तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्य)]
रम्भणमात्रेऽस्तित्वभाविता बुद्धि-
स्तद्विपरीते व्यवहारातीते नास्ति-
त्वमपि प्रतिपद्यते । यथा घटा-
दिर्व्यवहारविषयतयोपपन्नः सं-
स्तद्विपरीतोऽसन्निति प्रसिद्धम् ।
एवं तत्सामान्यादिहापि स्याद्ब्रह्म-
णो नास्तित्वप्रत्याशङ्का । तस्मा-
दुच्यते—अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेदेति ।
किं पुनः स्यात्तदस्तीति वि-
जानतस्तदाह—सन्तं विद्यमान-
ब्रह्मस्वरूपेण परमार्थसदात्मापन्न-
मेनमेवंविदं विदुर्ब्रह्मविदस्तत-
स्तस्मादस्तित्ववेदनात्सोऽन्येषां
ब्रह्मवद्विज्ञेयो भवतीत्यर्थः ।
अथवा यो नास्ति ब्रह्मेति
मन्यते स सर्वस्यैव सन्मार्गस्य
वर्णाश्रमादिव्यवस्थालक्षणस्याश्र-
[हिन्दी अनुवाद]
में ही, जो कि केवल वाणीसे ही उच्चारण किये जानेवाले हैं, अस्तित्व-
की भावनासे भावित हुई बुद्धि उनसे विपरीत व्यवहारातीत पदार्थों-
में अस्तित्वका भी अनुभव नहीं करती; जैसे कि [ जल लाना आदि ]
व्यवहारके विषयरूपसे उपपन्न हुआ घट आदि पदार्थ 'सत्' और उससे
विपरीत [ वन्ध्यापुत्रादि ] 'असत्' होता है—इस प्रकार प्रसिद्ध है ।
उसी प्रकार उसकी समानताके कारण यहाँ भी ब्रह्मके अविद्यमानत्व-
के विषयमें शंका हो सकती है । इसीलिये कहा है—'ब्रह्म है-ऐसा यदि कोई जानता है' इत्यादि ।
किन्तु ‘वह ( ब्रह्म ) है’ ऐसा जाननेवाले पुरुषको क्या फल मिलता है ?
इसपर कहते हैं—ब्रह्मवेत्तालोग इस प्रकार जाननेवाले इस पुरुषको
सत्—विद्यमान अर्थात् ब्रह्मरूपसे परमार्थ सत्स्वरूपको प्राप्त हुआ समझते हैं ।
तात्पर्य यह है कि इस कारणसे ब्रह्मके अस्तित्वको जाननेके
कारण वह दूसरोंके लिये ब्रह्मके समान जाननेयोग्य हो जाता है ।
अथवा जो पुरुष ‘ब्रह्म नहीं है’ ऐसा मानता है वह अश्रद्धालु
होनेके कारण, वर्णाश्रमादि व्यवस्था-रूप सारे ही शुभमार्गका,
अनु० ६] शाङ्करभाष्यार्थ १५३
दधानतया नास्तित्वं प्रतिपद्यते- | असत्त्व प्रतिपादन करता है;
ऽब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थत्वात्तस्य । अतो | क्योंकि वह भी ब्रह्मकी प्राप्तिके ही
नास्तिकः सोऽसन्नसाधुरुच्यते | लिये है । अतः वह नास्तिक लोकमें
लोके । तद्विपरीतः सन्योऽस्ति | असत्-असाधु कहा जाता है ।
ब्रह्मेति चेद्वेद स तद्ब्रह्मप्रतिपत्ति- | इसके विपरीत जो पुरुष 'ब्रह्म है'
हेतुं सन्मार्गं वर्णाश्रमादिव्यव- | ऐसा जानता है वह 'सत्' है;
स्थालक्षणं श्रद्दधानतया यथा- | क्योंकि वह उस ब्रह्मकी प्राप्तिके
वत्प्रतिपद्यते यस्मात्ततस्तस्मात् | हेतुभूत वर्णाश्रमादिके व्यवस्थारूप
सन्तं साधुमार्गस्थमेनं विदुः | सन्मार्गको श्रद्धापूर्वक ठीक-ठीक
साधवः तस्मादस्तीत्येव ब्रह्म | जानता है । इसीलिये साधुलोग उसे
प्रतिपत्तव्यमिति वाक्यार्थः । | सत् यानी शुभ मार्गमें स्थित जानते
तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष | हैं । अतः 'ब्रह्म है' ऐसा ही
एव शरीरे विज्ञानमये भवः | जानना चाहिये—यह इस वाक्यका
शारीर आत्मा । कोऽसौ ? य एष | अर्थ है ।
आनन्दमयः । तं प्रति नास्त्या- | उस विज्ञानमयका यही शारीर—
शङ्का नास्तित्वे । अपोढसर्व- | विज्ञानमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा
विशेषत्वात्तु ब्रह्मणो नास्तित्वं | है । वह कौन ? यह जो आनन्दमय
प्रत्याशङ्का युक्ता । सर्वसामा- | है उसके नास्तित्वमें तो कुछ भी
न्याच्च ब्रह्मणः । यस्मादेवमत- | शंका नहीं है । किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण
स्तस्मात्, अथानन्तरं श्रोतुः | विशेषणोंसे रहित है इसलिये उसके
शिष्यस्यानुप्रश्ना आचार्योक्तिमनु | अस्तित्वके अभावमें शंका होना
एते प्रश्ना अनुप्रश्नाः । | उचित ही है । इसके सिवा ब्रह्मकी
| सबके साथ समानता होनेके कारण
| भी [ऐसी शंका हो ही सकती है] ।
| क्योंकि ऐसी बात है इसलिये अब—
| इसके अनन्तर श्रवण करनेवाले
| शिष्यके अनुप्रश्न हैं । आचार्यकी
| इस उक्ति के पश्चात् किये जानेवाले
| ये प्रश्न—अनुप्रश्न हैं—