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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

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८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


विरोधादेव च विद्या मोक्षं प्रति | है और विरोध होनेके कारण ही ज्ञान
न कर्माण्यपेक्षते । | मोक्षके प्रति कर्मकी अपेक्षा नहीं
| रखता ।
स्वात्मलाभे तु पूर्वोपचित- | हाँ, आत्मलाभमें पूर्वसञ्चित
प्रतिबन्धापनयद्वारेण विद्याहेतुत्वं | पापरूप प्रतिबन्धकी निवृत्तिद्वारा
प्रतिपद्यन्ते कर्माणि नित्यानीति । | नित्यकर्म ज्ञानप्राप्तिके हेतु अवश्य
| होते हैं । इसीलिये इस प्रकरणमें
अत एवास्मिन्प्रकरण उपन्य- | कर्मोंका उल्लेख किया गया है—यह
स्तानि कर्माणीत्यवोचाम । एवं | हम पहले ही कह चुके हैं । इस
| प्रकार भी कर्मका विधान करनेवाली
चाविरोधः कर्मविधिश्रुतीनाम् | श्रुतियोंका [ विद्याविधायिनी श्रुतियों-
अतः केवलाया एव विद्यायाः | से ] विरोध नहीं है । अतः यह
| सिद्ध हुआ कि केवल विद्यासे ही
परं श्रेय इति सिद्धम् । | परमश्रेयकी प्राप्ति होती है ।
एवं तर्ह्याश्रमान्तरानुपपत्तिः । | पूर्व०—यदि ऐसी बात है तब
| तो [ गृहस्थाश्रमके सिवा ] अन्य
कर्मनिमित्तत्वाद्द्योत्पत्तेः । गा- | आश्रमोंका होना भी उपपन्न नहीं
| है; क्योंकि विद्याकी उत्पत्ति तो
र्हस्थ्ये च विहितानि कर्माणी- | कर्मके निमित्तसे होती है और कर्मों-
| का विधान केवल गृहस्थके ही लिये
त्यैकाश्रम्यमेव । अतश्च यावज्जी- | किया गया है; अतः इससे एकाश्रमत्व-
| की ही सिद्धि होती है । और इसलिये
वादिश्रुतयोऽनुकूलतराः । | 'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे' इत्यादि
| श्रुतियाँ और भी अनुकूल ठहरती हैं ।
न; कर्मानैकत्वात् । न ह्य- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है;
| क्योंकि कर्म तो अनेक हैं । केवल
[ज्ञानसाधकानि] ग्निहोत्रादीन्येव क- | अग्निहोत्र आदि ही कर्म नहीं हैं ।
[कर्माणि] र्माणि । ब्रह्मचर्यं | ब्रह्मचर्य, तप, सत्यभाषण, शम,
तपः सत्यवदनं शमो दमोऽहिंसे- | दम और अहिंसा आदि अन्य कर्म


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अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
त्येवमादीन्यपि कर्माणीतराश्रम- | भी इतर आश्रमोंके लिये प्रसिद्ध ही
प्रसिद्धानि विद्योत्पत्तौ साधक- | हैं। वे तथा ध्यान-धारणादिरूप
| कर्म [हिंसा आदि दोषोंसे]
तमान्यसंकीर्णत्वाद्विद्यन्ते ध्यान- | असंकीर्ण होनेके कारण ज्ञानकी
धारणादिलक्षणानि च। वक्ष्यति | उत्पत्तिमें सर्वोत्तम साधन हैं। आगे
| (भृगु० २।५ में) यह कहेंगे
च—"तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व" | भी कि "तपके द्वारा ब्रह्मको जानने-
(तै० उ० ३। २—५) इति। | की इच्छा कर"।
जन्मान्तरकृतकर्मभ्यश्च प्राग- | जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंसे तो
ज्ञानप्राप्तौ पि गार्हस्थ्याद्विद्यो- | गृहस्थाश्रम स्वीकार करनेसे पूर्व भी
गार्हस्थ्यस्य त्पत्तिसंभवात्कर्मा- | ज्ञानकी उत्पत्ति होना सम्भव है।
आनर्थक्यम् र्थत्वाच्च गार्हस्थ्य- | तथा गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति केवल
प्रतिपत्तेः कर्मसाध्यायां च | कर्मोंके ही लिये की जाती है।
| अतः कर्मसाध्य ज्ञानकी प्राप्ति हो
विद्यायां सत्यां गार्हस्थ्यप्रति- | जानेपर तो गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति
पत्तिरनर्थिकैव । | भी व्यर्थ ही है।
लोकार्थत्वाच्च पुत्रादीनाम्; | इसके सिवा पुत्रादि साधन तो
| लोकोंकी प्राप्तिके लिये हैं। पुत्रादि
पुत्रादिसाध्येभ्यश्चायं लोकः पितृ- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले उन इह-
लोको देवलोक इत्येतेभ्यो व्या- | लोक, पितृलोक एवं देवलोक आदि-
| से जिसकी कामना निवृत्त हो गयी
वृत्तकामस्य नित्यसिद्धात्मलोक- | है, नित्यसिद्ध आत्माका साक्षात्कार
दर्शिनः कर्मणि प्रयोजनमपश्यतः | करनेवाले एवं कर्मोंमें कोई प्रयोजन
| न देखनेवाले उस ब्रह्मवेत्ताकी
कथं प्रवृत्तिरुपपद्यते। प्रतिपन्न- | कर्मोंमें कैसे प्रवृत्ति हो सकती
| है? जिसने गृहस्थाश्रम स्वीकार
गार्हस्थ्यस्यापि विद्योत्पत्तौ विद्या- | कर लिया है उसे भी, जब ज्ञानकी
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