तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम अनुवाक
त्रिशङ्कुका वेदानुवचन
अहं वृक्षस्य रेरिवेति स्वाध्या- | ‘अहं वृक्षस्य रेरिवा’ आदि
| मन्त्राम्नाय स्वाध्याय ( जप ) के
यार्थो मन्त्राम्नायः । स्वाध्यायश्च | लिये है । तथा स्वाध्याय विद्या
| ( ज्ञान ) की उत्पत्तिके लिये बतलाया
विद्योत्पत्तये । प्रकरणात् । | गया है; यह प्रकरणसे ज्ञात होता
| है; क्योंकि यह प्रकरण विद्याके
विद्यार्थं हीदं प्रकरणम् । न | लिये ही है, इसके सिवा उसका
| कोई और प्रयोजन नहीं जान पड़ता;
चान्यार्थत्वमवगम्यते । स्वाध्या- | क्योंकि स्वाध्यायके द्वारा जिसका
| चित्त शुद्ध हो गया है उसीको
येन च विशुद्धसत्त्वस्य विद्योत्प- | विद्याकी उत्पत्ति होना सम्भव है ।
त्तिरवकल्प्यते । |
अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्व-
पवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणꣳसवर्चसम् ।
सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ १ ॥
मैं [ अन्तर्यामीरूपसे उच्छेदस्वरूप संसार- ] वृक्षका प्रेरक हूँ । मेरी
कीर्ति पर्वतशिखरके समान उच्च है । ऊर्ध्वपवित्र ( परमात्मारूप कारण-
वाला ) हूँ । अन्नवान् सूर्यमें जिस प्रकार अमृत है उसी प्रकार मैं भी
शुद्ध अमृतमय हूँ । मैं प्रकाशमान [ आत्मतत्त्वरूप ] धन, सुमेधा
( सुन्दर मेधावाला ) और अमरणधर्मा तथा अक्षित ( अव्यय ) हूँ,
अथवा अमृतसे सिक्त ( भीगा हुआ ) हूँ—यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन
है ॥ १ ॥
तै० उ० ९—१०—
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