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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१९४ \hspace{70pt} तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{70pt} [ वल्ली २

१९४ \hspace{70pt} तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{70pt} [ वल्ली २

विशेषोपमर्देन परमानन्दमपेक्ष्य | द्वारा परमानन्दकी अपेक्षा उसके
समो भवति न कश्चिदुत्कर्षोऽप- | तुल्य ही सिद्ध होता है तो उस गतिको प्राप्त हुए पुरुषका कोई
कर्षो वा तां गतिं गतस्येत्यभयं | उत्कर्ष या अपकर्ष नहीं रहता और वह निर्भय स्थितिको प्राप्त कर लेता
प्रतिष्ठां विन्दत इत्युपपन्नम्। | है; अतः यह कथन उचित ही है।

\hspace{10pt} अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नो व्या- | \hspace{10pt} ब्रह्म है या नहीं—इस अनुप्रश्नकी
{@{}c@{}}\scriptsize द्वितीयानुप्रश्न-
\scriptsize विचारः ख्यातः। कार्यरस- | व्याख्या कर दी गयी। कार्यरूप रसकी प्राप्ति, प्राणन, अभय-प्रतिष्ठा
लाभप्राणानाभयप्र- | और भयदर्शन आदि युक्तियोंसे वह
तिष्ठाभयदर्शनोपपत्तिभ्योऽस्त्येव | आकाशादिका कारणरूप ब्रह्म है
तदाकाशादिकारणं ब्रह्मेत्यपा- | ही—इस प्रकार एक अनुप्रश्नका निराकरण किया गया। दूसरे दो
कृतोऽनुप्रश्न एकः। द्वावन्याव- | अनुप्रश्न विद्वान् और अविद्वान्‌की
नुप्रश्नौ विद्वदविदुषोर्ब्रह्मप्राप्त्य- | ब्रह्मप्राप्ति और ब्रह्मकी अप्राप्तिके विषयमें हैं। उनमें अन्तिम अनुप्रश्न
प्राप्तिविषयौ तत्र विद्वान्सम् अश्नुते | यही है कि 'विद्वान् ब्रह्मको प्राप्त
न समश्नुत इत्यनुप्रश्नोऽन्त्यस्त- | होता है या नहीं?' उसका निराकरण करनेके लिये कहा जाता है।
दपाकरणायोच्यते। मध्यमोऽनु- | मध्यम अनुप्रश्नका निराकरण तो
प्रश्नोऽन्त्यापाकरणादेवापाकृत | अन्तिमके निराकरणसे ही हो जायगा; इसलिये उसके निराकरणका
इति तदपाकरणाय न यत्यते। | यत्न नहीं किया जाता।

\hspace{10pt} स यः कश्चिदेवं यथोक्तं ब्रह्म | \hspace{10pt} इस प्रकार जो कोई उत्कर्ष और
उत्सृज्योत्कर्षापकर्षमद्वैतं सत्यं | अपकर्षको त्यागकर 'मैं ही उपर्युक्त सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप अद्वैत ब्रह्म
ज्ञानमनन्तमस्मीत्येवं वेत्ती- | हूँ' ऐसा जानता है वह एवंवित्


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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९५

[संस्कृत-मूलभाष्यम्]
त्येवंवित् । एवंशब्दस्य प्रकृत-
परामर्शार्थत्वात् । स किम् ?
अस्माल्लोकात्प्रेत्य दृष्टादृष्टेष्टवि-
षयसमुदायो ह्ययं लोकस्तस्मा-
ल्लोकात्प्रेत्य प्रत्यावृत्य निरपेक्षो
भूत्वैतं यथाव्याख्यातमन्नमय-
मात्मानमुपसंक्रामति । विषयजात-
मन्नमयात्पिण्डात्मनो व्यतिरिक्तं
न पश्यति । सर्वं स्थूलभूतमन्न-
मयमात्मानं पश्यतीत्यर्थः ।
ततोऽभ्यन्तरमेतं प्राणमयं
सर्वान्न मयात्मस्थम विभक्तम् ।
अथैतं मनोमयं विज्ञानमयमा-
नन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति ।
अथादृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिल-
यनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते ।
तत्रैतच्चिन्त्यम् । कोऽयमेवं-
[पार्श्व-टिप्पणी: तृतीयानुप्रश्न-विचारः] वित्कथं वा संक्राम-
तीति । किं परस्मा-
दात्मनोऽन्यः संक्रमणकर्ता प्रवि-
भक्त उत स एवेति ।


[हिन्दी-अनुवाद]
(इस प्रकार जाननेवाला) है; क्योंकि
'एवम्' शब्द प्रसंगमें आये हुए पदार्थ-
का परामर्श (निर्देश) करनेके
लिये हुआ करता है । वह एवंवित्
क्या [करता है] ? इस लोकसे
जाकर — दृष्ट और अदृष्ट इष्ट विषयों-
का समुदाय ही यह लोक है, उस
इस लोकसे प्रेत्य-प्रत्यावर्तन करके
(लौटकर) अर्थात् उससे निरपेक्ष
होकर इस ऊपर व्याख्या किये हुए
अन्नमय आत्माको प्राप्त होता है ।
अर्थात् वह विषयसमूहको अन्नमय
शरीरसे भिन्न नहीं देखता; तात्पर्य
यह है कि सम्पूर्ण स्थूल भूतवर्गको
अन्नमय शरीर ही समझता है ।
उसके भीतर वह सम्पूर्ण अन्नमय
कोशोंमें स्थित विभागहीन प्राणमय
आत्माको देखता है । और फिर
क्रमशः इस मनोमय, विज्ञानमय और
आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है ।
तत्पश्चात् वह इस अदृश्य, अशरीर,
अनिर्वचनीय और अनाश्रय आत्मामें
अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है ।
अब यहाँ यह विचारना है कि
यह इस प्रकार जाननेवाला है कौन ?
और यह किस प्रकार संक्रमण करता
है ? वह संक्रमणकर्ता परमात्मासे
भिन्न है अथवा स्वयं वही है ।


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