तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[मूल एवं संस्कृत-टीका]
सर्वस्य प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठा-
गुणोपासनात्प्रतिष्ठावान्भवति ।
एवं पूर्वेष्वपि यद्यत्तदधीनं फलं
तद्ब्रह्मैव तदुपासनात्तद्वान्भवतीति
द्रष्टव्यम् । श्रुत्यन्तराच्च—"तं
यथा यथोपासते तदेव भवति"
इति ।
तन्मह इत्युपासीत । महो
महत्त्वगुणवत्तदुपासीत । महान्
भवति । तन्मन इत्युपासीत ।
मननं मनः । मानवान्भवति
मननसमर्थो भवति ॥ ३॥ तन्नम
इत्युपासीत । नमनं नमो नमन-
गुणवत्तदुपासीत । नम्यन्ते प्रह्ली-
भवन्त्यस्मा उपासित्रे कामाः
काम्यन्त इति भोग्या विषया
इत्यर्थः ।
[हिन्दी अनुवाद]
अतः वह सबकी प्रतिष्ठा (आश्रय) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे।
प्रतिष्ठा गुणवान् ब्रह्मकी उपासना करनेसे उपासक प्रतिष्ठावान् होता
है । ऐसा ही पूर्व सब पर्यायोंमें समझना चाहिये । जो-जो उसके
अधीन फल है वह ब्रह्म ही है । उसकी उपासनासे पुरुष उसी फलसे
युक्त होता है—ऐसा जानना चाहिये। यही बात “जिस-जिस प्रकार उसकी
उपासना करता है वह (उपासक) वही हो जाता है" इस एक दूसरी
श्रुतिसे प्रमाणित होती है ।
वह महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । महः अर्थात् महत्त्व
गुणवाला है—ऐसे भावसे उसकी उपासना करे । इससे उपासक
महान् हो जाता है । वह मन है—इस प्रकार उसकी उपासना करे।
मननका नाम मन है । इससे वह मानवान्—मननमें समर्थ हो जाता है
॥३॥ वह नमः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । नमनका नाम ‘नमः’
है अर्थात् उसे नमन-गुणवान् समझकर उपासना करे । इससे उस
उपासकके प्रति सम्पूर्ण काम—जिनकी कामना की जाय वे भोग्य विषय
नत अर्थात् विनम्र हो जाते हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७
तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्म परि- | वह ब्रह्म है-इस प्रकार उसकी
वृढतममित्युपासीत । ब्रह्मवांस्तद्- | उपासना करे । ब्रह्म यानी सबसे
गुणो भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर | बढ़ा हुआ है-इस प्रकार उपासना
इत्युपासीत । ब्रह्मणः परिमरः | करे । इससे वह ब्रह्मवान्-ब्रह्मके-से
परिम्रियन्तेऽस्मिन्पञ्च देवता | गुणवाला हो जाता है । वह ब्रह्मका
विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदि- | परिमर है-इस प्रकार उसकी
त्योऽग्निरित्येताः । अतो वायुः | उपासना करे । ब्रह्मका परिमर-
परिमरः श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः । स | जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य
एष एवार्थं वायुराकाशेनानन्य | और अग्नि-ये पाँच देवता मृत्युको
इत्याकाशो ब्रह्मणः परिमरः | प्राप्त होते हैं उसे परिमर कहते हैं;
तमाकाशं वाय्वात्मानं ब्रह्मणः | अतः वायु ही परिमर है, जैसा कि
परिमर इत्युपासीत । | [ "वायुर्वाव संवर्गः" इस ] एक
| अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वही
एनमेवंविदं प्रतिस्पर्धिनो | यह वायु आकाशसे अभिन्न है, इसलिये
द्विषन्तोऽद्विषन्तोऽपि सपत्ना यतो | आकाश ही ब्रह्मका परिमर है । अतः
भवन्त्यतो विशेष्यन्ते द्विषन्तः | वायुरूप आकाशकी 'यह ब्रह्मका
सपत्ना इति, एनं द्विषन्तः | परिमर है' इस भावसे उपासना करे ।
सपत्नास्ते परिम्रियन्ते प्राणाञ्ज- |
हति । किं च ये चाप्रिया अस्य | इस प्रकार जाननेवाले इस
भ्रातृव्या अद्विषन्तोऽपि ते च | उपासकके द्वेष करनेवाले प्रतिपक्षी-
परिम्रियन्ते । | क्योंकि प्रतिपक्षी द्वेष न करनेवाले
| भी होते हैं इसलिये यहाँ 'द्वेष
| करनेवाले' यह विशेषण दिया गया
| है-मर जाते हैं अर्थात् प्राण त्याग
| देते हैं । तथा इसके जो अप्रिय
| भ्रातृव्य होते हैं वे, द्वेष करनेवाले
| न होनेपर भी, मर जाते हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri