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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
न; बहिःष्ठस्य प्रवेशोपपत्तेः। न | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि प्रवेश
हि यो यस्यानतःस्थः स एव | बाहर रहनेवाले पदार्थका ही हो
सकता है । जो जिसके भीतर
तत्प्रविष्ट उच्यते । बहिःष्ठस्यानु- | स्थित है वह उसमें प्रविष्ट हुआ
नहीं कहा जाता । अनुप्रवेश
प्रवेशः स्यात्प्रवेशशब्दार्थस्यैवं | तो बाहर रहनेवाले पदार्थका ही
हो सकता है; क्योंकि 'प्रवेश'
दृष्टत्वात् । यथा गृहं कृत्वा | शब्दका अर्थ ऐसा ही देखा गया
प्राविशदिति । | है; जैसे कि 'घर बनाकर उसमें
प्रवेश किया' इस वाक्यमें ।
जलसूर्यकादिप्रतिविम्बवत्प्र- | यदि कहो कि जलमें सूर्यके
वेशः स्यादिति चेन्न; अपरिच्छि- | प्रतिबिम्ब आदिके समान उसका
प्रवेश हो सकता है, तो ऐसा
न्नत्वादमूर्तत्वाच्च । परिच्छिन्नस्य | कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि ब्रह्म
अपरिच्छिन्न और अमूर्त है । परि-
मूर्तस्यान्यस्यान्यत्र प्रसादस्व- | च्छिन्न और मूर्तरूप अन्य पदार्थोंका
भावके जलादौ सूर्यकादिप्रतिवि- | ही स्वच्छस्वभाव जल आदि अन्य
पदार्थोंमें सूर्यकादिरूप प्रतिबिम्ब
म्बोदयः स्यात् । न त्वात्मनः, | पड़ा करता है; किन्तु आत्माका
प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता; क्योंकि
अमूर्तत्वादाकाशादिकारणस्या- | वह अमूर्त है तथा आकाशादिका
त्मनो व्यापकत्वात् । तद्विप्रकृष्ट- | कारणरूप आत्मा व्यापक भी है ।
उससे दूर देशमें स्थित प्रतिबिम्बकी
देशप्रतिविम्बाधारवस्त्वन्तराभा- | आधारभूत अन्य वस्तुका अभाव
वाच्च प्रतिविम्बवत्प्रवेशो न | होनेसे भी उसका प्रतिबिम्बके समान
प्रवेश होना सम्भव नहीं है ।
युक्तः ।
एवं तर्हि नैवास्ति प्रवेशो न | पूर्व०-तब तो आत्माका प्रवेश
होता ही नहीं-इसके सिवा
च गत्यन्तरमुपलभामहे 'तदे- | 'तदेवानुप्राविशत्' इस श्रुतिकी और

[अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७


[मूल/संस्कृत-स्तम्भः]

वानुप्राविशत्' इति श्रुतेः।
श्रुतिश्च नोऽतीन्द्रियविषये विज्ञा-
नोत्पत्तौ निमित्तम्। न चास्मा-
द्वाक्याद्यत्नवतामपि विज्ञानमु-
त्पद्यते। हन्त तर्ह्यनर्थकत्वादपो-
ह्यमेतद्वाक्यम् 'तत्सृष्ट्वा तदेवानु-
प्राविशत्' इति।
न, अन्यार्थत्वात्। किमर्थ-
मस्थाने चर्चा। प्रकृतो ह्यन्यो
विवक्षितोऽस्य वाक्यस्यार्थोऽस्ति
स स्मर्तव्यः। "ब्रह्मविदाप्नोति
परम्" (तै० उ० २।१।१)
"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै०
उ० २।१।१) "यो वेद
निहितं गुहायाम्" (तै० उ०
२।१।१) इति तद्विज्ञानं
च विवक्षितं प्रकृतं च तत्।
ब्रह्मस्वरूपानुगमाय चाकाशाद्य-
न्नमयान्तं कार्यं प्रदर्शितं ब्रह्मा-
नुगमश्चारब्धः। तत्रान्नमयादा-
त्मनोऽन्योऽन्तर आत्मा प्राण-


[हिन्दी-भाष्यार्थ-स्तम्भः]

कोई गति दिखायी नहीं देती।
हमारे (मीमांसकोंके) सिद्धान्ता-
नुसार इन्द्रियातीत विषयोंका ज्ञान
होनेमें श्रुति ही कारण है। किन्तु
इस वाक्यसे बहुत यत्न करनेपर भी
किसी प्रकारका ज्ञान उत्पन्न नहीं
होता। अतः खेद है कि 'तत्सृष्ट्वा
तदेवानुप्राविशत्' यह वाक्य अर्थशून्य
होनेके कारण त्यागने ही योग्य है।
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है;
क्योंकि इस वाक्यका अर्थ अन्य ही
है। इस प्रकार अप्रासङ्गिक चर्चा क्यों
करते हो? इस प्रसंगमें इस वाक्य-
को और ही अर्थ कहना अभीष्ट है।
उसीको स्मरण करना चाहिये। "ब्रह्म-
वेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है"
"ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है"
"जो उसे बुद्धिरूप गुहामें छिपा
हुआ जानता है" इत्यादि वाक्योंद्वारा
जिसका निरूपण किया गया है
उस ब्रह्मका ही विज्ञान यहाँ बतलाना
अभीष्ट है और उसीका यहाँ प्रसङ्ग
भी है। ब्रह्मके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त
करनेके लिये ही आकाशसे लेकर
अन्नमयकोशपर्यन्त सम्पूर्ण कार्य-
वर्ग दिखलाया गया है तथा ब्रह्मा-
नुभवका प्रसङ्ग भी चल ही रहा
है। उसमें अन्नमय आत्मासे भिन्न
दूसरा अन्तरात्मा प्राणमय है,