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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

११२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

११२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
प्रसिद्धिरतो नैव धात्वर्थस्तद्- | भली प्रकार सिद्ध ही है। अतः
क्रियारूपत्वात् । | क्रियारूप न होनेके कारण वह
| (ज्ञान) धातुका अर्थ भी नहीं है।
अत एव च न ज्ञानकर्तृ, | इसीलिये वह ज्ञानकर्ता भी नहीं
तस्मादेव च न ज्ञानशब्दवाच्य- | है और इसीसे वह ब्रह्म 'ज्ञान'
मपि तद्ब्रह्म । तथापि तदाभास- | शब्दका वाच्य भी नहीं है । तो भी
वाचकेन बुद्धिधर्मविषयेण ज्ञान- | ज्ञानाभासके वाचक तथा बुद्धि-
| के धर्मविषयक 'ज्ञान' शब्दसे वह
शब्देन तल्लक्ष्यते न तूच्यते । | लक्षित होता है-कहा नहीं जाता;
शब्दप्रवृत्तिहेतुजात्यादिधर्मरहित- | क्योंकि वह शब्दकी प्रवृत्तिके हेतु-
| भूत जाति आदि धर्मोंसे रहित है ।
त्वात् । तथा सत्यशब्देनापि। सर्व- | इसी प्रकार 'सत्य' शब्दसे भी
विशेषप्रत्यस्तमितस्वरूपत्वाद्ब्रह्मणो | [उसको लक्षित ही किया जा सकता
| है]। ब्रह्मका स्वरूप सम्पूर्ण विशेषणों-
बाह्यसत्तासामान्यविषयेण सत्य- | से शून्य है; अतः वह सामान्यतः
| सत्ता ही जिसका विषय-अर्थ है
शब्देन लक्ष्यते सत्यं ब्रह्मेति न | ऐसे 'सत्य' शब्दसे 'सत्यं ब्रह्म' इस
| प्रकार केवल लक्षित होता है-ब्रह्म
तु सत्यशब्दवाच्यमेव ब्रह्म । | 'सत्य' शब्दका वाच्य ही नहीं है ।
एवं सत्यादिशब्दा इतरेतर- | इस प्रकार ये सत्यादि शब्द
संनिधावन्योन्यनियम्यनियाम- | एक-दूसरेकी सन्निधिसे एक-दूसरेके
| नियम्य और नियामक होकर
काः सन्तः सत्यादिशब्दवाच्या- | सत्यादि शब्दोंके वाच्यार्थसे ब्रह्मको
त्तन्निवर्तका ब्रह्मणो लक्षणार्थाश्च | अलग रखनेवाले और उसका लक्षण
भवन्तीत्यतः सिद्धम् "यतो वाचो | करनेमें उपयोगी होते हैं । अतः
निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" | "जहांसे मनके सहित वाणी उसे


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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

( तै० उ० २ । ४ । १ ) “अ- | न पाकर लौट आती है” “न कहने
निरुक्तेऽनिलयने” (तै० उ० २ । | योग्य और अनाश्रितमें” इत्यादि
७ । १) इति चावाच्यत्वं | श्रुतियोंके अनुसार ब्रह्मका सत्यादि
नीलोत्पलवदवाक्यार्थत्वं च | शब्दोंका अवाच्यत्व और नील-कमलके समान अवाक्यार्थत्व सिद्ध
ब्रह्मणः । | होता है ।*
तद्यथाव्याख्यातं ब्रह्म यो वेद | उपर्युक्त प्रकारसे व्याख्या किये
[गुहाशब्दार्थ-निर्वचनम्] विजानाति निहितं | हुए उस ब्रह्मको जो पुरुष गुहामें
स्थितं गुहायाम् । | निहित ( छिपा हुआ ) जानता है । संवरण अर्थात् आच्छादन अर्थ-
गूहतेः संवरणार्थस्य निगूढा | वाले 'गूह्' धातुसे 'गुहा' शब्द
अस्यां ज्ञानज्ञेयज्ञातृपदार्था इति | निष्पन्न होता है; इस ( गुहा ) में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञातृ पदार्थ निगूढ
गुहा बुद्धिः । गूढावस्थां भोगा- | ( छिपे हुए ) हैं इसलिये 'गुहा'
पवर्गौ पुरुषार्थाविति वा तस्यां | बुद्धिका नाम है । अथवा उसमें भोग और अपवर्ग-ये पुरुषार्थ निगूढ
परमे प्रकृष्टे व्योमन्व्योम्न्याका- | अवस्थामें स्थित हैं; अतः गुहा है ।
शेऽव्याकृताख्ये । तद्धि परमं | उसके भीतर परम-प्रकृष्ट व्योम-आकाशमें अर्थात् अव्याकृताकाशमें,
व्योम “एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्या- | क्योंकि “हे गार्गि ! निश्चय इस
काशः” ( बृ० उ० ३ । ८ । ११) | अक्षरमें ही आकाश [ ओतप्रोत है ]” इस श्रुतिके अनुसार अक्षरकी
इत्यक्षरसंनिकर्षात् । गुहायां | सन्निधिमें होनेसे यह अव्याकृताकाश

*तात्पर्य यह है कि वाच्य-वाचक-भाव ब्रह्मका बोध करानेमें समर्थ नहीं
हो सकता; अतः ब्रह्म इन शब्दोंका वाच्य नहीं हो सकता और सम्पूर्ण द्वैतकी
निवृत्तिके अधिष्ठानरूपसे लक्षित होनेके कारण वह नीलकमल आदिके समान
गुण-गुणीरूप संसर्गसूचक वाक्योंका भी अर्थ नहीं हो सकता ।
तै० उ० १५-१६-
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