तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[बायाँ स्तम्भ (मूल संस्कृत)]
अक्षरविषयस्मृत्यावृत्त्या
मन्त्रावृत्तिः स्यादिति चेत् ?
न; मुख्यार्थासंभवात् । "त्रिः
प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्" इति
ऋगावृत्तिः श्रूयते । तत्रर्चो-
ऽविषयत्वे तद्विषयस्मृत्यावृत्त्या
मन्त्रावृत्तौ च क्रियमाणायाम्
"त्रिः प्रथमामन्वाह" इति ऋगा-
वृत्तिर्मुख्योऽर्थश्चोदितः परित्यक्तः
स्यात् । तस्मान्मनोवृत्त्युपाधि-
परिच्छिन्नं मनोवृत्तिनिष्ठमात्म-
चैतन्यमनादिनिधनं यजुःशब्द-
वाच्यमात्मविज्ञानं मन्त्रा इति ।
एवं च नित्यत्वोपपत्तिर्वेदानाम् ।
अन्यथा विषयत्वे रूपादि-
वदनित्यत्वं च स्यान्नैतद्यु-
क्तम् । "सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति
[दायाँ स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)]
शङ्का-मन्त्रके अक्षरोंको विषय
करनेवाली स्मृतिकी आवृत्ति होनेसे
मन्त्रकी भी आवृत्ति हो सकती है—
यदि ऐसा मानें तो ?
समाधान—नहीं; क्योंकि [ ऐसा
माननेसे जपका विधान करनेवाली
श्रुतिका ] मुख्य अर्थ असम्भव हो
जायगा । "तीन बार प्रथम ऋक् की
आवृत्ति करनी चाहिये और तीन
बार अन्तिम ऋक् का अन्वाख्यान
( आवर्तन ) करे" इस प्रकार ऋक् की
आवृत्तिके विषयमें श्रुतिकी आज्ञा है ।
ऐसी अवस्थामें मन्त्रमय ऋक् तो
मनका विषय नहीं है, अतः मन्त्रकी
आवृत्तिके स्थानमें यदि केवल उसकी
स्मृतिका ही आवर्तन किया जाय
तो "तीन बार प्रथम ऋक् की
आवृत्ति करनी चाहिये" इस श्रुतिका
मुख्य अर्थ छूट जाता है । अतः यह
समझना चाहिये कि मनोवृत्तिरूप
उपाधिसे परिच्छिन्न मनोवृत्तिस्थित
जो अनादि-अनन्त आत्मचैतन्य
'यजुः' शब्दवाच्य आत्मविज्ञान है
वह यजुर्मन्त्र है । इसी प्रकार
वेदोंकी नित्यता भी सिद्ध हो सकती
है; नहीं तो इन्द्रियोंके विषय होने-
पर तो रूपादिके समान उनकी भी
अनित्यता ही सिद्ध होगी; और ऐसा
होना ठीक नहीं है । "जिसमें समस्त
अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७
स मानसीन आत्मा" इति च | वेद एकरूप हो जाते हैं वह मनरूप
श्रुतिर्नित्यात्मनैकत्वं ब्रुवत्यृगा- | उपाधिमें स्थित आत्मा है" यह नित्य
दीनां नित्यत्वे समञ्जसा स्यात् । | आत्माके साथ ऋगादिका एकत्व बतलानेवाली श्रुति भी उनका
"ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्य- | नित्यत्व सिद्ध होनेपर ही सार्थक हो सकती है । इस सम्बन्धमें
स्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः" | "जिसमें सम्पूर्ण देव स्थित हैं उस अक्षर और परब्रह्मरूप आकाशमें
( श्वे० उ० ४ । ८ ) इति च | ही ऋचाएँ तादात्म्यभावसे व्यवस्थित
मन्त्रवर्णः । | हैं" ऐसा मन्त्रवर्ण भी है ।
आदेशोऽत्र ब्राह्मणम्; अति- | 'आदेश आत्मा' इस वाक्यमें 'आदेश' शब्द ब्राह्मणका वाचक
देष्टव्यविशेषानतिदिशतीति। अथ- | है; क्योंकि वेदोंका ब्राह्मणभाग ही कर्त्तव्यविशेषोंका आदेश ( उपदेश )
र्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा ब्राह्मणं | देता है । अथर्वाङ्गिरस ऋषिके साक्षात्कार किये हुए मन्त्र और
च शान्तिकपौष्टिकादिप्रतिष्ठा- | ब्राह्मण ही पुच्छ—प्रतिष्ठा हैं; क्योंकि उनमें शान्ति और पुष्टिकी स्थितिके
हेतुर्मप्रधानत्वात्पुच्छं प्रतिष्ठा । | हेतुभूत कर्मोंकी प्रधानता है ।
तदप्येष श्लोको भवति मनो- | पूर्ववत् इस विषयमें ही—मनोमय आत्माका प्रकाश करनेवाला ही
मयात्मप्रकाशकः पूर्ववत् ॥१॥ | यह श्लोक है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥३॥
चतुर्थ अनुवाक
मनोमय कोशकी महिमा तथा विज्ञानमय कोशका वर्णन
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष
एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मा-
न्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनैष पूर्णः ।
स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं
पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः ।
सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
जहाँसे मनके सहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है उस
ब्रह्मानन्दको जाननेवाला पुरुष कभी भयको प्राप्त नहीं होता । यह जो
[ मनोमय शरीर ] है वही उस अपने पूर्ववर्ती [ प्राणमय कोश ] का
शारीरिक आत्मा है । उस इस मनोमयसे दूसरा इसका अन्तर-आत्मा
विज्ञानमय है । उसके द्वारा यह पूर्ण है । वह यह विज्ञानमय भी
पुरुषाकार ही है । उस [ मनोमय ] की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह
भी पुरुषाकार है । उसका श्रद्धा ही शिर है । ऋत दक्षिण पक्ष है ।
सत्य उत्तर पक्ष है । योग आत्मा ( मध्यभाग ) है और महत्तत्त्व पुच्छ-प्रतिष्ठा
है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य | जहाँसे मनके सहित वाणी उसे
| न पाकर लौट आती है-इत्यादि
मनसा सहेत्यादि । तस्य पूर्वस्य | [ अर्थ स्पष्ट ही है ] उस पूर्व-
प्राणमयस्यैष एवात्मा शारीरः | कथित प्राणमयका यही शारीर
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अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९
शरीरे प्राणमये भवः शारीरः । | अर्थात् प्राणमय शरीरमें रहनेवाला
कः ? य एष मनोमयः । तस्माद्वा | आत्मा है । कौन ? यह जो मनोमय
एतस्मादित्यादि पूर्ववत् । अ- | है । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि
न्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयो | वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना
चाहिये । उस इस मनोमयसे दूसरा
मनोमयस्याभ्यन्तरो विज्ञानमयः । | इसका अन्तर आत्मा विज्ञानमय है
अर्थात् मनोमय कोशके भीतर
विज्ञानमय कोश है ।
मनोमयो वेदात्मोक्तः । वे- | मनोमय कोश वेदरूप बतलाया
दार्थविषया बुद्धिनिश्चयात्मिका | गया था । वेदोंके अर्थके विषयमें
जो निश्चयात्मिका बुद्धि है उसीका
विज्ञानं तच्चाध्यवसायलक्षणम- | नाम विज्ञान है । और वह अन्तः-
न्तःकरणस्य धर्मः । तन्मयो | करणका अध्यवसायरूप धर्म है ।
तन्मय अर्थात् प्रमाणस्वरूप निश्चय
निश्चयविज्ञानैः प्रमाणस्वरूपैर्नि- | विज्ञानसे (निश्चयात्मिका बुद्धिसे)
र्वर्तित आत्मा विज्ञानमयः । | निष्पन्न होनेवाला आत्मा विज्ञानमय
है, क्योंकि प्रमाणके विज्ञानपूर्वक
प्रमाणविज्ञानपूर्वको हि यज्ञादि- | ही यज्ञादिका विस्तार किया जाता
स्तायते । यज्ञादिहेतुत्वं च | है । विज्ञान यज्ञादिका हेतु है-
यह बात श्रुति आगे चलकर मन्त्र-
वक्ष्यति श्लोकेन । | द्वारा बतलायेगी ।
निश्चयविज्ञानवतो हि कर्तव्ये- | निश्चयात्मिका बुद्धिसम्पन्न पुरुष-
ष्वर्थेषु पूर्वं श्रद्धोत्पद्यते । सा | को सबसे पहले कर्त्तव्य कर्ममें श्रद्धा
ही उत्पन्न होती है । अतः सम्पूर्ण
सर्वकर्त्तव्यानां प्राथम्याच्छिर इव | कर्मोंमें प्रथम होनेके कारण वह
शिरके समान उस विज्ञानमयका
शिरः । ऋतसत्ये यथाव्या- | शिर है । ऋत और सत्यका अर्थ
पहले (शिक्षावल्ली, नवम अनुवाकमें)
ख्याते एव । योगो युक्तिः | की हुई व्याख्याके ही समान है ।
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