तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
आत्मना त्वप्रविभक्तदेशकाले | देश और काल आत्मासे अभिन्न हैं
इति कृत्वात्मा ते अभवदित्यु- | —इसीलिये ‘आत्मा ही मूर्त और
च्यते । | अमूर्त हुआ’ ऐसा कहा जाता है ।
किं च निरुक्तं चानिरुक्तं च । | तथा वही निरुक्त और अनिरुक्त
| भी हुआ । निरुक्त उसे कहते हैं
निरुक्तं नाम निष्कृष्य समाना- | जिसे सजातीय और विजातीय
समानजातीयेभ्यो देशकाल- | पदार्थोंसे अलग करके देश-काल-
| विशिष्टरूपसे ‘वह यह है’ ऐसा
विशिष्टतयेदं तदित्युक्तमनिरुक्तं | कहा जाय । इससे विपरीत लक्षणों-
तद्विपरीतं निरुक्तानिरुक्ते अपि | वालेको ‘अनिरुक्त’ कहते हैं ।
| निरुक्त और अनिरुक्त भी मूर्त और
मूर्तामूर्तयोरेव विशेषणे । यथा | अमूर्तके ही विशेषण हैं । जिस
| प्रकार ‘सत्’ और ‘त्यत्’ क्रमशः
सच्च त्यच्च प्रत्यक्षपरोक्षे, तथा | ‘प्रत्यक्ष’ और ‘परोक्ष’ को कहते हैं
निलयनं चानिलयनं च । निल- | उसी प्रकार ‘निलयन’ और ‘अनि-
| लयन’ भी समझने चाहिये ।
यनं नीडमाश्रयो मूर्तस्यैव धर्मः । | निलयन-—नीड अर्थात् आश्रय
अनिलयनं तद्विपरीतममूर्तस्यैव | मूर्तका ही धर्म है और उससे
| विपरीत अनिलयन अमूर्तका ही
धर्मः । | धर्म है ।
त्यदनिरुक्तानिलयनान्यमूर्त- | त्यत्, अनिरुक्त और अनिलयन—
धर्मत्वेऽपि व्याकृतविषयाण्येव । | ये अमूर्तके धर्म होनेपर भी व्याकृत
| ( व्यक्त ) से ही सम्बन्ध रखनेवाले
सर्गोत्तरकालभावश्रवणात् । त्य- | हैं; क्योंकि इनकी सत्ता सृष्टिके
दिति प्राणाद्यनिरुक्तं तदेवानि- | अनन्तर ही सुनी गयी है । त्यत्—
| यह प्राणादि अनिरुक्तका नाम है;
लयनं च । अतो विशेषणान्य- | वही अनिलयन भी है । अतः ये
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७१
मूर्तस्य व्याकृतविषयाण्येवैतानि । | अमूर्तके विशेषण व्याकृतविषयक
| ही हैं ।
विज्ञानं चेतनमविज्ञानं | विज्ञान यानी चेतन, अविज्ञान-
तद्रहितमचेतनं पाषाणादि सत्यं | उससे रहित अचेतन पाषाणादि
| और सत्य-व्यवहारसम्बन्धी सत्य;
च व्यवहारविषयमधिकारात्न | क्योंकि यहाँ व्यवहारका ही प्रसंग
परमार्थसत्यम् । एकमेव हि | है, परमार्थ सत्य नहीं; परमार्थ सत्य
| तो एकमात्र ब्रह्म ही है; यहाँ तो
परमार्थसत्यं ब्रह्म । इह पुन- | केवल व्यवहारविषयक आपेक्षिक
| सत्यसे ही तात्पर्य है, जैसे कि
र्व्यवहारविषयमापेक्षिकं सत्यम्, | मृगतृष्णा आदि असत्यकी अपेक्षासे
मृगतृष्णिकाद्यनृतापेक्षयोदकादि | जल आदिको सत्य कहा जाता है
सत्यमुच्यते । अनृतं च तद्विप- | तथा अनृत-उस (व्यावहारिक
| सत्य ) से विपरीत । सो फिर
रीतम्। किं पुनः ? एतत्सर्वमभवत्, | क्या ? ये सब वह सत्य--परमार्थ
सत्यं परमार्थसत्यम् । किं | सत्य ही हो गया । वह परमार्थ
पुनस्तत् ? ब्रह्म, सत्यं ज्ञानमनन्तं | सत्य है क्या ? वह ब्रह्म है; क्योंकि
| 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान एवं अनन्त है'
ब्रह्मेति प्रकृतत्वात् । | इस प्रकार उसीका प्रकरण है ।
यस्मात्सच्चदादिकं मूर्तामूर्त- | क्योंकि सत्-त्यत् आदि जो कुछ
धर्मजातं यत्किंचेदं सर्वमविशिष्टं | मूर्त-अमूर्त धर्मजात है वह सामान्य-
| रूपसे सारा ही विकार एकमात्र
विकारजातमेकमेव सच्छब्दवाच्यं | 'सत्' शब्दवाच्य ब्रह्म ही हुआ है-
ब्रह्माभवत्तद्व्यतिरेकेणाभावान्ना- | क्योंकि उससे भिन्न नाम-रूप विकार-
| का सर्वथा अभाव है-इसलिये ब्रह्म-
मरूपविकारस्य, तस्मात्तद्ब्रह्म | वादीलोग उस ब्रह्मको 'सत्य' ऐसा
सत्यमित्याचक्षते ब्रह्मविदः । | कहकर पुकारते हैं ।
अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नः प्रकृत- | 'ब्रह्म है या नहीं' इस अनुप्रश्नका
स्तस्य प्रतिवचनविषय एतदुक्त- | यहाँ प्रसंग था । उसके उत्तरमें यह
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