारसे निर्णय
कर्तव्य इत्युत्तरस्तद्वृत्तिस्थानीयो | करना है—इसीलिये उसका वृत्तिरूप
ग्रन्थ आरभ्यते तस्माद्वा एतस्मा- | ‘तस्माद्वा एतस्मात्’ इत्यादि आगेका
दित्यादिः । | ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।
तत्र च सत्यं ज्ञानमनन्तं | उस मन्त्रमें सबसे पहले ‘सत्यं
^(सत्यं ज्ञानमनन्तं) ब्रह्मेत्युक्तं मन्त्रादौ | ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ऐसा कहा है । वह
^(ब्रह्मेति मीमांस्यते) तत्कथं सत्यं ज्ञान- | सत्य, ज्ञान और अनन्त किस प्रकार
मनन्तं चेत्यत आह । तत्र | है ? सो बतलाते हैं—अनन्तता
त्रिविधं ह्यानन्त्यं देशतः कालतो | तीन प्रकारकी है—देशसे, कालसे
वस्तुतश्चेति । तद्यथा देशतो- | और वस्तुसे । उनमें जैसे आकाश
ऽनन्त आकाशः। न हि देशतस्तस्य | देशतः अनन्त है । उसका देशसे
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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
परिच्छेदोऽस्ति । न तु काल- | परिच्छेद नहीं है । किन्तु कालसे
तश्चानन्त्यं वस्तुतश्चाकाशस्य । | और वस्तुसे आकाशकी अनन्तता
कस्मात्कार्यत्वात् । नैवं ब्रह्मण | नहीं है । क्यों नहीं है ? क्योंकि वह
आकाशवत्कालतोऽप्यन्तवत्त्वम- | कार्य है । किन्तु आकाशके समान
कार्यत्वात् । कार्यं हि वस्तु | किसीका कार्य न होनेके कारण
कालेन परिच्छिद्यते । अकार्यं | ब्रह्मका इस प्रकार कालसे भी
च ब्रह्म । तस्मात्कालतोऽस्यानन्त्यम् । | अन्तवत्त्व नहीं है । जो वस्तु किसी-
| का कार्य होती है वही कालसे
| परिच्छिन्न होती है । और ब्रह्म
| किसीका कार्य नहीं है, इसलिये
| उसकी कालसे अनन्तता है ।
तथा वस्तुतः । कथं पुनर्वस्तुत | इसी प्रकार वह वस्तुसे भी
आनन्त्यं सर्वानन्यत्वात् । भिन्नं हि | अनन्त है । वस्तुसे उसकी अनन्तता
वस्तु वस्त्वन्तरस्यान्तो भवति, | किस प्रकार है ? क्योंकि वह सबसे
वस्त्वन्तरबुद्धिर्हि प्रसक्ताद्वस्त्व- | अभिन्न है । भिन्न वस्तु ही किसी
न्तरान्निवर्तते । यतो यस्य बुद्धे- | अन्य भिन्न वस्तुका अन्त हुआ
र्विनिवृत्तिः स तस्यान्तः । तद्यथा | करती है; क्योंकि किसी भिन्न वस्तुमें
गोत्वबुद्धिरश्वत्वाद्विनिवर्तत इति | गयी हुई बुद्धि ही किसी अन्य प्रसक्त
अश्वत्वान्तं गोत्वमित्यन्तवदेव | वस्तुसे निवृत्त की जाती है । जिस
भवति । स चान्तो भिन्नोषु वस्तुषु | [ पदार्थसम्बन्धिनी ] बुद्धिकी जिस
दृष्टः । नैवं ब्रह्मणो भेदः । अतो | पदार्थसे निवृत्ति होती है वही उस
वस्तुतोऽप्यानन्त्यम् । | पदार्थका अन्त है । जिस प्रकार
| गोत्वबुद्धि अश्वत्वबुद्धिसे निवृत्त होती
| है, अतः गोत्वका अन्त अश्वत्व हुआ,
| इसलिये वह अन्तवान् ही है और
| उसका वह अन्त भिन्न पदार्थोंमें ही
| देखा जाता है । किन्तु ब्रह्मका ऐसा
| कोई भेद नहीं है । अतः वस्तुसे
| भी उसकी अनन्तता है ।