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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
यथान्नमयः । सोऽयं प्राणमय- होनेके कारण ] अन्नमय कहा गया
स्याभ्यन्तर आत्मा । तस्य यजु- है । वह इस प्राणमयका अन्तर्वर्ती
आत्मा है । उसका यजुः ही शिर
रेव शिरः । यजुरित्यनियताक्षर- है । जिनमें अक्षरोंका कोई नियम
पादावसानो मन्त्रविशेषस्तज्जा- नहीं है ऐसे पादोंमें समाप्त होनेवाले
मन्त्रविशेषका नाम यजुः है । उस
तीयवचनो यजुःशब्दस्तस्य जातिके मन्त्रोंका वाचक 'यजुः'
शिरस्त्वं प्राधान्यात् । प्राधान्यं च शब्द है । उसे प्रधानताके कारण
शिर कहा गया है । यागादिमें
यागादौ संनिपत्योपकारकत्वात् । संनिपत्य उपकारक * होनेके कारण
यजुषा हि हविर्दीयते स्वाहाका- यजुः-मन्त्रोंकी प्रधानता है; क्योंकि
स्वाहा आदिके द्वारा यजुर्मन्त्रोंसे ही
रादिना । हवि दी जाती है ।
वाचनिकी वा शिरआदि- अथवा इन सब प्रसंगोंमें शिर
आदिकी कल्पना श्रुतिवाक्यसे ही
कल्पना सर्वत्र । मनसो हि समझनी चाहिये । अक्षरोंके
[उच्चारणके] स्थान, [आन्तरिक] प्रयत्न,
स्थानप्रयत्ननादस्वरवर्णपदवाक्य- [उससे उत्पन्न हुआ] नाद, [उदात्तादि]
स्वर, [अकारादि] वर्ण, [उनसे रचे हुए]
विषया तत्संकल्पात्मिका पद और [पदोंके समूहरूप] वाक्यसे
सम्बन्ध रखनेवाली तथा उन्हींके
तद्भाविता वृत्तिः श्रोत्रादिकरण- संकल्प और भावसे युक्त जो श्रवणादि
इन्द्रियोंके द्वारा उत्पन्न होनेवाली
द्वारा यजुःसंकेतविशिष्टा यजुः 'यजुः' संकेतविशिष्ट मनकी वृत्ति है

  • यज्ञाङ्ग दो प्रकारके होते हैं—एक संनिपत्य उपकारक और दूसरे
    आरात् उपकारक । उनमें जो अङ्ग साक्षात् अथवा परम्परासे प्रधान यागके
    कलेवरकी पूर्ति कर उसके द्वारा अपूर्वकी उत्पत्तिमें उपयोगी होते हैं वे संनिपत्य
    उपकारक कहलाते हैं । यजुर्मन्त्र भी यागशरीरको निष्पन्न करनेवाले होनेसे
    संनिपत्य उपकारक हैं ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri