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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

२१० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

२१० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
तस्य सर्वैषणाविनिर्मुक्तस्यात्मभूतं | अकामहत और सब प्रकारकी
विषयविषयिसंबन्धविनिर्मुक्तं | एषणाओंसे मुक्त साधकके आत्मभूत,
स्वाभाविकं नित्यमविभक्तं पर- | विषय-विषयी सम्बन्धसे रहित,
स्वाभाविक, नित्य और अविभक्त
मानन्दं ब्रह्मणो विद्वान्यथोक्तेन | ऐसे ब्रह्मके उत्कृष्ट आनन्दको पूर्वोक्त
विधिसे जाननेवाला पुरुष कोई
विधिना न बिभेति कुतश्चन | भयका निमित्त न रहनेके कारण
निमित्ताभावात् । | किसीसे भयभीत नहीं होता ।
न हि तस्माद्विदुषोऽन्यद्वस्त्व- | उस विद्वान्‌से भिन्न कोई दूसरी
न्तरमस्ति भिन्नं यतो बिभेति । | वस्तु ही नहीं है जिससे कि उसे भय
अविद्यया यदोदरमन्तरं कुरुते, | हो । अविद्यावश जब थोड़ा-सा भी
अन्तर करता है तभी जीवको भय
अथ तस्य भयं भवतीति ह्युक्तम् । | होता है—ऐसा कहा ही गया है ।
विदुषश्चाविद्याकार्यस्य तैमिरिक- | अतः तिमिररोगीके देखे हुए द्वितीय
चन्द्रमाके समान विद्वान्‌के अविद्या-
दृष्टद्वितीयचन्द्रवन्नाशाद्भयनिमि- | के कार्यभूत भयके निमित्तका नाश
त्तस्य न बिभेति कुतश्चनेति | हो जानेके कारण वह किसीसे नहीं
युज्यते । | डरता—ऐसा कहना ठीक ही है ।
मनोमये चोदाहृतो मन्त्रो | मनोमय कोशके प्रकरणमें यह
मन्त्र उदाहरणके लिये दिया गया
मनसो ब्रह्मविज्ञानसाधनत्वात् । | था; क्योंकि मन ब्रह्मविज्ञानका
तत्र ब्रह्मत्वमध्यारोप्य तत्स्तु- | साधन है । उसमें ब्रह्मत्वका आरोप
त्यर्थं न बिभेति कदाचनेति | करके उसकी स्तुतिके लिये ही 'वह
कभी नहीं डरता' इस वाक्यसे उसके
भयमात्रं प्रतिषिद्धमिहाद्वैतविषये | भयमात्रका प्रतिषेध किया गया था ।
न बिभेति कुतश्चनेति भयनिमि- | यहाँ अद्वैतप्रकरणमें वह किसीसे
नहीं डरता,—इस प्रकार भयके
त्तमेव प्रतिषिध्यते । | निमित्तका ही प्रतिषेध किया जाता है।
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अनु० ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
नन्वस्ति भयनिमित्तं साध्व- शङ्का—किन्तु शुभ कर्मका न
करणं पापक्रिया च ? करना और पापकर्म करना यह तो भयका कारण है ही ?
नैवम्; कथमित्युच्यते—एतं समाधान—ऐसी बात नहीं है ।
यथोक्तमेवंचिदम्, ह वावेत्यव- किस प्रकार नहीं है सो बतलाया जाता है—इस पूर्वोक्तको अर्थात् इस
धारणार्थो, न तपति नोद्वेज- प्रकार जाननेवालेको वह तप्त—उद्विग्न
यति न संतापयति । कथं पुनः अर्थात् सन्तप्त नहीं करता । मूलमें 'ह' और 'वाव' ये निश्चयार्थक
साध्वकरणं पापक्रिया च न निपात हैं । वह पुण्यका न करना
तपतीत्युच्यते । किं कस्मात्साधु और पापक्रिया उसे किस प्रकार
शोभनं कर्म नाकरवं न कृतवा- ताप नहीं देते ? इसपर कहते हैं—'मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया'
नस्मीति पश्चात्संतापो भवत्या- ऐसा पश्चात्ताप मरणकाल समीप
सन्ने मरणकाले । तथा किं आनेपर हुआ करता है तथा 'मैंने
कस्मात्पापं प्रतिषिद्धं कर्माकरवं पाप यानी प्रतिषिद्ध कर्म क्यों किया' ऐसा दुःख नरकपात आदि-
कृतवानस्मीति च नरकपतनादि- के भयसे होता है । ये पुण्यका न
दुःखभयात्तापो भवति । ते एते करना और पापका करना इस
साध्वकरणपापक्रिये एवमेनं न विद्वान्को इस प्रकार सन्तप्त नहीं करते जैसे कि वे अविद्वान्को किया
तपतो यथाविद्वांसं तपतः । करते हैं ।
कस्मात्पुनर्विद्वांसं न तपत वे विद्वान्को क्यों सन्तप्त नहीं
इत्युच्यते—स य एवंविद्वानेते करते ? सो बतलाया जाता है—ये
साध्वसाधुनी तापहेतू इत्यात्मानं पाप-पुण्य ही तापके हेतु हैं—इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान्
स्पृणुते प्रीणयति बलयति वा आत्माको प्रसन्न अथवा सबल करता
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