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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

२४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

२४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
मानन्दमजममृतमभयमद्वैतं फल- | अजन्मा, अमृत, अभय, अद्वैत एवं
सत्य, ज्ञान और अनन्त ब्रह्मको
भूतमापन्न इमाँल्लोकान्भूरादीन- | प्राप्त हो इन भूः आदि लोकोंमें
सञ्चार करता हुआ-इस प्रकार इन
नुसंचरन्निति व्यवहितेन संबन्धः। | व्यवधानयुक्त पदोंसे इस वाक्यका
कथमनुसंचरन् ? कामान्नी | सम्बन्ध है-किस प्रकार सञ्चार
करता हुआ ? कामान्नी-जिसको
कामतोऽन्नमस्येति कामान्नी। | इच्छासे ही अन्न प्राप्त हो जाय उसे
कामान्नी कहते हैं तथा जिसे इच्छासे
तथा कामतो रूपाण्यस्येति | ही [ इष्ट ] रूपोंकी प्राप्ति हो
जाय ऐसा कामरूपी होकर सञ्चार
कामरूपी । अनुसंचरन्सर्वात्मने- | करता हुआ अर्थात् सर्वात्मभावसे
माँल्लोकानात्मत्वेनानुभवन्- | इन लोकोंको अपने आत्मरूपसे
अनुभव करता हुआ-क्या करता है ?
किम् ? एतत्साम गायन्नास्ते । | इस सामका गान करता रहता है ।
समत्वाद्व्रह्मैव साम सर्व्वा- | समरूप होनेके कारण ब्रह्म ही
[टिप्पणी: ब्रह्मविदः साम- | नन्यरूपं गायन्नश- | साम है । उस सबसे अभिन्नरूप
गानाभिप्रायः] | सामका गान-उच्चारण करता हुआ
ब्दयन्नात्मैकत्वं प्र- | अर्थात् लोकपर अनुग्रह करनेके लिये
ख्यापयँल्लोकानुग्रहार्थं तद्विज्ञान- | आत्माकी एकताको प्रकट करता
हुआ और उसकी उपासनाके फल
फलं चातीव कृतार्थत्वं गायन्ना- | अत्यन्त कृतार्थत्वका गान करता
हुआ स्थित रहता है । किस प्रकार
स्ते तिष्ठति । कथम् ? हा ३ वु ! | गान करता है-हा ३ वु ! हा
हा३वु! हा३वु! अहो इत्येतस्मिन्न- | ३ वु ! हा ३ वु ! ये तीन शब्द
'अहो !' इस अर्थमें अत्यन्त विस्मय
र्थेऽत्यन्तविस्मयख्यापनार्थम् ॥५॥ | प्रकट करनेके लिये हैं ॥ ५ ॥

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
ब्रह्मवेत्ताद्वारा गाया जानेवाला साम
कः पुनरसौ विस्मयः ? | किन्तु वह विस्मय क्या है ? सो
इत्युच्यते— | बतलाया जाता है—
अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादो ३ ऽहमन्नादो ३
ऽहमन्नादः । अह ँश्लोककृदह ँश्लोककृदह ँश्लोककृत् ।
अहमस्मि प्रथमजा ऋता ३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना ३
भायि । यो मा ददाति स इदेव मा ३वाः । अहमन्नमन्नम-
दन्तमा ३द्मि । अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा ३म् । सुवर्न ज्योतिः
य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥
मैं अन्न ( भोग्य ) हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ; मैं ही अन्नाद
( भोक्ता ) हूँ, मैं ही अन्नाद हूँ, मैं ही अन्नाद हूँ; मैं ही श्लोककृत्
( अन्न और अन्नादके संघातका कर्ता ) हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ, मैं ही
श्लोककृत् हूँ । मैं ही इस सत्यासत्यरूप जगत्के पहले उत्पन्न हुआ
[ हिरण्यगर्भ ] हूँ । मैं ही देवताओंसे पूर्ववर्ती विराट् एवं अमृतत्वका
केन्द्रस्वरूप हूँ । जो [ अन्नस्वरूप ] मुझे [ अन्नार्थियोंको ] देता है वह
इस प्रकार मेरी रक्षा करता है, किन्तु [ जो मुझ अन्नस्वरूपको दान न
करता हुआ स्वयं भोगता है उस ] अन्न भक्षण करनेवालेको मैं अन्नरूपसे
भक्षण करता हूँ । मैं इस सम्पूर्ण भुवनका पराभव करता हूँ, हमारी
ज्योति सूर्यके समान नित्यप्रकाशस्वरूप है । ऐसी यह उपनिषद् [ ब्रह्म-
विद्या ] है । जो इसे इस प्रकार जानता है [ उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त
होता है ] ॥ ६ ॥
अद्वैत आत्मा निरञ्जनोऽपि | निर्मल अद्वैत आत्मा होनेपर भी
सन्नहमेवान्नमन्नादश्च । किं चाह- | मैं ही अन्न और अन्नाद हूँ तथा मैं
मेव श्लोककृत् । श्लोको नामा- | ही श्लोककृत् हूँ । 'श्लोक' अन्न और
न्नान्नादयोः संघातस्तस्य कर्ता | अन्नादके संघातको कहते हैं उसका
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri